Himalaya Ke Darre, Map, PDF, Trick, List, Notes - हिमालय के प्रमुख दर्रे

इस भारत के प्रमुख दर्रे पोस्ट में हम हिमालय के प्रमुख दर्रे - Himalaya Ke Pramukh Darre, notes, in map, pdf, trick, list, Himalayan passes in hindi को पडेंगे।
हिमालय के प्रमुख दर्रे टॉपिक आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे- BankSSCRailwayRRBUPSC आदि में सहायक होगा।
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भारत के प्रमुख दर्रे : भारत के दर्रे दो भागों में बांटे जा सकते हैं ‘हिमालय के पर्वतीय राज्यों में पाये जाने वाले दर्रे’ और ‘प्रायद्वीप भारत के राज्यों में पाये जाने वाले दर्रे’। इन दर्रों का महत्व व्यापार, परिवहन, युद्ध तथा अन्य उद्देश्यों के लिए है। Major Passes in Himalaya UPSC & PCS notes in hindi .
हिमालय के दर्रे - Himalaya Ke Darre

हिमालय के दर्रे - Passes Of Himalayas in Hindi

भारत में अधिक मात्रा में दर्रे पाये जाते हैं दर्रे का मतलब होता है दो पहाड़ों के बीच की जगह, जो नीचे की ओर दब गई हो, ये संरचना ज्यादातर पहाड़ों से नदी बहने की वजह से बनती है।
लेकिन इसके कुछ ओर भी कारण है जैसे - भूकम्प, ज्वालामुखी, जमीन का खिसकना उल्का गिरना इत्यादि।

  “पहाडि़यों एवं पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले आवागमन के प्राकृतिक मार्गो को दर्रा कहा जाता है।” .

रोहतांग दर्रा 

हिमालय (भारत) में स्थित एक प्रमुख दर्रा है। 
यह मनाली को लेह से सड़क मार्ग द्वारा जोड़ता है। 
यह दर्रा समुद्र तल से 4,111 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। 
इस दर्रे का पुराना नाम 'भृगु-तुंग' था, 'रोहतांग' नया नाम है। यहाँ पूरे साल बर्फ़ की चादर बिछी रहती है। 
रोहतांग दर्रा लाहोल और स्पीति ज़िलों का प्रवेश द्वार कहा जाता है। 
यह दर्रा मौसम में होने वाले अचानक बदलावों के लिए भी ज़िम्मेदार है।
समुद्र तल से लगभग 4,111 मीटर की ऊँचाई पर स्थित रोहतांग दर्रा मनाली को लेह से सड़क मार्ग द्वारा जोड़ता है। 
हिमाचल प्रदेश के लाहोल-स्पीति ज़िले का प्रवेश द्वारा कहा जाने वाला यह दर्रा कभी 'भृगु तुंग' के नाम से पुकारा जाता था। 
यह बौद्ध सांस्कृतिक विरासत के धनी लाहोल-स्पीति को हिन्दू सभ्यता वाले कुल्लू से प्राकृतिक रूप से बांटता है।
 मनाली से रोहतांग दर्रे तक पहुँचने के लिए क़रीब पचास किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है।

कराकोरम दर्रा  

कराकोरम दर्रा' कराकोरम पर्वत श्रेणी में भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य और चीन द्वारा नियंत्रित शिंजियांग प्रदेश के बीच स्थित है।
स्थिति भारत-चीन
ऊँचाई 5,654 मीटर
पर्वत श्रृंखला कराकोरम पर्वत श्रेणी
----**  तापमान बहुत नीचे तक गिरता है और तेज़ हवाएँ चलती हैं, लेकिन यही तीव्र हवाएँ यहाँ हिम नहीं टिकने देतीं, जिस वजह से यह दर्रा अधिकतर बर्फ़ मुक्त रहता है।

कराकोरम दर्रा जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में हिमालय के कराकोरम श्रेणियों के मध्य स्थित है। 
हिमालय पर्वत श्रेणी का यह सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित दर्रा है, जो 5,654 मीटर ऊंचा है।
प्राचीन काल में इस दर्रे से होकर यारकंद को मार्ग जाता था।
इस दर्रे से होकर चीन के लिए एक सड़क बनायी गयी है।
वर्तमान में इस दर्रे पर चीन द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया है।
कराकोरम दर्रा अत्यंत ऊँचाई पर है और दूर-दूर तक कोई वनस्पति नहीं उगती, जिससे यहाँ से गुज़रते कारवाँ में बहुत से जानवर दम तोड़ देते हैं। 
इस कारण राह पर जानवरों की हड्डियाँ बिखरी रहती हैं।
लेह जाते हुए इस दर्रे से दक्षिण में लगभग 5300 मीटर (17,400 फ़ुट) की ऊँचाई पर देपसंग मैदान है। 
यह मैदान भी वनस्पति रहित है और इसे पार करने में तीन दिन लग जाया करते थे। 
उत्तर में रास्ता थोड़ा कम कठिन है और कम ऊँचाई वाले सुगेत दावन दर्रे को पार करके काराकाश नदी के किनारे स्थित शायदुल्ला पहुँचा जाता है, जहाँ जानवरों के चरने के लिये पहले बहुत घास थी।
यह दर्रा दो पहाड़ों के बीच के कन्धे पर स्थित है। 
यहाँ तापमान बहुत गिरता है और तेज़ हवाएँ चलती हैं, लेकिन यही तीव्र हवाएँ यहाँ हिम नहीं टिकने देती, जिस वजह से यह अधिकतर बर्फ़ मुक्त रहता है। 
फिर भी समय-समय पर बर्फ़बारी होती रहती है।
इस दर्रे की चढ़ाई कठिन नहीं मानी जाती और हिममुक्त होने से इसे सालभर प्रयोग में लाया जा सकता है।
भारत-चीन तनाव के कारण यह दर्रा वर्तमान में आने-जाने के लिए बंद है।

बड़ा-लाचा-ला दर्रा

हिमाचल प्रदेश में जास्कर श्रेणियों के मध्य स्थित यह दर्रा मण्डी से लेह जाने का मार्ग प्रदान करता है। 
यह दर्रा 4,512 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

बुर्जिला दर्रा 

जम्मू कश्मीर (भारत) में स्थित है। 
यह हिमालय के अन्तर्गत आता है। 
यह दर्रा पाक अधिकृत कश्मीर एवं कश्मीर घाटी को जोड़ता है।
इस दर्रे से होकर काशनगर और मध्य एशिया का मार्ग गुजरता है।
समुद्र तल से बुर्जिला दर्रा 4,100 मीटर (13,500 फीट) की ऊँचाई पर कश्मीर, गिलगित और श्रीनगर के बीच का एक प्राचीन मार्ग है।
यह दर्रा कश्मीर घाटी को लद्दाख के देवसाईं मैदानों से जोड़ता है।
बर्फ से ढक जाने के कारण यह शीत ऋतु में व्यापार और परिवहन के लिए बंद रहता है।
बुर्जिला दर्रा भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर स्थित है।

जोजिला दर्रा

ज़ोजिला जम्मू और कश्मीर में जास्कर श्रेणी में स्थित एक प्रसिद्ध दर्रा है। 
यह दर्रा हिमालय के अन्तर्गत आता है। इसके द्वारा श्रीनगर और लेह सड़क मार्ग से जुड़ते हैं। 
ज़ोजिला दर्रे पर भूस्खलन के कारण सड़क खिसकने का डर सदा बना रहता है।
यह दर्रा समुद्र तल से लगभग 3528 मीटर (11575 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है।
ज़ोजिला दर्रा श्रीनगर को कारगिल और लेह से जोड़ता है।
अत्यधिक बर्फ़बारी के कारण यह दर्रा शीत ऋतु में बंद रहता है।
'सीमा सड़क संगठन' (बी.आर.ओ.) द्वारा इसे वर्ष की अधिकतर अवधि तक खोले रखने की कोशिश की जाती रही है।
इस दर्रे की देखभाल और इस पर से बर्फ हटाने के लिए 'सीमा सड़क संगठन' द्वारा एक 'बीकॅान फोर्स' की स्थापना भी की गयी है।
श्रीनगर-ज़ोजिला मार्ग को केंद्र सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय राजमार्ग-1डी' के रूप में घोषणा की गयी है।
सन 1948 में पाकिस्तान ने इस दर्रे पर क़ब्ज़ा कर लिया था, परन्तु भारतीय सेना ने आश्चर्यजनक रूप से इतनी ऊंचाई पर टैंको का इस्तेमाल करते हुए ऑपरेशन 'बाइसन' के तहत इस पर पुनः कब्ज़ा कर लिया।

पीर पंजाल

पीर पंजाल दर्रा जम्मू-कश्मीर के दक्षिण-पश्चिम में पीर पंजाल श्रेणियों के मध्य स्थित है। 
इसकी ऊँचाई लगभग 3,494 मीटर है। 
यह दर्रा कुलगांव से कोठी हेतु मार्ग उपलब्ध कराता है।
जम्मू को श्रीनगर से जोड़ने वाला यह पारंपरिक दर्रा ‘मुग़ल मार्ग’ पर स्थित है।
"पीर की गली" के नाम से विख्यात यह दर्रा मुग़ल सड़क के माध्यम से राजौरी और पुंछ के साथ कश्मीर घाटी को जोड़ता है।
जम्मू-कश्मीर को घाटी से जोड़ने वाला यह सबसे सरल और छोटा एवं पक्का मार्ग है।
'पीर की गली' में मुग़ल मार्ग का यह उच्चतम बिंदु है, जो 11500 फुट के लगभग है।
यहाँ का निकटम शहर सोपियां है, जिसे "सेबों की घाटी" भी कहते हैं

शिपकी ला दर्रा

शिपकी ला दर्रा हिमालय का एक प्रमुख दर्रा है। 
यह भारत के हिमाचल प्रदेश के किन्नौर ज़िले को तिब्बत से जोड़ता है। 
यह हिमालय की पहाड़ियों के अन्तर्गत आता है।
शिपकी ला दर्रा हिमाचल प्रदेश में किन्नौर ज़िले में स्थित है।
इस दर्रे से होकर शिमला से तिब्बत का मार्ग उपलब्ध होता है।
चीन और भारत के बीच व्यापार अधिकतर इसी दर्रे से होता है।
सतलुज नदी भारत में इसी दर्रे से होकर प्रवेश करती है।
समुद्र तल से लगभग 4300 मीटर से भी अधिक ऊँचाई पर स्थित यह दर्रा, सतलुज महाखड्ड से होकर हिमाचल प्रदेश को तिब्बत से सम्बद्ध करता है।
भारत के चीन से होने वाले व्यापर के लिए यह 'नाथु ला' और 'लिपुलेख' के बाद तीसरा दर्रा (राजमार्ग 22) है।
शीत ऋतु में शिपकी ला दर्रा बर्फ से ढका रहता है, जिस कारण यहाँ आवागमन कुछ समय के लिए बाधित रहता है।

नीति दर्रा 

नीति दर्रा उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित है। 
नीति दर्रा 5,389 मीटर ऊंचा है। 
नीति दर्रे से होकर मानसरोवर और कैलाश घाटी जाने का मुख्य मार्ग गुजरता है।

माना दर्रा

माना दर्रा उत्तराखंड के कुमाऊँ श्रेणी में स्थित है। 
इस दर्रे से होकर मानसरोवर और कैलाश घाटी जाने का मुख्य मार्ग गुजरता है।
यह दर्रा विशाल हिमालय में समुद्र तल से लगभग 5545 मीटर (18192 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है।
माना दर्रा भारत के उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ता है।
इसे दुनिया की सबसे ऊँची परिवहन योग्य सड़क भी माना जाता है।
शीत ऋतु में यह लगभग 6 महीने बर्फ से ढका रहता है।
माना दर्रा, नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के भीतर माना शहर से 24 कि.मी. और उत्तराखंड में प्रसिद्ध हिन्दू धार्मिक तीर्थ बद्रीनाथ से 27 कि.मी. दूर उत्तर में स्थित है

बनिहाल दर्रा  

बनिहाल पीर पंजाल पर्वतश्रेणी का एक दर्रा है, जो जम्मू कश्मीर राज्य में स्थित है। 
समुद्र तल से 2832 मीटर (9291 फीट) की ऊँचाई पर पीर पंजाल श्रेणी में स्थित यह दर्रा जम्मू को श्रीनगर से जोड़ता है।
कश्मीरी भाषा में 'बनिहाल' का अर्थ है- 'हिमावात'।
यह दर्रा डोडा ज़िले में 2,832 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
बनिहाल के मैदानों से कश्मीर घाटी तक पहुँचने का प्रमुख मार्ग है।
जम्मू-श्रीनगर सड़क जवाहर सुरंग से होते हुए इस दर्रे में प्रवेश करती है, जो सर्दियों में अक्सर बर्फ़ से बंद रहता है।
पहले बनिहाल दर्रे में सामान कुलियों द्वारा पीठ पर ढोया जाता था, जो दिन भर में इसकी यात्रा पूरी करते थे।
शीत ऋतु में बनिहाल दर्रा बर्फ से ढका रहता है। 
वर्ष पर्यन्त सड़क परिवहन की व्यवस्था करने के उद्देश्य से यहाँ 'जवाहर सुरंग' बनायी गई थी, जिसका उद्घाटन 1956 ई. में किया गया था, जिसके कारण अब इस दर्रे का बहुत उपयोग नहीं रह गया।

नाथुला दर्रा

नाथुला दर्रा भारत के सिक्किम में डोगेक्या श्रेणी में स्थित है। 
यह दर्रा महान् हिमालय के अन्तर्गत पड़ता है। इस दर्रे के द्वारा दार्जिलिंग तथा चुम्बी घाटी से होकर तिब्बत जाने का मार्ग बनता है। 
वर्तमान समय में भारत एवं चीन के बीच व्यापार इसी मार्ग से होता है। 
भारत-चीन युद्ध के समय यह दर्रा काफ़ी चर्चित रहा था।
नाथू ला पहाड़ का दर्रा है, जो चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ सिक्किम को जोड़ता है। 
समुद्र तल से 4310 मीटर की ऊंचाई पर स्थित, यह दर्रा गंगटोक से करीब 54 कि.मी. पूर्व में स्थित है। 
गंगटोक में पूर्व अनुमति के साथ केवल भारतीयों को बुधवार, गुरुवार, शनिवार और रविवार को दर्रा घूमने दिया जाता है। 
यहाँ एक भारतीय युद्ध स्मारक भी मौजूद है। 
दर्रे में कई डूबे हुए क्षेत्र हैं। इसके साथ ही यहाँ के कई क्षेत्र भूस्खलन के प्रति संवेदनशील भी हैं।
Himalaya Ke Darre

भारत-पाकिस्तान के बीच स्थित दर्रे

वर्तमान में पाकिस्तान अधिकृत पश्चिमी हिमालय पर्वत श्रेणियों में भी अनेक दर्रें विद्यमान हैं। इन दर्रों में खैबर, बोलन, मकरान, गोमल, टोची, कुर्रम आदि प्रमुख हैं।

बोलन दर्रा

बोलन पाकिस्तान में स्थित एक दर्रा है।
बोलन दर्रा क्वेटा एवं पाकिस्तान को खक्खर से जोड़ता है।
बोलन दर्रा अफ़गानिस्तान की सीमा से 120 कि.मी. की दूरी पर है।
बोलन दर्रे को दक्षिण एशिया में व्यापारियों, आक्रमणकारियों और खानाबदोश जनजातियों के लिए एक प्रवेश द्वार के रूप में भी इस्तेमाल किया गया।
ख़ैबर दर्रा उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा और अफ़ग़ानिस्तान के काबुलिस्तान मैदान के बीच हिन्दुकुश के सफ़ेद कोह पर्वत श्रृंखला में स्थित एक प्रख्यात दर्रा है। 
यह 1070 मीटर (3510 फ़ुट) की ऊँचाई पर सफ़ेद कोह श्रृंखला में एक प्राकृतिक कटाव है। 
इस दर्रे के ज़रिये भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य एशिया के बीच आवागमन किया जा सकता है और इसने दोनों क्षेत्रों के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी है। 
ख़ैबर दर्रा 33 मील (लगभग 52.8 कि.मी.) लम्बा है और इसका सबसे सँकरा भाग केवल 10 फुट चौड़ा है।
 यह सँकरा मार्ग 600 से 1000 फुट की ऊँचाई पर बल खाता हुआ बृहदाकार पर्वतों के बीच खो सा जाता है।
इस दर्रे के पूर्वी (भारतीय) छोर पर पेशावर तथा लंदी कोतल स्थित है, जहाँ से अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल को मार्ग जाता है। 
उत्तर-पश्चिम से भारत पर आक्रमण करने वाले अधिकांश आक्रमणकारी इसी दर्रे से भारत में आये। 
अब यह दर्रा पाकिस्तान के पश्चिमी पंजाब प्रान्त को अफ़ग़ानिस्तान से जोड़ता है। 
प्राचीन काल के हिन्दू राजा विदेशी आक्रमणकारियों से इस दर्रे की रक्षा नहीं कर सके। 
यह माना जाता है कि मुस्लिम शासन काल में तैमूर, बाबर, हुमायूँ, नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली ने इसी दर्रे से होकर भारत पर चढ़ाई की। 
जब पंजाब ब्रिटिश शासन में आ गया, तभी ख़ैबर दर्रे की समुचित रक्षा व्यवस्था की जा सकी और उसके बाद इस मार्ग से भारत पर फिर कोई आक्रमण नहीं हुआ।

पालघाट दर्रा

पालघाट दर्रा पश्चिमी घाट पर्वत श्रेणी का एक बड़ा दर्रा है। यह प्रायद्वीपीय भारत का प्रमुख दर्रा हैं, जो केरल को तमिलनाडु तथा कर्नाटक से जोड़ता हैं।
यह दर्रा दक्षिण भारत के मध्य केरल राज्य में स्थित है।
नीलगिरि पहाड़ियों (उत्तर) व अन्नामलाई पहाड़ियों (दक्षिण) के बीच में स्थित यह दर्रा लगभग 32 कि.मी. चौड़ा है और केरल-तमिलनाडु सीमा पर स्थित है।
केरल तथा तमिलनाडु दोनों राज्यों के बीच यह दर्रा यातायात के लिए प्रमुख मार्ग की भूमिका निभाता है।
पालघाट दर्रा से होकर गुज़रने वाले राजमार्ग और रेलमार्ग केरल में पालक्काड् को तमिलनाडु में कोयंबत्तुर तथा पोल्लाची से जोड़ते हैं।
दक्षिण भारत की जलवायु को प्रभावित करने में भी यह दर्रा विशेष भूमिका निभाता है।
दक्षिणी-पश्चिम मानसून तथा बंगाल की खाड़ी से उठने वाले तूफ़ान इसी मार्ग से पर्वतीय क्षेत्र को पार करते हैं।

थालघाट

थालघाट प्रायद्वीपीय भारत का प्रमुख दर्रा है।
यह दर्रा पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) में स्थित है।
इस दर्रे से नासिक और भुसावल के रास्ते इन्दौर तथा भोपाल का जुड़ाव है।
यहाँ से होकर मुम्बई-कोलकाता मार्ग गुजरता हैं ।

बोमडिल दर्रा 

अरुणाचल प्रदेश के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। 
इस दर्रे से होकर तिब्बत जाने का मार्ग गुजरता है।
भूटान के पूर्व में अरुणाचल प्रदेश में स्थित यह दर्रा समुद्र तल से 2217 मीटर (7273 फुट) की ऊँचाई पर स्थित है।
यह दर्रा अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत की राजधानी ल्हासा से जोड़ता है।
प्रतिकूल मौसम और बर्फ़बारी के कारण यह शीत ऋतु में बंद रहता है।

बोमडिल दर्रा

बोमडिल दर्रा अरुणाचल प्रदेश के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। 
इस दर्रे से होकर तिब्बत जाने का मार्ग गुजरता है।
भूटान के पूर्व में अरुणाचल प्रदेश में स्थित यह दर्रा समुद्र तल से 2217 मीटर (7273 फुट) की ऊँचाई पर स्थित है।
यह दर्रा अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत की राजधानी ल्हासा से जोड़ता है।
प्रतिकूल मौसम और बर्फ़बारी के कारण यह शीत ऋतु में बंद रहता है।

पांगसौ दर्रा

पांगसौ दर्रा अथवा 'पन सौंग दर्रा' अरुणाचल प्रदेश के दक्षिण म्यांमार सीमा पर स्थित है।
पांगसौ दर्रा समुद्री तल से 1,136 मीटर की ऊंचाई पर है।
इस दर्रे से होकर डिब्रूगढ़ से म्यांमार के लिए मार्ग जाता हे।
यह दर्रा म्यांमार से पश्चिम में असम के मैदानी इलाक़ों तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है।
इतिहासकार अनुमान लगाते हैं कि असम में 13वीं सदी में आकर बसने वाले अहोम लोगों ने इसी दर्रे से भारत में प्रवेश किया था।
इस दर्रे का नाम म्यांमार के एक ग्राम 'पंगसौ' के नाम पर पड़ा है, जो दर्रे से दो कि.मी. पूर्व में बसा हुआ है।
भारत को म्यांमार से जोड़ने वाला 'लेडो मार्ग' इसी दर्रे से निकलता है।

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