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Rajasthan Ke Lok Devta in Hindi
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राजस्थान के प्रमुख लोक देवता | Rajasthan Ke Lok Devta GK in Hindi

समय-समय पर उत्कृष्ट कार्य, बलिदान, उत्सर्ग या परोपकार करने वाले महापुरुषों को 'लोक देवता' या 'पीर' कहा जाता है।
राजस्थान के पंचपीर-पाबू, हरबू, रामदेव, मांगलियामेहा। पाँचों पीर 'पधारजो, गोगाजी जेहा।।'

बाबा रामदेव जी

बाबा रामदेव का जन्म 1352 ई. (विक्रम संवत् 1409) 'उंडूकासमेर' (बाड़मेर) में भाद्रभद शुक्ल द्वितीया (बाबेरी बीज) को तँवर वंशीय राजपूत परिवार में हुआ था। 
इनके पिता का नाम 'ठाकुर अजमाल', माता का नाम 'मैनादे' व बड़े भाई का इ नाम 'वीरमदेव' (बलराम का अवतार) था। 
इनका विवाह अमरकोट (वर्तमान में पाकिस्तान में) के सोढ़ा दलैसिंह की पुत्री 'निहालदे/ नेतल दे' के साथ हुआ।
बाबा रामदेव मल्लीनाथ जी के समकालीन थे। 
क राक्षस का वध किया।
रामदेवजी बालीनाथ जी के शिष्य थे
रामदेवजी के मेले पर कामड़ जाति की महिलाएँ तेरह मजीरों के साथ 'तेरहताली नृत्य' करती हैं। 
रामदेवजी हिंदु धर्म के प्रबल समर्थक थे जिन्होंने हिंदु धर्म के शुद्धिकरण के लिए 'शुद्धि आंदोलन' चलाया।
रामदेवजी एकमात्र ऐसे लोक देवता थे जो कवि थे।
रामदेवजी का मेला-रूणेचा (रामदेवरा में) प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक लगता है।

रामदेवजी के प्रमुख मंदिर-

(अ) रामदेवरा (जैसलमेर)
यहाँ रामदेवजी व डाली बाई की समाधि स्थित है। 
जहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को मेला लगता है।
(ब) बराठिया का मंदिर (अजमेर)
यह अजमेर जिले में 'बर' नामक स्थान पर स्थित है। 
यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल एकादशी को मेला लगता है।
(स) सुरता खेड़ा (चित्तौड़गढ़)
प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल प्रथमा  read more...

वीर तेजाजी महाराज

वीर तेजाजी का जन्म 1074 ई. (विक्रम संवत् 1131) 'खड़नाल' (नागौर) में 'धौल्या' गोत्र के नागवंशीय जाट परिवार में हुआ। 
इनके पिता का नाम 'ताहड़', माता का नाम 'राज कुँवरी' एवं पत्नी का नाम 'पैमल दे' (पन्हेर गाँव-अजमेर के रायचंद्र की पुत्री) था।
तेजाजी को साँपों का देवता, गायों का मुक्तिदाता, कालाबाला का देवता, कृषि कार्यों का उपकारक देवता, धौलिया वीर आदि नामों से जाना जाता है।
तेजाजी को अजमेर जिले के ब्यावर कस्बे से 10 किमी. दूर 'सैंदरिया गाँव में सर्प ने डसा, तो सुरसूरा (किशनगढ़ अजमेर) में उनकी मृत्यु हुई। 
तेजाजी पहले लोक देवता जिन्हें सर्पदंश के इलाज के लिए आयुर्वेद का प्रयोग किया। 
आज भी भांवता (अजमेर ) में स्थित तेजाजी के मंदिर में सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति की गौमुत्र से निःशुल्क चिकित्सा की जाती है। तेजाजी अजमेर जिले के सर्वप्रमुख इष्ट देवता हैं तो उनकी कर्मस्थली दुगारी गाँव (बूंदी) है।
तेजाजी की कृषि के देवता के रूप में मानते है और किसान हल जोतते वक्त तेजाजी की जीवनी गाता है।
तेजाजी के नाम पर परबतसर नागौर में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्लपक्ष दशमी को राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है।
सहरिया जनजाति का अराध्य देव-वीर तेजाजी जिनके नाम पर बारां जिले में सीताबाड़ी (सहरिया जनजाति का कुंभ) तेजाजी का मेला आयोजित किया जाता है। read more...

लोक देवता पाबूजी

पाबूजी का जन्म 1239 ई. (विक्रम संवत् 1296) कोलू कोलूमंड (जोधपुर) में राठौड़ राजवंश में हुआ। 
इनके पिता का नाम 'धांधलजी राठौड़', माता का नाम 'कमला दे' एवं पत्नी का नाम 'फूलम दे' (अमरकोट के सोढ़ा राजा सूरजमल की पुत्री) था। 
पाबूजी की घोड़ी का नाम 'केसर कालमी' था।
पाबूजी को ऊँटों का देवता, गौरक्षक देवता, प्लेग रक्षक देवता, हाड़-फाड़ देवता, लक्ष्मण जी का अवतार, मेहर जाति के मुसलमान 'पीर' आदि नामों से जाना जाता है
मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय 'पाबूजी' कोजाता है।
पाबूजी का प्रतीक चिहन भाला है।
पाबूजी के सहयोगी स्मृति में थाली नृत्य' करते हैं।
पाबूजी बाईं ओर झुकी पाग (पगड़ी) प्रसिद्ध है। 
इनका मंदिर कोलूमंड (फलौदी-जोधपुर) में है जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को मेला लगता है। 
मुगल कालीन पाटन शासक मिर्जा खाँ नामक जो बड़े पैमाने पर गौ हत्या में लिप्त रहा उनके विरुद्ध पाबूजी ने युद्ध किया तथा गौ हत्या रूकवाई।

गोगाजी महाराज

गोगाजी का जन्म विक्रम संवत् 1003 ददरेवा (चूरू) में नागवंशीय चौहान परिवार में हुआ। 
इनके पिता का नाम 'जेवर सिंह', माता का नाम 'बाछल', गुरु का नाम 'गोरखनाथ जी' एवं पत्नी का नाम 'के लमदे' (कीलमंद्र (कोलूमंड) के राठौड़ बूड़ोजी की पुत्री) था।
गोगाजी को नागों का देवता, जाहरपीर, हिंदु धर्म में नागराज का अवतार, मुस्लिम धर्म में गोगापीर आदि नामों से जाना जाता है।
कर्मसिंह या कायम सिंह गोगा जी कि 17वीं पीढी में हुए थे। 
जिन्हें मुसलमानों ने बलपूर्वक मुसलमान (कायमखानी मुसलमान) बनाया था। 
जिनके वंशज आज गोगा जी को अपना पूर्वज मानते हैं। 
गोगाजी के चरण चिह्न (थान) खेजड़ी के वृक्ष के नीचे बना होता है, जहाँ मूर्ति स्वरूप एक पत्थर पर सर्प की आकृति अंकित होती है। 
गोगा जी के लिए राजस्थान में यह कहावत प्रसिद्ध है।
गाँव-गाँव खेजड़ी ने, गाँव-गाँव गोगा जी। 

गोगाजी के प्रिय भक्त 'डेरू' वाद्य यंत्र का प्रयोग करते हैं। 
गोगाजी के भक्त नृत्य करते समय नगाड़ा या ढोल वाद्य यंत्र का प्रयोग करते हैं उसे 'माठ' कहते हैं। 
गोगा जी राजस्थान के ऐसे लोक देवता है, जिन्हें राज्य के अलावा पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, में पूजा जाता है। 

गोगाजी से संबंधित स्थल

गोगाजी का मंदिर गोगामेड़ी/धूरमेढ़ी-नौहर (हनुमानगढ़) में स्थित जहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी) को मेला लगता है। 
गोगामेड़ी का निर्माण फिरोजशाह तुगलक के द्वारा मकबरानुमा आकृति में किया गया जिसके मुख्य दरवाजे पर बिस्मिल्लाह का चिह्न अंकित है। 
लेकिन वर्तमान स्वरूप बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने प्रदान किया। 
गुरु गोरखनाथ का तपस्या स्थल नौलाब बाग गोगामेड़ी में ही स्थित है। 
गोगामेड़ी के चारों तरफ जंगल को, जो गोगाजी की। 
'पणी रोपण' एवं 'जोड़' के नाम से पुकारा जाता है।
गोगाजी की ओल्डी (झोंपड़ी) सांचौर (जालौर)-इसकी स्थापना पाटम के दो भाईयों के द्वारा की गई तथा केरियाँ गाँव के राजाराम कुम्हार ने यहाँ मंदिर का निर्माण किया।

देवबाबा 

देवबाबा के प्रति गुर्जर जाति में अपार श्रद्धा है। 
इन्हें पशु चिकित्सा का ज्ञान था इसी कारण पशुओं की बीमारियों का सफल इलाज तथा कष्टों के निवारण करते थे इसी कारण ग्वाला समुदाय में ग्वालों के पालनहार, कष्ट निवारक देवता आदि नामों से प्रसिद्ध हैं।
देव बाबा का मंदिर नगला जहाज, तहसील-वैर (भरतपुर) में है। 
जहाँ वर्ष में दो बार मेला (पहला मेला भाद्रपद शुक्ल पंचमी व दूसरा मेला चैत्र मास शुक्ल पंचमी।) आयोजित किया जाता है।
इन्होंने अपनी मृत्यु के बाद अपनी बहन 'एलादी' को भात पहनाया था।
देव बाबा की सवारी (वाहन) भैंसा (पाड़ा) होता है। 
इसमें इनके हाथ में झाड व दूसरे हाथ में लाठी लिए सवार प्रतिमा होती है। 
इनका स्थान नीम के पेड़ के नीचे स्थित होता है। 
देवनारायण जी को राज्य क्रांति का जनक मानते हैं। 
देवनारायण जी ने भिनाय (अजमेर) के शासक को मारकर अपने बड़े भाई ‘महेंदु' को राजा बनाया था। देवनारायणजी पर फ़िल्म बन चुकी है फ़िल्म में देवजी की भूमिका 'नाथू सिंह गुर्जर' ने की थी। 
नाथूसिंह गुर्जर भारतीय जनता पार्टी के नेता, सांसद विधायक और राजस्थान राज्य मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे हैं।

मल्लीनाथ जी महाराज 

मल्लीनाथ जी का जन्म 1358 ई. (विक्रम संवत् 1415) तिलवाड़ा (बाड़मेर) में हुआ। 
इनके पिता का नाम 'रावल सलखा' (राव तीडा), माता 'जीणादे' तथा मल्लीनाथ के ताऊ 'कान्हड़दे' (मारवाड़ शासक) थे। 
मल्लीनाथ जी ने अपने भतीजे राव चूडा की मंडौर व नागौर जीतने में मदद की।
मल्लीनाथ जी को सिद्धपुरुष, चमत्कारी योद्धा के उपनामों से तथा लोकमानस में इन्हें 'त्राता' (रक्षक) के रूप में जाना जाता है। 
1378 ई. में इन्होंने मालवा के सुबेदार निजामुद्दीन को पराजित कर यश और प्रतिष्ठा की प्राप्ति की। 
बाड़मेर जिले के 'मालानी क्षेत्र का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा।
इनका प्रमुख मंदिर लूनी नदी के किनारे पर स्थित तिलवाड़ा (बाड़मेर) में स्थित है जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र मास में कृष्ण ग्यारस से शक्ल पक्ष ग्यारस तक मेला लगता है। 
यह राजस्थान राज्य का सबसे प्राचीन पशु मेला कहलाता है।
इनकी पत्नी 'रूपादे' का मंदिर तिलवाड़ा के निकट माला जाल गाँव (बाड़मेर) में स्थित है। 
मल्लीनाथ जी ने अपनी रानी रूपादे की प्रेरणा से 1389 ई. में उगमसी भाटी से योग साधना की दीक्षा ग्रहण की। 
1399 ई. में मारवाड़ में संतों को एकत्र कर हरिकीर्तन का आयोजन करवा कर 'कुंडापंथ' की स्थापना की और उसी दिन चैत्र शुक्ल द्वितीया को स्वर्गवास हो गया। 
मल्लीनाथजी के बारे में कहावत प्रसिद्ध है"तेहर तुंगा भांगिया माले सलखाणी"

वीर कल्लाजी महाराज 

वीर कल्लाजी का जन्म सामियान गाँव (मेड़ता-नागौर) में 1544 ई. (विक्रम संवत् 1601 ) में राठौड़ राजपूता परिवार में हुआ था। 
वीर कल्ला जी 'चार हाथों वाले देवता' (शेषनाग का अवतार) वाले लोकदेवता के रूप में प्रसिद्ध हुए। 
इन्हें बालब्रह्मचारी, योगी कमधण, अस्त्र-शस्त्र विद्या के पारंगत आदि उपनामों के नाम से जाना जाता है।
वीर कल्लाजी अपनी कुल देवी 'नागणेची माता के भक्त व सिद्ध चिकित्सक थे, जिनकी छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भैरवपोल में स्थित है जहाँ प्रतिवर्ष आश्विन शुक्ल नवमी को मेला लगता है।
कल्लाजी की मुख्य पीठ 'रनेला' में स्थित है, तो डूंगरपुर जिले के सामलिया क्षेत्र में कल्लाजी की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है। 
इस मूर्ति पर प्रतिदिन केसर तथा अफ़ीम चढ़ाई जाती है। 

हड़बूजी महाराज

हडबूजी का जन्म मूंडेल ग्राम (नागौर) में 'मेहाजी' के यहाँ साँखला राजपूत वंश में हुआ। 
हड़बू जी 'गुरु बालीनाथ' के शिष्य तथा बाबा रामदेव के मौसेरे भाई थे। 
इन्हें वचन सिद्धपुरुष/चमत्कारी पुरुष/शकुन शास्त्र का ज्ञाता/योगी संन्यासी/वीर योद्धा के उपनामों से जाना जाता है। 
हड़बूजी का वाहन 'सियार' है।
हड़बूजी का मंदिर बेंगटी (फलौदी, जोधपुर) में बना हुआ है जिनके पजारी साँखला राजपूत होते हैं। 
मंदिर का निर्माण 1721 ई. में जोधपुर महाराजा अजीतसिंह के द्वारा किया गया।
हड़बू जी के मंदिर में किसी मूर्ति की पूजा नहीं की जाती अपितु जिस बैलगाड़ी से हडबू जी पंगु/अशक्त गौवंशों के लिए घास भर कर लाते थे उसी बैलगाड़ी की उनके प्रिय भक्तों द्वारा पूजा की जाती है।
हड़बू जी जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के समकालीन थे। 
हड़बूजी ने राव जोधा को साम्राज्य विस्तार के लिए उन्हें एक कटार एवं घोड़ा दिया और राव जोधा का राज्य स्थापित हो जाने के पश्चात् इन्हें बंगेटी गाँव एवं गाड़ी उपहार में दी। 
राव जोधा ने अपना अंतिम समय हड़बू जी के यहाँ बिताया। 
समाधि लेने के बाद बाबा रामदेव ने हड़बूजी को दर्शन देकर 'एक रतन कटोरा व सोहन चुटिया' भेट की थी।                  रामदेवजी ने अपने ग्रंथ 'चौबीस वाणियों में लिखा है कि -
हड़बू जी साँखला हर दम हाजिर गाँव बेंगटी माही "

हडबू जी ने 'रूणेचा' में बाबा रामदेव के समाधि लेने के आठवें दिन स्वयं जीवित समाधि ले ली थी।

बिग्गाजी महाराज

बिग्गाजी का जन्म 1301 ई. (विक्रम संवत् 1358) को 'रीडी गाँव' (बीकानेर) एक किसान जाट परिवार में पिता ‘राव मोहन' माता 'सुल्तानी' के यहाँ हुआ। 
बिग्गाजी विक्रम संवत् 1393 में गौरक्षार्थ मुस्लिम लूटेरों से राठाली-जोहड़ी के युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 
जाखड़ (जाट) समाज वीर बिग्गाजी को अपना कुल देवता मानता है।
बीकानेर जिले में श्रीडूंगरपुर तहसील में बिग्गा नामक गाँव में प्रतिवर्ष 14 अक्टूबर को बिग्गा जी की स्मृति में मेला आयोजित होता है।

भूरिया बाबा महाराज 

भूरिया बाबा ‘गौतम बाबा' के नाम से भी जाना जाता है जो शौर्य के प्रतीक रहे हैं। 
सिरोही जिले में अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य सूकड़ी नदी (जिसे लोग 'पतित गंगा' भी कहते है) के किनारे पर दिल्ली-अहमदाबाद रेलमार्ग के नाणा रेलवे स्टेशन से 10 किमी. दूर गौतमेश्वर ऋषि महादेव (भूरिया बाबा) का प्रमुख मंदिर स्थित है।  
इस मंदिर निर्माण एक गुजर्र ने शुरू किया परंतु मीणा जाति ने इसे पूर्ण करवाकर यहाँ प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा की।
यहाँ प्रतिवर्ष मकर सक्रांति के 90 दिन बाद (13 अप्रैल से 15 मई के बीच) मेला लगता है। 
यह मेला 'मीणा जनजाति' का प्रसिद्ध मेला है। 
मीणा जनजाति का अराध्य देव भूरिया बाबा हैं। 
मीणा जनजाति का व्यक्ति गौतमेश्वर ऋषि महादेव (भूरिया बाबा) की झूठी कसम नहीं खाता है।

बाबा मामादेव 

बाबा मामादेव को वर्षा के लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। 
इनकी मूर्ति मिट्टी या पत्थर की न होकर लकड़ी के कलात्मक तोरण बनाकर गाँव के मुख्य प्रवेश मार्ग पर स्थापित किए जाते हैं। 
इन्हें प्रसन्न करने के लिए 'भैंस की कुर्बानी' दी जाती है। 
इनका प्रमुख मंदिर 'स्यालोदड़ा' (सीकर) में स्थित है जहाँ प्रतिवर्ष रामनवमी को मेला लगता है। 

मेहा मांगलिया जी 

मेहा जी मांगलिया राज्य केपंचपीरों में गीने जाते है। 
इनके पिता का नाम 'गोपालराज सांखला' था। 
इनका जन्म पंवार क्षत्रिय परिवार में हुआ जो राव चूडा के समकालीन थे। 
प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि इनका लालन पालन इनके ननिहाल में 'मांगलिया' गोत्र में हुआ था इसलिए 'मेहा जी मांगलिया' के नाम से प्रसिद्ध हुए जबकि अन्य शोधकर्ता 'साँखला राजपूत' मानते हैं।
मेहा मांगलिया जी जैसलमेर के राव राणगदेव भाटी से युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। 
इनके प्रिय घोडों का नाम 'किरड काबरा' था। 
इनका मंदिर बापणी (जोधपुर) में है जहाँ भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी को मांगलिया राजपूत मेहाजी की अष्टमी मनाते हैं।

तल्लीनाथ जी 

तल्लीनाथजी शेरगढ़ ठिकाने (जोधपुर) के राव मालदेव के भाई वीरमदेव के पुत्र तथा मंडौर के शासक 'राव चूडा' के भाई थे। 
इनका वास्तविक नाम 'गांगदेव राठौड़' था। 
इनके गुरु 'गुरु जालंधर नाथ' नाथ संप्रदाय के थे।
बाबा तल्लीनाथ प्रकृति प्रेमी थे, इस कारण इन्हें प्रकृति प्रेमी लोक देवता माना जाता है। 
इनके पूजा स्थान जालौर जिले के पंचमुखी' पहाड़ी (पांचोटा गाँव के पास) के बीच घोड़े पर सवार बाबा तल्लीनाथ की मूर्ति हैं जहाँ कोई भी पेड़-पौधों को नहीं काटता। 
जालौर क्षेत्र के लोग इन्हें 'ओरण' मानते है। 
व्यक्ति या पशु के बीमार होने तथा जहरीले जीव के काँटने पर इनके नाम का डोरा बाँधा जाता है।

रूपनाथ (झरडा) जी महाराज 

रूपनाथजी प्रसिद्ध लोक देवता पाबू जी के बड़े भाई 'बूढों जी' के पत्र थे। 
इन्होंने अपने पिता व चाचा (पाबू जी) की मृत्यु का बदला जींदराव खींची को मार कर लिया।
इनका प्रमुख थान कोलूमंड (जोधपुर) तथा सिंभूदड़ा (नोखा मंडी) बीकानेर एक दूसरा प्रमुख स्थान है। 
इन्हें हिमाचल प्रदेश में 'बालकनाथ' के रूप में पूजा जाता है।

केसरिया कुंवर जी 

केसरिया कुंवर गोगा जी के पुत्र थे, जो लोक देवता के रूप में पूजे जाते है। 
इनका भोपा सर्पदंश के रोगी का जहर मुँह से चूसकर बाहर निकाल देता है। 
इनके थान पर सफेद रंग का ध्वज फहराते हैं।

बाबा झंझार जी

झंझार जी का जन्म सीकर जिले के नीमका थाना तहसील के इमलोहा कस्बे में एक राजपूत परिवार में हुआ था। 
एक बार मुस्लिम लूटेरे गाँव में लूट के लिए घुस आए तब एक ही परिवार के तीन सगे भाईयों ने लुटरों से युद्ध किया।  
परंतु युद्ध में इन तीनों भाईयों के शीश कट गए लेकिन उनके धड़ निरंतर दुश्मनों से युद्ध करते रहे। 
लोक मान्यता के अनुसार इसी वक्त एक बारात वहाँ से गुजरी जिसके फलस्वरूप बारातियों व दुल्हा-दुल्हन का भी वध कर दिया गया।
स्यालोदड़ा गाँव (सीकर) में तीन भाईयों एवं दूल्हा-दुल्हन के पाँच प्रस्तर स्तंभ बने हुए है। 
तीनों भाई आपसी प्रेम तथा बलिदान से जन में लोकप्रिय हुए। 
बाद में ये ही लोक देवता झुंझार बाबा के रूप में प्रसिद्ध हुए। 
स्यालोदड़ा गाँव में हर वर्ष रामनवमी के दिन बाबा झंझार जी का मेला लगता है। 
बाबा झूझार जी का स्थान सामान्यतः खेजड़ी के पेड़ के नीचे होता है।

वीर फत्ता जी महाराज 

वीर फत्ता जी का जन्म सांधू गाँव (जालौर) के ही गज्जारिणी परिवार में हुआ। 
इन्होने सांथू गाँव पर लुटेरों के आक्रमण पर उनसे भीषण युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए जहाँ फत्ताजी का विशाल मंदिर है। 
प्रतिवर्ष भादवा सुदी नवमी को सांथू गाँव में विशाल मेला भरता है।
पनराज जी इनका जन्म जैसलमेर जिले के नया गाँव के एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। 
गौ वंश की रक्षा के लिए गोगा जी, तेजा जी, पाबू जी की तरह पनराज जी का नाम अमर है।
इन्होंने मुस्लिम लूटेरों से कोठाडी गाँव के ब्राह्मणों की गाय छुडाते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया। 
इनकी स्मृति में जैसलमेर जिले के पनराजसर गाँव में वर्ष में दो बार भाद्रपद शुक्ल दशमी और माघ शुक्ल दशमी को मेला लगता है।

हरीराम बाबा या हीरामल बाबा 

हरीराम बाबा का जन्म विक्रम संवत् 1959 में हुआ। 
हरिराम बाबा के पिता का नाम 'राम नारायण' व माता का नाम 'चंदणी देवी' था। 
इन्होंने सांप के काँटे के इलाज करने के लिए मंत्र सीखा।
बाबा का मंदिर सुजानगढ़ से नागौर मार्ग पर 'चारू गाँव' से तीन किमी. कच्चे रेतीले टीलों के बीच 'झोरड़ा गाँव' में बना हुआ है। 
मन्दिर के गर्भ गृह की विशेषता यह है कि इसमें बाबा की मूर्ति नही है, अपितु साँप की बांबी और बाबा के प्रतीक के रूप में चरणं कमल होते हैं।

वीर बावसी महाराज 

वीर बावसी आदिवासी के प्रसिद्ध लोक देवता के रूप में जाने जाते हैं। 
वीर बावसी प्रतापसिंह मंडेला के पुत्र थे जिन्होंने गौ रक्षा हेतु अपने प्राण त्याग दिए। 
वीर बावसी का मंदिर अरावली पर्वतमाला की दुर्गम घाटियों में काला टोकरा में बना हुआ है जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल पंचमी को विशाल मेला भरता है।

इलोजी 

राजस्थान के मारवाड़ में छेड़छाड़ के अनोखे लोकदेवता के रूप में पूज्य इलोजी अविवाहितों को दुल्हन, नव दम्पतियों को सुखद गृहस्थ जीवन और बांझ स्त्रियों को संतान देने में सक्षम है जबकि वे स्वयं जीवन भर कुँवारे रहे।

इलोजी की कथा

इलोजी राजा हिरण्यकश्यप के बहनोई थे। 
जब इलोजी की बारात हिरण्यकश्यप के घर पहुँची तो वहाँ हिरण्यकश्यप की बहन होलीका अपने भतीजे प्रहलाद को अग्नि में जलाने के लिए अग्नि में उसे लेकर बैठी लेकिन प्रहलाद तो बच गया लेकिन उसकी बुआ होलीका अग्नि में जल गई। 
ईलोजी को इस बात का पता चला तो बड़ा दुख हुआ।
इलोजी तो सुधबुध ही खो बैठे। 
उन्होंने अपने सारे राजसी वस्त्र उतार फेंके तथा उस गर्म राख को ही अपने शरीर पर लपेटने लगे वही प्रसंग धुलंडी नाम से प्रारंभ हुआ अतः प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होलिका दहन होता है और दूसरे दिन धुलंडी को सारे लोग रंग-गुलाल से खेलते हैं। 
इलोजी क्षत्रिय व गाछी जाति में लोकप्रिय है। 
इनके मंदिर में आदमकद नग्न मूर्ति स्थापित की जाती है।

आलमजी 

आलमजी का मूल नाम जैतमलोत राठौड था। 
बाडमेर जिले के मालाणी प्रदेश में लूणी नदी के किनारे स्थित राड़धरा क्षेत्र ढांगी नाम के रेतीले टीले पर इनके स्थान पर इन्हें लोक देवता के रूप में पूजा जाता है, जिसे आलम जी का धोरा भी कहते है। 
यहाँ भ्रादपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मेला भरता है।
 इनके बारे में एक दोहा है।
"धर ढागी आलम धणी, परधल लूणी पास। 
लिख्यो जिणने लाणसी, राइधरो रहवास।"

दूंगजी जंवार जी 

सीकर जिले के 'बाठोठ-पाटोदा' नामक स्थान के निवासी दूंगजी मुंवार जी कछवाहा वंश के राजपूत थे। 
दोनों काका-भतीजे थे। 
दोनों धाडायती' (धनवानों को लूटकर ग़रीबों को धन बाँटने वाले) थे। 
एक बार रामगढ़ के प्रसिद्ध सेठ घुरसामल अणतमल की बालद (जिसमें माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक बैलगाड़ियों तथा ऊँट के काफ़िले से ले जाया जाता है) को लूटकर पुष्करजी के घाट पर ग़रीबों को बाँट दिया था। 
दूंगजी का ससुराल झाडावास के गौड़ राजपूतों के यहाँ था। 
दूंगजी के साले ने ही अंग्रेजों से मिलकर झाड़ावास में बंदी बना लिया और आगरा जेल में डाल दिया। 
गँवारजी ने करणिया मीणा व लीटीया जाट के सहयोग से छुड़ा लाए। 
डूंगजी को जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह ने शरण दी जबकि गँवारसिंह जी को बीकानेर के शासक रतनसिंह ने शरण दी।