प्लासी का युद्ध - Battle of Plassey in Hindi

प्लासी का युद्ध - Plasi Ka Yuddh in Hindi

प्लासी का युद्ध 23 जून, 1757 ई. को लड़ा गया था। 
अंग्रेज़ और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेनायें 23 जून, 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर 'नदिया ज़िले' में भागीरथी नदी के किनारे 'प्लासी' नामक गाँव में आमने-सामने आ गईं। 
सिराजुद्दौला की सेना में जहाँ एक ओर 'मीरमदान', 'मोहनलाल' जैसे देशभक्त थे, वहीं दूसरी ओर मीरजाफ़र जैसे कुत्सित विचारों वाले धोखेबाज़ भी थे। 
युद्ध 23 जून को प्रातः 9 बजे प्रारम्भ हुआ। मीरजाफ़र एवं रायदुर्लभ अपनी सेनाओं के साथ निष्क्रिय रहे। 
इस युद्ध में मीरमदान मारा गया। 
युद्ध का परिणाम शायद नियति ने पहले से ही तय कर रखा था। 
रॉबर्ट क्लाइव बिना युद्ध किये ही विजयी रहा। 
फलस्वरूप मीरजाफ़र को बंगाल का नवाब बनाया गया। के.एम.पणिक्कर के अनुसार, 'यह एक सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी सेठों तथा मीरजाफ़र ने नवाब को अंग्रेज़ों के हाथों बेच डाला'।
17 वीं-18 वीं शताब्दी में भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन हुआ जिनका भारत में आने का मकसद व्यापार करना था, परन्तु अपनी बढ़ती महत्वकांक्षाओं के कारण उन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर राज करना शुरू कर दिया। 
औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुग़ल साम्राज्य की नींव कमजोर पड़ गयी। 
जिसका फायदा उठाकर अलीवर्दी खाँ नामक व्यक्ति ने 1740 ई.  में बंगाल को मुग़ल साम्राज्य से मुक्त घोषित कर, अपने आप को वहाँ का नवाब घोषित किया। 
मुगलों की शक्ति क्षीण होते देख अंग्रेजों ने भी इसका फायदा उठाया और भारत में जगह-जगह किले बंदी कर अपना अधिपत्य स्थापित करने की कोशिश की।
09 अप्रैल, 1756 ई. में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के पश्चात उसकी सबसे छोटी पुत्री का पुत्र सिराजुद्दौला  नवाब बना। 
तब बंगाल का माहौल अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के आपसी द्वंद्व के कारण काफी अशांत था। 
अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने जगह-जगह किले बंदी करनी भी शुरू कर दी थी। 
इसके कारण सिराजुद्दौला काफी चिंतित था इसलिए सिराजुद्दौला ने अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों को तुरंत किले बंदी रोकने का आदेश दिया।
फ्रांसीसियों ने तो नवाब का आदेश मानते हुए तत्काल प्रभाव से अपने द्वारा की जा रही किले बंदी को रोक दिया परन्तु अंग्रेजों ने नवाब के आदेश की अवहेलना करते हुए अपनी किले बंदी को जारी रखा।
23 जून, 1757 ई. को प्लासी नामक स्थल पर ईस्ट इंडिया कंपनी और नवाब सिराजुद्दौला की सेना के मध्य युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजी सेना की कमान रॉबर्ट क्लाइव और नवाब सेना की कमान मीर जाफर ने संभाली। 
इस युद्ध में मीर जाफर के विश्वाशघात के कारण नवाब सेना की हार हुई और सिराजुद्दौला को बंदी बनाकर मृत्यु दंड स्वरूप गोली मार दी गयी।
प्लासी युद्ध में अंग्रेजों की जीत के फलस्वरूप व अंग्रेजों द्वारा मीरजाफर से किये गए वादे के अनुसार मीरजाफर को बंगाल का अगला नवाब बनाया गया। 
बंगाल का नवाब बनते ही मीर जाफर ने अंग्रेजो को 24 परगना की जमींदारी सौंप दी और बंगाल, ओडिशा  तथा बिहार पर अंग्रेजो की ईस्ट इंडिया कंपनी को मुफ्त व्यापार करने की छूट प्रदान कर दी। 
मीर जाफर अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली मात्र था, अंग्रेज जो चाहते वह उससे करवाते थे। 
जब मीर जाफर अंग्रेजों की मनमानी और मांगों को पूर्ण न कर सका तो उसको बंगाल के नवाब की गद्दी से हटाकर मीर कासिम को बंगाल का नवाब बनाया गया।
प्लासी युद्ध के कुछ समय पश्चात बक्सर का युद्ध हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों का बंगाल पर पूर्णतः नियंत्रण स्थापित हो गया और अंग्रेज एक व्यापारिक शक्ति से एक राजनीतिक शक्ति में बदल गए। 
इसी युद्ध के परिणाम स्वरूप अंग्रजों की भारत में अपनी सत्ता-स्थापित करने की प्रक्रिया की शुरुआत हुई और साम-दाम-दंड-भेद जैसे बन पड़े अंग्रेजों ने भारत पर अपनी सत्ता स्थापित करने की कोशिश की। 
अंग्रेजों द्वारा ‘फुट डालो राज करो‘ की निति का प्रयोग भी किया गया, जिसका प्रयोग कर तत्कालीन राजाओं और राजनीतिक शक्तियों को आपस में लड़वाकर कमजोर कर दिया गया। 
जिसके फलस्वरूप भारत पर अंग्रेजों का एकाधिकार स्थापित हुआ। 
जोकि 15 अगस्त, 1947 को भारत के अंग्रेजो से स्वतंत्र होने के पश्चात समाप्त हुआ।

अलीनगर की संधि

9 फ़रवरी, 1757 को क्लाइव ने नवाब के साथ एक संधि (अलीनगर संधि) की जिसके अनुसार मुग़ल सम्राट द्वारा अंग्रेजों को दी गई सारी सुविधायें वापस मिली जानी थीं। 
नवाब को लाचार होकर अंग्रेजों को सारी जब्त फैक्टरियाँ और संपत्तियाँ लौटाने के लिए बाध्य होना पड़ा। 
कम्पनी को नवाब की तरफ से हर्जाने की रकम भी मिली। 
नवाब अन्दर ही अन्दर बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। 

मीर कासिम के प्रयत्न

अलीवर्दी ख़ाँ के बाद बंगाल के नवाब के पद पर कार्य करने वालों में मीर कासिम सर्वाधिक योग्य था। 
उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानान्तरित की, क्योंकि वह मुर्शिदाबाद के षडयंत्रमय वातावरण से स्वयं को दूर रखना चाहता था। 
उसने अपनी सेना को यूरोपीय ढंग से गठित करने के लिए मुंगेर में तोड़ेदार बंदूक़ों एवं तोपों के कारखानों की स्थापना की तथा सैनिकों की संख्या में वृद्धि की। 
इसने अपनी सेना को गुर्गिन ख़ाँ नामक आर्मेनियाई के नियंत्रण में रखा। 
मीर कासिम ने अपने ख़िलाफ़ षडयंत्र कर रहे बिहार के उप-सूबेदार राम नारायण, जिसे अंग्रेज़ों का समर्थन प्राप्त था, को सेवा से हटाकर मरवा दिया। 
उसने एक और कर 'खिजरी जमा', जो अभी तक अधिकारियों द्वारा छुपाया जाता रहा था, भी प्राप्त किया। 
मीर कासिम को राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयत्नशील देखकर अंग्रेज़ अधिकारी बौखलाये, क्योंकि उन्हें यह बर्दाश्त नहीं था, कि बंगाल में ऐसा कोई व्यक्ति शासन करे, जो उनके आर्थिक हितों को हानि पहुँचाता हो।

प्लासी युद्ध के कारण और परिणाम

आधुनिक भारत के इतिहास में प्लासी युद्ध का अत्यंत महत्व है। 
इस युद्ध के द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल के नवाब सिराजुददौला को पराजित कर बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली। 
इस लिए इस युद्ध को भारत के निर्णायक युद्धों में विशिष्ट स्थान उपलब्ध है।
बंगाल मुगल साम्राज्य का एक अभिन्न अंग था। 
परन्तु औरंगजेब की मृत्यु के बाद इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रांतों में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। 
जिसमें अलवर्दी खाँ ने बंगाल पर अपना अधिकार कर लिया। 
उन्हें कोई पुत्र नहीं था।
सिर्फ तीन पुत्रियाँ थी। 
बड़ी लड़की छसीटी बेगम नि:सन्तान थी। 
दूसरी और तीसरी से एक- एक पुत्र थे। 
जिसका नाम शौकतगंज, और सिराजुद्दौला था। 
वे सिराजुद्दौला को अधिक प्यार करते थे। 
इसलिए अपने जीवन काल में ही उसने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।
10 अप्रैल 1756 को अलवर्दी की मृत्यु हुई। 
और सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना परन्तु शुरु से ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ उसका संघर्ष अवश्यभावी हो गया। 
अंत में 23 जून 1757 को दोनों के बीच युद्ध छिड़ा जिसे प्लासी युद्ध के नाम से जाना जाता है। 
इस युद्ध के अनेक कारण थे जो इस प्रकार है।

आंतरिक संघर्ष

गद्दी पर बैठते ही सिराजुद्दौला को शौकतगंज के संघर्ष का सामना करना पड़ा क्योंकि शौकतगंज नवाब बनना चाहता था।
इसमें छसीटी बेगम तथा उसके दिवान राजवल्लाव और मुगल सम्राट का समर्थन उसे प्राप्त था इस लिए सिराजुद्दौला ने सबसे पहले उस आन्तरिक संघर्ष को सुलझाने का प्रयास किया। 
क्योंकि इसी के चलते बंगाल की राजनीति में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा था नवाब ने शौकतगंज की हत्या कर दी। 
इसके पश्चात उसने अंग्रेजों से मुकाबला करने का निश्चय किया।

अंग्रेज द्वारा नवाब के विरुद्ध षडयंत्र

प्रारंभ से ही अंग्रेजों की आखें बंगाल पर लगी हुई थी। 
क्योंकि बंगाल एक उपजाऊ और धनी प्रांत था। 
अगर बंगाल पर कम्पनी का अधिकार हो जाता तो उसे अधिक से अधिक धन कमाने की आशा थी। 
इतना ही नहीं वे हिन्दु व्यापारियों को अपनी ओर मिलाकर उन्हें नवाब के विरुद्ध भड़काना शुरु किया नवाब इसे पसन्द नहीं करता था।

व्यापारिक सुविधाओं का उपयोग

मुगल सम्राट के द्वारा अंग्रेजों को निशुल्क सामुद्रिक व्यापार करने की छूट मिलि थी लेकिन अंग्रेजों ने इसका दुरुपयोग करना शुरु किया। 
वे अपना व्यक्तिगत व्यापार भी नि:शुल्क करने लगे और देशी व्यापारियों को बिना चुंगी दिए व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। 
इससे नवाब को आर्थीक क्षति पहुँचती थी। 
नवाब इन्हें पसन्द नहीं करता था जब, उन्होने व्यापारिक सुविधाओं के दुरुपयोग को बन्द करने का निश्चय किया तो अंग्रेज संघर्ष पर उतर आए।

अंग्रेजों द्वारा किले बन्दी

इस समय यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध छिड़ने की आशंका थी। 
जिसमें इंगलैण्ड और फ्रांस एक दूसरे के विरुद्ध लड़ने वाले थे अत: दूसरे देश में भी जो अंग्रेज और फ्रांसीसी थे। उन्हे युद्ध की आशंका थी। 
इसलिए अपनी- 2 स्थिति को मजबूत करने के लिए उन्होनें किलेबन्दी करना शुरु किया। 
नवाब इसे बर्दास्त नहीं कर सकता था।

सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच संघर्ष

सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों को फोर्ट विलियम किले को नष्ट करने का आदेश दिया जिसको अंग्रेजों ने ठुकरा दिया। 
गुस्साए नवाब ने मई, 1756 में आक्रमण कर दिया। 
20 जून, 1756 ई. में कासिमबाजार पर नवाब का अधिकार भी हो गया। 
उसके बाद सिराजुद्दौला ने फोर्ट विलियम पर भी अधिकार कर लिया। 
अधिकार होने के पहले ही अंग्रेज़ गवर्नर ड्रेक ने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ भागकर फुल्टा नामक एक द्वीप में शरण ले ली। 
कलकत्ता में बची-खुची अंग्रेजों की सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा। 
अनेक अंग्रेजों को बंदी बनाकर और मानिकचंद के जिम्मे कलकत्ता का भार सौंपकर नवाब अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद लौट गया। 
ऐसी ही परिस्थिति में “काली कोठरी” की दुर्घटना (The Black Hole Tragedy) घटी जिसने अंग्रेजों और बंगाल के नवाब के सम्बन्ध को और भी कटु बना दिए। 
कहा जाता है कि 146 अंग्रेजों, जिनमें उनकी स्त्रियाँ और बच्चे भी थे, को फोर्ट विलियम के एक कोठरी में बंद कर दिया गया था जिसमें दम घुटने से कई लोगों की मौत हो गई थी। 
जब इस घटना की खबर मद्रास पहुँची तो अंग्रेज़ बहुत गुस्से में आ गए और उन्होंने सिराजुद्दौला से बदला लेने की ठान ली। 
शीघ्र ही मद्रास से क्लाइव (Lord Clive) और वाटसन थल सेना लेकर कलकत्ता की ओर बढ़े और नवाब के अधिकारीयों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया। 
परिणामस्वरूप मानिकचंद ने बिना किसी प्रतिरोध के कलकत्ता अंग्रेजों को सौंप दी। 
बाद में अंग्रेजों ने हुगली पर भी अधिकार कर लिया। 
ऐसी स्थिति में बाध्य होकर नवाब को अंग्रेजों से समझौता करना पड़ा। 

नवाब बदलने की कोशिश

अंग्रेज सिराजुद्दौला को हटा कर किसी ऐसे व्यक्ति को नवाब बनाना चाहते थे जो उसके इशारे पर चलने के लिए तैयार हो इसके लिए अंग्रेजों ने प्रयास करना शुरु किया। 
ऐसी परिस्थिति में संघर्ष टाला नहीं जा सकता था।

कलकत्ता पर आक्रमण

जब नवाब ने किले बंदी करने को रोकने का आदेश जारी किया तो अंग्रेजों ने उसपर कोई ध्यान नहीं दिया वो किले का निर्माण करते रहे। 
इसपर नवाब क्रोधित हो उठा और 4 जुन 1756 को कासिमबाजार की कोठी पर आक्रमण कर दिया। 
अंग्रेज सैनिक इस आक्रमण से घबड़ा गए और अंग्रेजों की पराजय हुई और कासिम बाजार पर नवाब का अधिकार हो गया। 
इसके बाद नवाब ने शिघ्र ही कलकत्ता के फोर्ट विलिय पर आक्रमण किया यहाँ अंग्रेज सैनिक भी नवाब के समक्ष टीक नहीं पाया और इसपर भी नवाब का अधिकार हो गया। 
इस युद्ध में काफी अंग्रेज सैनिक गिरफ्तार किये गये।

काली कोठरी की दुर्घटना

उपर्युक्त लड़ाई में नवाब ने 146 अंग्रेज सैनिकों को कैद कर लिया तो उसे एक छोटी सी अंधेरी कोठरी में बन्द कर दिया इसकी लम्बाई 18 फिट और चौड़ाई 14- 10 फिट थी। 
यह अंग्रेजों के द्वारा बनाया गया था और इसमें भारतीय अपराधियों को बन्द किया जाता था। 
चुँकि गर्मी का दिन था और युद्ध के परिम थे 123 सैनिकों की मृत्यु दम घुटने के कारण हो गई और 23 सैनिक बचे जिसमें हाँवेल एक अंग्रेज सैनिक भी था। 
उसी के इस घटना की जानकारी मद्रास के अंग्रेजों को दी। 
इसी दुर्घटना को काली कोठरी की दुर्घटना के नाम से जाना जाता है। 
इसके चलते अंग्रेजों का क्रोध भड़क उठा और वे नवाब से युद्ध की तैयारी करने लगे।

अंग्रेजों द्वारा कलकत्ता पर पुन: अधिकार

अपनी पराजय का बदला लेने के लिए अंग्रेज ने शीघ्र ही कलकत्ता पर आक्रमण कर दिया। 
इस समय नवाब ने मानिकचन्द को कलकत्ता का राजा नियुक्त किया था। 
लेकिन वह अंग्रेजों का मित्र और शुभचिन्तक था। 
फलत: अंग्रेजों की विजय हुई कलकत्ता नवाब के चंगुल से मुक्त हो गया। 
9 फरवरी 1757 को दोनों के बीच अली नगर की संधि हुई और अंग्रेजों को फिर से सभी तरह के व्यवहारिक अधिकार उपलब्ध हो गया।

फ्रांसीसीयों पर अंग्रेजों का आक्रमण

अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों की वस्ती चन्द नगर पर आक्रमण कर दिया। 
और उसे अपने अधीन कर लिया। फ्रांसिसी नवाब के मित्र थे इसलिए नवाब इस घटना से काफी क्षुब्ध थे।

मीरजाफर के साथ गुप्त संधि

इसी समय अंग्रेजों ने नवाब को पदच्युत करने के लिए एक षडयंत्र रचा। 
इसमें नवाब के भी कई लोग शामिल थे। 
जैसे- रायदुर्लभ प्रधान सेनापति मीरजाफर और धनी व्यापाकिर जगत सेवक आदि। 
अंग्रेजों ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाने का प्रलोभन दिया और इसके साथ गुप्त संधि की इस संधि के पश्चात नवाब पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होने अली नगर की संधि का उलंघन किया है और उसी का बहाना बनाकर अंग्रेज ने नवाब पर 22 जुन 1757 को आक्रमण कर दिया। 
प्लासी युद्ध के मैदान में घमासान युद्ध प्रारंभ हुआ मीरजाफर तो पहले ही अंग्रेजों से संधि कर चुका था फलत: नवाब की जबरदस्त पराजय हुई। 
अंग्रेजों की विजय हुई। 
नवाब की हत्या कर दी गई और मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया।

प्लासी युद्ध के परिणाम

प्लासी के युद्ध (The Battle of Plassey) के परिणाम अत्यंत ही व्यापक और स्थायी निकले। 
इसका प्रभाव कम्पनी, बंगाल और भारतीय इतिहास पर पड़ा। 
मीरजाफर को क्लाइव ने बंगाल का नवाब घोषित कर दिया। 
उसने कंपनी और क्लाइव को बेशुमार धन दिया और संधि के अनुसार अंग्रेजों को भी कई सुविधाएँ मिलीं। 
बंगाल की गद्दी पर एक ऐसा नवाब आ गया जो अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली मात्र था। 
प्लासी के युद्ध (The Battle of Plassey) ने बंगाल की राजनीति पर अंग्रेजों का नियंत्रण कायम कर दिया। 
अंग्रेज़ अब व्यापारी से राजशक्ति के स्रोत बन गये। 
इसका नैतिक परिणाम भारतीयों पर बहुत ही बुरा पड़ा।  
एक व्यापारी कंपनी ने भारत आकर यहाँ से सबसे अमीर प्रांत के सूबेदार को अपमानित करके गद्दी से हटा दिया और मुग़ल सम्राट तमाशा देखते रह गए। 
आर्थिक दृष्टिकोण से भी अंग्रेजों ने बंगाल का शोषण करना शुरू कर दिया। 
इसी युद्ध से प्रेरणा लेकर क्लाइव ने आगे बंगाल में अंग्रेजी सत्ता स्थापित कर ली। 
बंगाल से प्राप्त धन के आधार पर अंग्रेजों ने दक्षिण में फ्रांसीसियों पर विजय प्राप्त कर लिया
प्लासी युद्ध के द्वारा बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली गई। 
अंग्रेजों को नवाब बनाया गया। 
प्लासी का युद्ध वास्तव में कोई युद्ध नहीं था यह एक षडयंत्र और विश्वासघाति का प्रदर्शन था प्रसिद्ध इतिहासकार ‘पानीवकर’ के अनुसार प्लासी का युद्ध नहीं, परन्तु इसका परिणाम काफी महत्वपूर्ण निकला। 
इसलिए इसे विश्व के निर्णायक युद्धों में स्थान उपलब्ध है। 
क्योंकि इसी के द्वारा बंगाल में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली गई।
 क्लाइव ने इस युद्ध को क्रांति की संज्ञा दी है। 
वास्तव में यह एक क्रांति थी क्योंकि इसके द्वारा भारतीय इतिहास की धारा में महान परिवर्तन आ गया और एक व्यापारिक संस्था ने बंगाल की राजनितिक बागडोर अपने हाथों में ले ली। 
इसके विभिन्न तरह के परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं।

राजनीतिक परिणाम

इसके राजनीतिक परिणाम भारत के लिए घातक सिद्ध हुआ। 
इसके द्वारा एक व्यापारिक संस्था के हाथों में राजनीतिक अधिकारों का समावेश हुआ और भारत में अंग्रेजी सत्ता कायम हुआ। 
वस्तुत: यह ब्रिटिश राष्ट्र के लिए अत्यधिक महत्व था इस युद्ध के पश्चात मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया। परन्तु यह क अयोग्य व्यक्ति था। 
इसके अयोग्यता काफायता उठाते हुए बंगाल का वास्तविक शासक अंग्रेज बन गए। 
बंगाल पर अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ता गया और धीरे- 2 ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग साफ होता गया। 
सिराजुद्दौला के हटने से अंग्रेजों को राजनीतिक प्रभुत्व बढाने का फायदा मिला। 
मुगल साम्राज्य के लिए बी प्लासी का परिणाम घातक सिद्ध हुआ बंगाल से प्रतिवर्ष मुगल शासक को अच्छी आमदनी होती थी लेकिन अब यह आमदनी समाप्त हो गई। 
अंग्रेजों को भारतीय नरेशों को कमजोरी की जानकारी मिल गई। 
भविष्य में उसने उसका काफी फायदा उठाया और उत्तरी भारत की विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ।

आर्थिक परिणाम

इस युद्ध के द्वारा अंग्रेजों को काफी आर्थिक लाभ पहुँचा मीरजाफर ने कम्पनी को 1 करोड़ 17 लाख रुपये दिये जिससे कम्पनी की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई बंगाल की लुट से भी उसे काफी धन हाथ लगा। 
कम्पनी के मठ कर्मचारियों को साढ़े 12 लाख रुपए मिले। 
क्लाइव को दो लाख 24 हजार रुपए मिले। 
इस युद्ध के पश्चात कम्पनी धीरे- 2 जागीदार बाद में बंगाल की दीवान बन गई। 
इस प्रकार इसके द्वारा भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली गई। 
अंग्रेजों को पुन: व्यापार करने का अधिकार मिला मीरजाफर ने कम्पनी को घूस के रूप में 3 करोड़ रुपए प्रदान किए तथा व्यापार से भी अंग्रेजों ने 15 करोड़ का मुनाफा कमाया।

बक्सर का युद्ध

मुख्य लेख़ बक्सर का युद्ध 
मीर कासिम ने देखा कि अंग्रेज़ 'गुमाश्ते दश्तक' (बिना चुंगी के व्यापार का अधिकार पत्र) का दुरुपयोग कर रहे हैं, और चुंगी देने की व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे हैं। 
अंग्रेज़ों ने दस्तक का धन लेकर भारतीय व्यापारियों को भेजना प्रारम्भ कर दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ, कि जो धन चुंगी के रूप में नवाब को मिलता था, वह भी समाप्त होने लगा। 
अन्ततः मीर कासिम ने व्यापार पर से सभी आन्तरिक कर हटा लिए, जिससे भारतीय व्यापारियों की स्थिति अंग्रेज़ व्यापारियों की तरह ही हो गई। 
मीर कासिम के इस निर्णय से अंग्रेज़ अधिकारी स्तब्ध रह गये। 
सम्भवतः उसका यही निर्णय कालान्तर में बक्सर के युद्ध का कारण बना। 
बक्सर के युद्ध से पहले मीर कासिम अंग्रेज़ों से निम्नलिखित युद्धों में पराजित हुआ-

गिरिया का युद्ध - 4 सितम्बर अथवा 5 सितम्बर, 1762 ई.
करवा का युद्ध - 9 जुलाई, 1763 ई.
उद्यौनला का युद्ध - 1763 ई.

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