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रेग्युलेटिंग एक्ट 1773

Regulating Act of 1773 in Hindi -  रेग्युलेटिंग एक्ट 1773

1773 का विनियमन अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास में पहला मील का पत्थर था जिसे लॉर्ड नॉर्थ या फ्रेडरिक नॉर्थ द्वारा भारत और साथ ही यूरोप में ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों के बेहतर प्रबंधन के लिए कुछ नियम स्थापित करने के लिए पेश किया गया था।
प्लासी की लड़ाई (1757) और बक्सर की लड़ाई (1764-65) थी जिसके कारण ईस्ट इंडिया कंपनी का क्षेत्रीय प्रभुत्व कायम हुआ।
उस समय, देश में उनके क्षेत्रों में महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के वर्तमान राज्य शामिल थे।
इन दो महत्वपूर्ण युद्धों के साथ, अवध के नवाब उनके सहयोगी बन गए, जबकि मुगल सम्राट शाहजहाँ उनके पेंशनर बन गए।
हालांकि, इस पूरी व्यवस्था की अपनी खामियां थीं, जो अंततः 1773 के विनियमन अधिनियम के कारण हुईं।

1773 के विनियमन अधिनियम के उद्देश्य

1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के मुख्य उद्देश्य भारत में कंपनी के प्रबंधन की समस्या को संबोधित करना और साथ ही लॉर्ड क्लाइव द्वारा स्थापित शासन की दोहरी प्रणाली भी थी।
1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के दूसरे उद्देश्य में उस कंपनी का नियंत्रण शामिल था, जो एक व्यावसायिक इकाई से अर्ध-संप्रभु राजनीतिक इकाई में रूपांतरित हो गई थी।

1773 के विनियमन अधिनियम का महत्व

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट ने कंपनी के राजनीतिक कार्यों को मान्यता दी, क्योंकि यह पहली बार सरकार के रूप में संसद के आदेश के लिए जोर दिया।
यह ब्रिटिश सरकार का भारत में प्रशासनिक तंत्र को केंद्रीकृत करने का पहला प्रयास था।
अधिनियम ने कंपनी के मनमाने शासन के स्थान पर भारत में ब्रिटिश कब्जे के लिए एक लिखित संविधान स्थापित किया।
गवर्नर-जनरल को निरंकुश बनने से रोकने के लिए एक प्रणाली शुरू की गई थी।
1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट ने दूसरों पर बंगाल के गवर्नर पद का वर्चस्व स्थापित कर दिया।
विदेश नीति के मामलों में, 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट ने गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के अधीनस्थ, बॉम्बे और मद्रास को राष्ट्रपति बनाया।
अब, कोई अन्य राष्ट्रपति भारतीय राजकुमारों के साथ शत्रुता शुरू करने के लिए आदेश नहीं दे सकता था, युद्ध की घोषणा कर सकता था या संधि कर सकता था।
इस अधिनियम के परिणामस्वरूप फोर्ट विलियम, कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई और इस तरह देश के आधुनिक संवैधानिक इतिहास को चिह्नित किया गया।

1773 के विनियमन अधिनियम के प्रावधान

1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की चार मुख्य प्रमुख विशेषताएं या प्रावधान इस प्रकार हैं:
अधिनियम ने बंगाल के गवर्नर जनरल को नामित किया और उनकी सहायता के लिए 4 सदस्यों की एक कार्यकारी परिषद बनाई।
इस तरह, लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल बन गया।
इस अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकरों या श्रमिकों को किसी भी प्रकार के निजी व्यापार में संलग्न होने या मूल निवासी से रिश्वत के रूप में प्रस्तुत करने पर रोक लगा दी।
यह इस अधिनियम के तहत था, कि फोर्ट विलियम में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना ब्रिटिश न्यायाधीशों के साथ की गई थी, जो कि ब्रिटिश कानूनी प्रणाली का उपयोग करते थे।
अधिनियम ने कंपनी के लाभांश को 6 प्रतिशत तक सीमित कर दिया जब तक कि उसने 1.5 मिलियन पाउंड का ऋण नहीं चुकाया और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को 4 साल के कार्यकाल तक सीमित कर दिया।

रेग्युलेटिंग एक्ट पारित होने के कारण

ब्रिटिश अभिजात वर्ग की ईर्ष्या

बंगाल में द्वैध शासन के अधीन कंपनी के कर्मचारियों ने बंगाल को दिल खोलकर लूटा, जिससे समस्त प्रशासन अस्त-व्यस्त हो गया और बंगाल का पूर्ण विनाश हो गया। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स के भारत आने के पहले तक अंग्रेज व्यापारी बंगाल से लूटे हुए सोने के थैले लेकर इंग्लैंड लौटते रहे और अपनी फिजूलखर्ची से अभिजातवर्ग के मन में ईष्र्या उत्पन्न करते रहे। पिट ज्येष्ठ ने इनको अंग्रेजी नवाबों की संज्ञा दी और आशंका व्यक्त की कि इस अपार धन से कहीं वे ब्रिटिश राजनीतिक जीवन को भ्रष्ट न कर दें। एच.एच. डाडवैल ने लिखा है: न केवल भारत में कुशासन द्वारा अंग्रेजी नाम को बट्टा लगने का भय था, अपितु यह भी भय था कि इंग्लैंड में भारतीय व्यापार में लगे लोग, जिन्हें अपार धन उपलब्ध था, भ्रष्ट संसदीय प्रणाली के कारण गृह मामलों में प्रभावशाली तथा अनुचित शक्ति प्राप्त करने में सफल न हो जायें। इसलिए इंग्लैंड में यह माँग की जाने लगी थी कि कंपनी के मामलों में संसदीय हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।

इंग्लैंड में कम्पनी की प्रशासनिक संरचना

इंग्लैंड में कंपनी के प्रशासन के दो मुख्य अंग थे- कोर्ट आफ प्रोप्राइटर्स तथा कोर्ट आफ डाइरेक्टर्स, जो कंपनी के मामलों पर नियंत्रण रखते थे। कोर्ट आफ प्रोप्राइटर्स के वे सदस्य जो छः माह से अधिक समय तक 500 पौंड से अधिक के शेयरधारक होते थे, वोट देकर कोर्ट आफ डाइरेक्टर्स का चुनाव करते थे। निदेशक का पद बहुत महत्वपूर्ण होता था और धनवान भागीदार शेयरों को एकाधिकार में लेकर निदेशक बनने का प्रयास करते थे। मतों का यह क्रय-विक्रय और इससे संबद्ध कुकर्म ब्रिटिश जनता या सरकार से छुपे हुए नहीं थे।

कम्पनी की वित्तीय स्थिति  

बंगाल से दीवानी की अत्यधिक धन-वसूली की आशा में कंपनी के भागीदारों ने 1776 में लाभांश 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत और अगले वर्ष 12.5 प्रतिशत कर दिया। इतने अधिक लाभांश को देखकर अंग्रेजी सरकार ने संसद के अधिनियम द्वारा कंपनी को आज्ञा दी कि कंपनी दो वर्ष तक सरकार को 400,000 पौंड प्रतिवर्ष देगी और फिर यह अवधि 1772 तक बढ़ा दी। किंतु 1771-72 में बंगाल में सूखा पड़ जाने के कारण फसलें नष्ट हो गईं। हैदरअली से संभावित युद्ध और कंपनी के कर्मचारियों की धन-लोलुपता कंपनी की वित्तीय स्थिति डावांडोल हो गई। कंपनी ने पहले ब्रिटिश सरकार को दिये जानेवाले 400,000 पौंड सालाना से छूट माँगी जिससे कंपनी पर ऋण की मात्रा बढ़ने लगी। 1772 में कंपनी ने वास्तविक स्थिति को छुपाकर 12.5 प्रतिशत लाभांश जारी रखा, जबकि कंपनी पर 60 लाख पौंड ऋण था। कंपनी को घाटे से उबारने के लिए डाइरेक्टरों ने बैंक आफ इंग्लैंड से 10 लाख पौंड के ऋण के लिए आवेदन किया। इससे ब्रिटिश सरकार को कंपनी की वास्तविक स्थिति को जानने का अच्छा अवसर मिल गया।

संसदीय जाँच समिति

नवंबर 1772 में ब्रिटिश सरकार ने कंपनी की कार्यविधि की जाँच करने के लिए दो समितियों की नियुक्ति की-एक प्रवर समिति, दूसरी गुप्त समिति। इन समितियों की जाँच में कंपनी के अधिकारियों द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग के कई प्रकरण सामने आये। जाँच समिति की रिपोर्ट के आधार पर भारत में कंपनी की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए 1773 में ब्रिटिश संसद ने दो अधिनियम पारित किये-पहले ऐक्ट के अनुसार कंपनी को 4 प्रतिशत की ब्याज पर 14 लाख पौंड कुछ शर्तों पर ऋण दिया गया। दूसरा अधिनियम रेग्युलेटिंग ऐक्ट था जिसके द्वारा कंपनी के कार्य को नियमित करने के लिए एक संविधान दिया गया।

महत्वपूर्ण बिंदु

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के प्रावधान से स्पष्ट है कि यह कानून के कदाचार को रोकने और कंपनी के अधिकारियों के बीच भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए लागू किया गया था।
हालांकि, यह भ्रष्टाचार को रोकने में विफल रहा और शीर्ष स्तर से लेकर सबसे निचले अधीनस्थ तक सभी अधिकारियों के लिए पतनशीलता एक आम बात बन गई।
पहले गवर्नर जनरल, वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ प्रमुख आरोप लगाए गए थे और भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन पर महाभियोग लगाया गया था।
नतीजतन, भ्रष्टाचार को रोकने के लिए 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट पारित किया गया और कंपनी में भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण लाने के लिए लॉर्ड कार्नवालिस को नियुक्त किया गया।

बंगाल से दीवानी की अत्यधिक धन-वसूली की आशा में कंपनी के भागीदारों ने 1776 में लाभांश 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत और अगले वर्ष 12.5 प्रतिशत कर दिया। इतने अधिक लाभांश को देखकर अंग्रेजी सरकार ने संसद के अधिनियम द्वारा कंपनी को आज्ञा दी कि कंपनी दो वर्ष तक सरकार को 400,000 पौंड प्रतिवर्ष देगी और फिर यह अवधि 1772 तक बढ़ा दी। किंतु 1771-72 में बंगाल में सूखा पड़ जाने के कारण फसलें नष्ट हो गईं। हैदरअली से संभावित युद्ध और कंपनी के कर्मचारियों की धन-लोलुपता कंपनी की वित्तीय स्थिति डावांडोल हो गई। कंपनी ने पहले ब्रिटिश सरकार को दिये जानेवाले 400,000 पौंड सालाना से छूट माँगी जिससे कंपनी पर ऋण की मात्रा बढ़ने लगी। 1772 में कंपनी ने वास्तविक स्थिति को छुपाकर 12.5 प्रतिशत लाभांश जारी रखा, जबकि कंपनी पर 60 लाख पौंड ऋण था। कंपनी को घाटे से उबारने के लिए डाइरेक्टरों ने बैंक आफ इंग्लैंड से 10 लाख पौंड के ऋण के लिए आवेदन किया। इससे ब्रिटिश सरकार को कंपनी की वास्तविक स्थिति को जानने का अच्छा अवसर मिल गया।

नवंबर 1772 में ब्रिटिश सरकार ने कंपनी की कार्यविधि की जाँच करने के लिए दो समितियों की नियुक्ति की-एक प्रवर समिति, दूसरी गुप्त समिति। इन समितियों की जाँच में कंपनी के अधिकारियों द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग के कई प्रकरण सामने आये। जाँच समिति की रिपोर्ट के आधार पर भारत में कंपनी की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए 1773 में ब्रिटिश संसद ने दो अधिनियम पारित किये-पहले ऐक्ट के अनुसार कंपनी को 4 प्रतिशत की ब्याज पर 14 लाख पौंड कुछ शर्तों पर ऋण दिया गया। दूसरा अधिनियम रेग्युलेटिंग ऐक्ट था जिसके द्वारा कंपनी के कार्य को नियमित करने के लिए एक संविधान दिया गया।  रेगुलेटिंग एक्ट पर निबंध लिखिए, रेगुलेटिंग एक्ट कब पारित हुआ, रेगुलेटिंग एक्ट के दोष

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