Rajasthan ke Lok Geet gk राजस्थान में गाए जाने वाले गीतों के अनुपात में लोकगीतों का दायरा अधिक बड़ा है लोक गीत राजस्थानी संस्कृति के अभिन्न अंग है प्राचीन काल से ही राजस्थानी लोक संगीत प्रेमी है
रविन्द्र नाथ टैगोर ने लोक गीतों को संस्कृति का सुखद संदेश ले जाने वाली कला कहा है ।
महात्मा गाँधी के शब्दों में - लोकगीत जनता की भाषा है ...... लोक गीत हमारी संस्कृति के पहरेदार है ।
देवेन्द सत्यार्थी के अनुसार' लोकगीत किसी सस्कृति के मुँह बोले चित्र है । 
Rajasthan Ke Lok Geet in Hindi
Rajasthan Ke Lok Geet in Hindi 

राजस्थान के लोकगीत - Rajasthan Ke Lok Geet in Hindi

लोकगीत सरल तथा साधारण वाक्यों से ओत-प्रोत होते है और इसमें लय को ताल से अधिक महत्व दिया गया है Rajasthan ke Lok Geet में मुख्यत. तीन वस्तुओं का समायोजन होता है, ये निम्न है गीत ( शब्द योजना ) , धुन ( स्वर योजना ) , वाद्य ( स्वर तथा लय योजना ) ।
rajasthan ke lok geet मे तीन, सात, नौ, बत्तीस व छप्पन संख्याओं का प्रयोग मिलता है और साथ ही लय बनाने के लिए उनमें निरर्थक शब्दों का भी समायोजन कर लिया जाता है ।
कुछ विद्वान लोक वार्ता का प्रथम संकलनकर्ता कर्नल जेम्स टॉड  को मानते है, किन्तु वास्तविक अर्थों में 1892 ईं ० में प्रकाशित C. E. गेब्हर का ग्रंथ ' फोक सांग्स आँफ सदर्न इंडिया ' को भारत में लोक साहित्य का प्रथम ग्रंथ माना जाना चाहिए ।

जच्चा/होलर

परिवार में बालक या पुत्र के जन्म के अवसर पर स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले गीत 'जच्चा/होलर' कहे जाते हैं।
जिनमें प्रायः गर्भिणी की प्रशंसा, वंशवृद्धि का उल्लास व शिशु के लिए मंगलकामना की जाती है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"होलर जाया ने हुई बधाई, ये म्हारा वंश बढ़ायो रे अलबेली जच्चा। 
रंग महल विच जच्चा होलर जायो ये पीलारी मोज ये, 
प्यारी लागे कुल बहु ओ ललना।"

परणेत

परणेत शब्द 'परिणय' से बना है जिसका अर्थ 'विवाह' से होता है, विवाह के समय किए जाने वाले भिन्न कार्यक्रमों के साथ गाए जाते हैं।
जैसे-विनायक, चाक पूजने के समय, पीठी, हड्दहाथ, सवेरा, घोड़ी, निकासी आदि।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"वनखंड री ये कोयल वनखंड छोड़ चली।" 

विनायक

यह मांगलिक कार्यों के देवता हैं किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले विनायक (गणेशजी की पूजा) पूजा कर गीत गाये जाते हैं।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"एक सौ पान सुपारी ड्योढ सै 
म्हारो फलसड़ो कुण खुड़काइयो। 
छोटो सो बिंदायक डगमग डोलै
च्यार लाडू खावा नै

चाक गीत 

विवाह के समय स्त्रियों द्वारा कुम्हार के घर जाकर चाक पूजने (घड़ा) के समय गाया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"माथै मैं महमद पहरल्यो कुम्हारी
तो रखड़ी की छवि न्यारी ।
ए रायजादी ए कुम्हारी।"

फलसड़ा

विवाह के अवसर पर अतिथियों के आगमन पर फलसड़ा गीत गाया जाता है।

बन्ना-बन्नी

राजस्थान में बन्ना/बनड़ा (दूल्हा) व बन्नी/बनड़ी (दुल्हन) के लिए इन शब्दों का प्रयोग किया जाता है और यह गीत विवाह के अवसर पर गाए जाते हैं।
     जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"बना की बनड़ी, फेरा में झगड़ी। 
थे ल्यायां क्यों ना जी, सोना री हंसली। "

पीठी

विवाह के अवसर पर जब दोनों पक्ष के यहाँ वर-वधु को नहलाने से पूर्व पीठी या उबटन लगाते हैं, जिससे उनमें रूपनिखार आए, उस समय ‘पीठी गीत' गाया जाता है।

भात माहेरो

भाई द्वारा बहन के लड़के या लड़की की शादी के अवसर पर भाई बहिन को लाल चुनरी ओढ़ाता है व परिवार में सबके लिए कपड़े लाता है, जिसे भात/मायरा कहते हैं।
बहन के द्वारा उस समय जो गीत गाया जाता है, उसे माहेरा या भात गीत कहते हैं ।

घोड़ी

वर निकासी के समय घुड़चढ़ी की रस्म होती है तब घोड़ी गीत गाए जाते हैं।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"वनड़ो उमायो ए बनी थारै कारणे,
जोड़ी की उमायो ए वड़ गौतम थारै रूप में।" 

जन/जलाल गीत

वधू पक्ष की स्त्रियों द्वारा बारात का डेरा देखने जाते समय यह जला/ जलाया/जलाल गीत गाया जाता है।
     जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"सईयो मोरी रे आयौड़ा जे रे जलालो देश में,
चमक्यारे च्यारे देश......... ( जैसलमेर)"
जलो म्हारी जोड़ रो उदयपुर मालैरे, (जोधपुर) "

ओल्यूँ गीत

ओल्यूँ शब्द का अर्थ 'याद' होता है किसी की याद में ओल्यूँ नामक गीत गाए जाते हैं।
वधू की विदाई के समय वधू पक्ष की की स्त्रियों द्वारा वधू को विदा करते समय 'ओल्यूँ गीत' गाती हैं।

घूमर/लूर गीत

जब औरतें गोलाकार (घेरा बनाकर गोल-गोल घूमना) में नृत्य करती हैं तब यह 'घूमर' कहलाता है।
जोधपुर में इसे 'लूर' कहते हैं। यह नृत्य मुख्यत: गणगौर (मांगलिक कार्यों) के समय किया जाता है।
इसका प्रचलन कोटा व बूंदी (यहाँ गणगौर का प्रसिद्ध मेला भरता है।) में अधिक है।

  1. घूमर - जब साधारण स्त्रियाँ भाग लेती हैं। 
  2. लूहर - जब राजपूत स्त्रियाँ भाग लेती हैं।
  3. झूमरियो - यह बालिकाओं का घूमर है। 

धूड़ला गीत

मारवाड़ में महिलाएँ गौरी पूजन के समय शाम को घूड़ला नृत्य करते समय गाती हैं।
इसमें बालिकाएँ मिट्टी के घड़े में दीपक जलाकर समूह में यह गीत गाती हुए घर-घर जाकर नृत्य करती हैं।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"घुडलो घूमेला ली घूमेला, घुडेले रे बांध्यो सूत। 
घूड़लो घुमे छै, म्हारे घुड़ले रे बांध्यो सूत।
तेल बघे घी घाल, घुड़लो घुमे छै
सुहागण बाहर आय, घुड़लो घूमे छै। 

बधावा गीत

जब घर में कोई शुभ कार्य (मकान की नींव पूजन/गृह प्रवेश/ नांगल, शादी, झडुला, नया व्यवसाय) संपन्न होता है, तब बधावा गीत गाया जाता है, इसे 'मंगलगान' भी कहते हैं।
यह गीत परिवार के प्रमुख सदस्यों को याद करते हुए उनका नाम लेकर आदरपूर्वक गाया जाता है।

हिचकी गीत

किसी प्रिय व्यक्ति के द्वारा याद किए जाने पर व्यक्ति को हिचकी आती है, तब यह गीत गाया जाता है। 
           जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"म्हारा पियाजी बुलाई म्हनै आई हिचकी,
म्हारा साईनाडा रो जी घबरावे,
हिचकी घड़ी घड़ी मत आवै।

गोरबंद गीत 

गोरबंद ऊँट के गले का एक आभूषण' है, जो ऊँट की सजावट करते समय काठी के पास से गरदन पर बाँधा जाता है।
इस गीत में ऊँट के श्रृंगार का वर्णन किया जाता है।
गोरबंद गीत लगभग समस्त मरुस्थलीय प्रदेशों में गाया जाने वाला राजस्थान का बड़ा ही लोकप्रिय गीत है।

कुंरजा गीत

यह सारस जैसा श्वेत बड़ा ही सुंदर पक्षी होता है जो राजस्थान के पश्चिमी जिलों में देखा जाता है।
यह गीत वर्षा ऋतु में गाया जाता है।
ऐसा कहा जाता है, कि प्राचीनकाल में वियोगिनी स्त्रियाँ अपने परदेश गए पति को इसके माध्यम से संदेश देती थीं।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"तू छे कुरंजा भयली एतू छै धरम की ए भाण 
पतरी लिख दूं प्रेम की ए दीजो पियाजी ने जाय
कुरंजा म्हारो भवर मिला दीजे।" 

कांगसियो (बणजारा) गीत

कांगसियों का शाब्दिक अर्थ 'कंघे' से है जो भारतीय संस्कृति में बालों का शृंगार करने के विशेष काम आता है।
विशेषतः कांगसियो गीत गणगौर के मांगलिक अवसर पर गाया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"म्हारै छैल भंवर रो कांगसियो पणिहाऱ्या ले गई रे।" 
ईसरदासजी रो कांगसियो म्है मोल लेस्यां राज,
गोराँ बाई रा लांबा लांबा केश,
कांगसियो बाई रैचिना चड्यो जी राज। " 

काजळियो गीत

भारतीय संस्कृति में काजळ 16 शृंगारों में से एक है यह एक शृंगारिक गीत है।
विवाह में निकासी के समय वर की आँखों में भाभी काजळ डालती है, और औरतें पीछे से रुपए फेंकती हैं तब यह गीत गाया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"काजळ भरियो कूपलो कोई
धर्यो पलंग अध बीच कोरो काजळियो। "

रसिया गीत

रसिया गीत होली के अवसर पर अलवर, भरतपुर (ब्रज क्षेत्र) में किए जाने वाले 'बम नृत्य के साथ गाये जाते हैं।
जिनमें श्री कृष्ण की लीलाओं का उल्लेख किया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"माखन की चोरी छोड कन्हैया मैं समझाऊ तोय। " 

चिरमी गीत

चिरमी एक पौधा होता है, इस पौधे को संबंधित कर वधू द्वारा अपने ससुराल में भाई व पिता की प्रतिक्षा करते समय की मनोदशा का वर्णन किया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"चिरमी रा डाला रा चार, वारी जाऊ चिरमी ने। 

बिछूड़ो गीत

बिछूड़ो गीत हाड़ौती क्षेत्र (कोटा-बूंदी) का लोकप्रिय गीत है।
जिसमें एक पत्नी बिच्छू द्वारा डसने से मरने वाली है तथा अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देते हुए गाती है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं-
"मैं तो मरी होती राज, खा गयो बैरी बीछूडो। 

पंछीड़ा गीत

हाड़ौती व ढूँढ़ाड़ क्षेत्र में मेलों के अवसर पर गाया जाने वाला यह गीत बहुत ही मन को भाता है।
पंछीड़ा शब्द का प्रयोग प्राणों के लिए किया गया है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"पंछीड़ा रे उड़न जाजे पावा गढ़ रे।" 

कामण गीत

वर को जादू टोने से बचाने हेतु गाया जाने वाला गीत 'कामण' कहलाता है।
इसमें स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घ आयु की कामना करती हैं।

झोरावा गीत

प्रेमिका के वियोग में गाये जाने वाला प्रेम विरह गीत 'झोरावा' कहलाता है, जो राज्य में सर्वाधिक जैसलमेर क्षेत्र में गाया जाता है।
यह गीत मांड गायिका अल्लाह जिल्हा बाई द्वारा गाया गया है।
मारवाड़ी विरह गीत 'केसरिया बालम पधारो जी म्हारे देश' राजस्थान का राज्य गीत व रजवाड़ी गीत है।
     जिसके बोल इस प्रकार हैं-
"केसरिया बालम पधारो जी म्हारे देश

हरजस गीत

राम व श्रीकृष्ण की लीलाओं से संबंधित लोक गीत 'हरजस' कहलाता है।
जैसा कि इसके नाम से प्रतीत होता है-हर का अर्थ हरि (कृष्ण/श्रीराम) तथा जस का अर्थ जपना अर्थात् हरि को जपना हरजस कहलाता है।
यह एक प्रकार की राम-कृष्ण धुनी है।

कुकड़ी गीत

रात्रि जागरण का अंतिम गीत 'कुकड़ी गीत' कहलाता है।
यह अधिकतर अमावस्या को गाया जाता है।

लावणी गीत

लावणी से मतलब ‘बुलाने' से है, नायक के द्वारा नायिका को बुलाने के अर्थ में यह गीत गाया जाता है।
शृंगारिक व भक्ति संबंधी लावणियाँ अधिक प्रसिद्ध हैं-जैसे-मोरध्वज, भृर्तहरि, सेऊसमन की लावणियाँ।

दुपट्टा गीत

विवाह के अवसर पर दूल्हे की सालियों द्वारा गाया जाने वाला गीत दुपट्टा गीत कहलाता है।

मोरिया गीत 

मोरिया का अर्थ मोर होता है, चूँकि वर्षा के आने से पूर्व मोर आनंद विभोर हो जाता है।
उसी प्रकार एक लड़की की सगाई हो जाती है, परंतु विवाह में देरी होने के कारण यह गीत गाया जाता है अर्थात् यह विरह गीत है।

हमसीढ़ो

यह उत्तरी मेवाड़ के भीलों का प्रसिद्ध लोकगीत हमसीढ़ो है।
जिसे स्त्री व पुरुष मिलकर गाते हैं।
तेजा गीत किसानों का यह प्रेरक गीत है, जो खेती शुरू करते समय तेजाजी की भक्ति में गाया जाता है व वर्षा के आह्वान की कामना की जाती है।

बिणजारा गीत

इस गीत में पत्नी पति को व्यापार करने हेतु परदेश जाने की प्रेरणा देती है।
     जिसके बोल इस प्रकार हैं-
" बिणजारा ओ, हाँरै लोभी लोग दिसावर जाय, 
थाने सूत्या न सरै बिणजारा ओ

चरचरी गीत

ताल और नृत्य के साथ उत्सवों में गायी जाने वाली रचना 'चरचरी' कहलाती है और उस समय गाया जाने वाला गीत 'चरचरी गीत' कहलाता है।

चौबाली गीत

राजस्थान के लोक गीतों का संस्मरण 'चौबाली' कहलाता है।

पवाड़े गीत

किसी महापुरुष की वीरता के विशेषताओं को वर्णित करने वाली रचना 'पवाड़े' कहलाती हैं।
इसका प्रचलन राजपूतों में अधिक है।

मूमल गीत

यह जैसलमेर में गाये जाने वाला श्रृंगारिक गीत है, इसमें लोद्रवा जैसलमेर की राजकुमारी मूमल का नख-शिख वर्णन किया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"म्हारी बरसाले री मूमल, हालौनी ऐ आली रे देस"
नोट: गणगौर बूंदी व जोधपुर में नहीं मनायी जाती है,

जीरा गीत

राजस्थान का प्रसिद्ध लोकगीत है जिसमें कृषक पत्नी अपने पति से जीरे की खेती में आने वाली कठिनाईयों को व्यक्त करते हुए जीरा नहीं बोने का अनुराध करती है।
     जिसके बोल इस प्रकार हैं-
यो जीरो जीव रो बैरी रे, मत बोओ म्हारा परण्या जीरो। " 

हीडो या हिंडोल्या गीत

राजस्थानी महिलाएँ सावन माह में झूला झूलते हुए इस लोकगीत को गाती हैं।
इसका प्रचलन नवविवाहित महिलाओं व कुँवारी कन्याओं में अधिक है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं-
"सावणियों री हीडो रे बाँधन जाए। " 

सुपणा गीत

विरहणी स्त्री या नायिका के स्वप्न से जुड़ा हुआ गीत सुपणा गीत कहलाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं-
सूती थी रंगमहल में, सूताँ में आओरे जंजाल " 

सूंवटीया गीत

इस लोकगीत द्वारा भील स्त्रियाँ अपने परदेश गए पति को संदेश भेजती हैं।

ईंडोणी गीत

डोणी (पानी के मटके व सिर के बीच में रखने वाली वस्त) काय को लेकर जब पानी भरने जाती हैं तब गाती हैं।
यह महिला सहेलियों द्वारा गाया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
" पाड़ोसण बड़ी चकोर ले गई ईंडोणी। 
ईंडोणी रे कारण म्हारी सासू बोलै बोल ।
 गम गई ईंडोणी। "

मरांसिये गीत

मारवाड़ क्षेत्र में प्रभावशाली व्यक्ति की मृत्यु पर गाये जाने वाले हृदयभेदी मार्मिक लोकगीत जैसे-रतनराणा एक मार्मिक गीत है।

पावणा गीत

नये दामाद (किसी घर में ब्याहे जाने वाले व्यक्ति) के ससुराल आने पर स्त्रियाँ भोजन करवाते समय गीत गाती हैं उसे पावणा गीत कहते हैं।

कुकडलू गीत

शादी के अवसर पर जब दूल्हा तोरण पर पहुँचता है तो वहाँ की स्त्रियाँ दुल्हे के स्वागत के रूप में कुकड़लू लोक गीत गाती हुई आरती उतारती हैं।
इसे झिलमिल भी कहते हैं।
इस वक्त सास द्वारा दामाद को रस्सी से नापा जाता है।

दारूड़ी गीत

दारूड़ी का शाब्दिक अर्थ शराब होता है।
राजा महाराजाओं और सामंतों की महिलाओं की महफिलों में यह लोकगीत गाया जाता है जो उनके मद्यपीय जीवन को व्यक्त करता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
"दारूड़ी दाखाँ री म्हारै भंवर ने थोड़ी-थोड़ी दीजियो ए "  

सीठणे गीत

सोठणे का अर्थ 'गाली' होता है अत: इसे गाली गीत भी कहते हैं।
यह होली दहन से पहले गाया जाता है।

कागा गीत

इसमें विरहिणी नायिका कौए को संबोधित करते हुए अपने प्रियतम के आने का शगुन मनाती है और कौए को प्रलोभन देकर उड़ने को कहती है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं-
"उड़-उड़रे म्हारा काळा रे कागजा,
जद म्हारा पिवजी घर आवै। " 

पणिहारी गीत 

पनघट से पानी भरने वाली स्त्री को 'पणिहारी' कहते हैं।
यह राजस्थान का प्रसिद्ध लोकगीत है, जिसमें राजस्थानी स्त्री का पतिव्रत धर्म पर अटल रहना बताया गया है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं-
"सागर पाणीने जाऊँ सा हो नजर लग जाए। "

गणगौर गीत

गणगौर पर स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला प्रसिद्ध लोकगीत है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं -
" खेलन द्यो गणगौर, भंवर म्हानै खेलन द्यो गणगौर। 
म्हारी सखियाँ जावें बाट हो भंवर म्हाने खेलण दो गणगौर। "

ढोला-मारू गीत

यह ढोला-मारू की प्रेमकथा पर आधारित सिरोही क्षेत्र का लोकगीत है जिसे ढाढ़ी गाते हैं।

पपैयो गीत

पपीहा पक्षी (वर्षा ऋतु में बोलने दाम्पत्य प्रेम के आदर्शों को दर्शाने वाला) पर राज्य के कई भागों में 'पपैयो' गीत गाया जाता है।
इसमें प्रेयसी अपने प्रियतम से उपवन में आकर मिलने की प्रार्थना करती है।

पीपली गीत

राज्य के रेगिस्तानी इलाकों विशेषतः शेखावाटी, बीकानेर तथा मारवाड़ के कुछ भागों में स्त्रियों द्वारा वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला लोकगीत है।
जिसमें एक विरहणी के प्रेमोद्गारों को अभिव्यक्त कर प्रेयसी अपनी परदेसी पति को बुलाने के लिए गाती है।

रातीजगा गीत

विवाह, पुत्र जन्मोत्सव, मुंडन आदि शुभ अवसरों पर अथवा मनौती मनाने पर रात भर जाग कर गाए जाने वाले किसी देवता के गीत 'रातीजगा' कहलाते हैं।

बादली गीत

बादली शेखावाटी, मेवाड़ व हाडौती क्षेत्र में गाया जाने वाला वर्षा ऋतु से संबंधित गीत है।
     जिसके बोल इस प्रकार हैं-
" बादली बरसे क्यूँ नी ए, बीजली चमके क्यूँ नी ए।

बीरा गीत

बीरा नामक लोकगीत ढूँढ़ाड़ अंचल में भात संपन्न होने के समय गाया जाता है।
इस गीत के द्वारा बहन द्वारा अपने भाई को स्नेह भरा निमंत्रण दिया जाता है।
    जिसके बोल इस प्रकार हैं-
" बीरा म्हारे रमा क्षमा सँ आज्यो जी।   

कळाळी गीत

कळाळी गीत सवाल-जवाब का गीत है।
एक छैल कळाळी (शराब निकालने वाले व बेचने वाली जाती) को अपने साथ चलने के लिए मनुहार करता है किंतु वह साथ जाने को तैयार नहीं होती है।
यह एक शृंगारित गीत है।

गढ़ गीत

ढोली, दमामी, मुसलमान, तवायफें इन गीतों को गाते हैं।
प्रमुख गढ़ गीतों में रतन राणौ, जला, पणिहारी, बायरियो, घूसो, राणे, सूमरो, मूमल, झालों, पाँखियों, आदि।

लोरी गीत

यह गीत माँ द्वारा अपने बच्चों को सुलाने के लिए गाया जाता है।
पूरे राजस्थान में यह गायी जाती है।

राजस्थान की लोक गायन शैलियां

माण्ड गायन शैली

10 वीं 11 वीं शताब्दी में जैसलमेर क्षेत्र माण्ड क्षेत्र कहलाता था। 
अतः यहां विकसित गायन शैली माण्ड गायन शैली कहलाई।
एक श्रृंगार प्रधान गायन शैली है।

प्रमुख गायिकाएं

अल्ला-जिल्हा बाई (बीकानेर) - केसरिया बालम आवो नही पधारो म्हारे देश।
गवरी देवी (पाली) भैरवी युक्त मांड गायकी में प्रसिद्ध
गवरी देवी (बीकानेर) जोधपुर निवासी सादी मांड गायिका।
मांगी बाई (उदयपुर) राजस्थान का राज्य गीत प्रथम बार गाया।
जमिला बानो (जोधपुर)
बन्नों बेगम (जयपुर) प्रसिद्ध नृतकी "गोहरजान" की पुत्री है।

मांगणियार गायन शैली

राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र विशेषकर जैसलमेर तथा बाड़मेर की प्रमुख जाति मांगणियार जिसका मुख्य पैसा गायन तथा वादन है।
मांगणियार जाति मूलतः सिन्ध प्रान्त की है तथा यह मुस्लिम जाति है।
प्रमुख वाद्य यंत्र कमायचा तथा खड़ताल है।
कमायचा तत् वाद्य है।
इस गायन शैली में 6 रंग व 36 रागिनियों का प्रयोग होता है।

प्रमुख गायक 

सदीक खां मांगणियार (प्रसिद्ध खड़ताल वादक)
साकर खां मांगणियार (प्रसिद्ध कम्रायण वादक)

लंगा गायन शैली

लंगा जाति का निवास स्थान जैसलमेर-बाडमेर जिलों में है।
बडवणा गांव (बाड़मेर) " लंगों का गांव" कहलाता है।
यह जाति मुख्यतः राजपूतों के यहां वंशावलियों का बखान करती है।
प्रमुख वाद्य यत्र कमायचा तथा सारंगी है।

प्रसिद्ध गायकार
अलाउद्दीन खां लंगा, करीम खां लंगा

तालबंधी गायन शैली

औरंगजेब के समय विस्थापित किए गए कलाकारों के द्वारा राज्य के सवाईमाधोपुर जिले में विकसित शैली है।
इस गायन शैली के अन्तर्गत प्राचीन कवियों की पदावलियों को हारमोनियम तथा तबला वाद्य यंत्रों के साथ सगत के रूप में गाया जाता है।
वर्तमान में यह पूर्वी क्षेत्र में लोकप्रिय है।

हवेली संगीत गायन शैली

प्रधान केन्द्र नाथद्वारा (राजसमंद) है।
औरंगजेब के समय बंद कमरों में विकसित गायन शैली।

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