राजस्थान की झीलें - Rajasthan ki jhile PDF in Hindi

नमस्कार दोस्तों Raj GK में आपका स्वागत है आज हम राजस्थान की झीले ( Rajasthan ki Jhile, map, PDF, trick, question ) topic के बारे में महत्वपूर्ण Fact आपके लिए लेकर आए हैं यह पोस्ट Rajasthan GK से संबंधित है राजस्थान की झीलों का उल्लेख इस में किया गया है

राजस्थान की प्रमुख झीलें - Rajasthan ki jhile PDF in Hindi

राजस्थान में खारे पानी की झीलें 

सांभर झील 

सांभर झील फुलेरा जंक्शन, जयपुर में स्थित है। 
सांभर झील अजमेर, नागौर, जयपुर तीन जिलों में फैली हुई है। 
बिजौलिया शिलालेख के अनुसार इस झील का निर्माण वासुदेव चौहान के द्वारा करवाया गया। 
सांभर चौहानों की राजधानी तथा अकबर की विवाह स्थली के रूप में प्रसिद्ध है। 
वासुदेव चौहान को चौहानवंश का संस्थापक माना जाता है। 
इस झील में जल गिराने वाली प्रमुख नदियां मेंथा, रूपनगढ़, खारी व खण्डेल है। 
सांभर झील एशिया का सबसे बड़ा अंतःस्थलीय नमक उत्पादन केन्द्र है।
केन्द्र सरकार के सहयोग से इस झील में हिंदुस्तान नमक कंपनी की स्थापना की गई।
हिंदुस्तान नमक कंपनी के सहयोग से सांभर साल्ट योजना (1964) चलाई जा रही है। 
इस झील में साल्ट म्यूजियम ( 1870) स्थित है। 
सर्दियों में इस झील के किनारे राजहंस देखे जा सकते है।

राजहंस का वैज्ञानिक नाम फलेमीगोज है। 

सांभर झील में विरह का प्रतीक कुरंजा पक्षी विचरण के लिए आता है। 
सांभर झील का तल भी प्री-अरावली चट्टानों का बना हुआ है। 
सांभर झील विश्व की सबसे प्राचीन जल विभाजक पर स्थित है। 
राजस्थान का उच्चतम बिन्दु गुरूशिखर (माउण्ट आबूसिरोही) व निम्नतम बिन्दु सांभर झील है। 
क्षेत्रफल की दृष्टि से यह राज्य की सबसे बड़ी झील है जो कि लगभग 500 वर्ग किमी. में फैली हुई है।
सांभर झील पर पर्यटन विकास हेतु रामसर साईट नाम से 1990 में पर्यटन स्थल विकसित किया गया। 
सांभर झील को नम भूमि में शामिल किया जाता है। 
सांभर झील की खुदाई में पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई है। 
सांभर झील में दो प्रकार की विधियों से नमक तैयार किया जाता है - 
  * रेश्ता विधि- वायु के प्रवाह से तैयार किया गया नमक। 
  * क्यारविधि-झील के जल को इस विधि में छोटी-छोटी क्यारियों में छोड़ दिया जाता है, बाद में नमक तैयार किया जाता है। 
सांभर झील के जल में खारेपन की मात्रा को कम करने में स्वेडाफूटी व साल्वेडोरा स्पीसीज नामक वनस्पति सहायक है। 
सांभर झील में देवयानी तीर्थ स्थल, नालीसर मस्जिद, शाकंभरी माता का मंदिर स्थित है। 
  * देवयानी को तीर्थों की नानी के उपनाम से जाना जाता है। 

डीडवाना झील

डीडवाना झील नागौर में स्थित है। 
इस झील का नमक खाने की दृष्टि से उत्तम नहीं है।
इस झील में राजस्थान का सबसे बड़ा सोडियम सल्फेट
संयंत्र स्थित है। इस झील में कागज का निर्माण किया जाता है। 
इस झील में राजस्थान स्टेट केमिकल्स वर्क्स ( 1960 ) के दो कारखानें स्थित है जिसमें सोडियम सल्फेट व सोडियम सल्फाइड का निर्माण किया जाता है। 
यहाँ निजी संस्थाओं द्वारा सर्वाधिक नमक का उत्पादन किया जाता है। 
  * इन निजी संस्थाओं को देवल के नाम से जाना जाता है। 
इस झील में लवणीय पानी की क्यारियाँ बनाकर उसे सूखा कर नमक प्राप्त किया जाता है। 
जिसे ब्राइन नमक के नाम से जाना जाता है।

पंचपदा झील

पंचपदा झील बाड़मेर में स्थित है। 
इस झील का निर्माण आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व पंचा नामक भील के द्वारा करवाया गया। 
इस झील का नमक खाने की दृष्टि से उत्तम माना जाता है। 
इस झील के नमक में 98 प्रतिशत सोडियम क्लोराइड की मात्रा पाई जाती है। 
इस झील में खारवाल जाति के द्वारा मोरली झाड़ी से नमक तैयार किया जाता है। 
पंचपद्रा में कुंए बनाकर नमक का उत्पादन किया जाता है। जिसे कोषिया कहते है।

लूणकरणसर झील

लूणकरणसर झील बीकानेर में स्थित है।    
इस झील का नमक खाने की दृष्टि से उत्तम नहीं है। 
यह उत्तरी भारत की एक प्रमुख खारी झील है।

कावोद झील

कावोद झील जैसलमेर में स्थित है।  
कावोद झील का नमक आयोडीन की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ नमक है।

बाप झील

बाप झील जोधपुर में स्थित है। 
बाप झील में राज्य का पहला कोयला संयंत्र स्थापित किया गया।

राजस्थान में मीठे पानी की झीलें 

Rajasthan ki Pramukh Jhile
Rajasthan ki Pramukh Jhile

पुष्कर झील

पुष्कर झील अजमेर में नेशनल हाइवे 89 पर स्थित है। 
यह झील ज्वालामुखी से निर्मित है। 
अतः यह कालाडेरा झील कहलाती है। 
पद्मपुराण के अनुसार इस झील का निर्माण ब्रह्मा जी ने करवाया था। 
पुष्कर झील का नाम पुष्करणा ब्राह्मणों के नाम पर रखा गया है। 
पुष्कर झील को प्राचीनकाल में परूषकारण्य के नाम से जाना जाता है। 
पुष्कर झील राजस्थान में अर्द्धचंद्राकार रूप में फैली हुई है। .
इस झील को जल की व्यवस्था सरस्वती नाले के द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। 
पुष्कर झील को हिंदुओं का पांचवां तीर्थ, कोंकण तीर्थ, प्रयागराज का गुरू, तीर्थराज के नाम से जाना जाता है। 
पुष्कर झील राजस्थान की सबसे पवित्र, प्राचीन, प्राकृतिक व प्रदूषित झील है। 
कार्तिक पूर्णिमा को इस झील के किनारे विशाल मेला भरता है, इस मेले को राजस्थान का रंगीला मेला कहा जाता है। 
पुष्कर को तीर्थों का मामा के उपनाम से जाना जाता है। 
मंचकुण्ड, धौलपुर को तीर्थों का भान्जा के नाम से जाना जाता है।
पुष्कर झील के किनारे विश्वामित्र ने तपस्या की जिसे मेनका ने भंग कर दिया।

पुष्कर झील के किनारे वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की तथा कालीदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम् पुस्तक की रचना की।

इस झील के किनारे कौरवों तथा पाण्डवों का अंतिम मिलन हुआ।
इस झील के किनारे कुल 52 घाट है। 
इन घाटों का निर्माण 944 में मण्डौर नरेश नाहर राव परिहार ने करवाया। 
पुष्कर झील का सबसे पवित्र घाट गौ (गऊ) घाट है। 
गौ (गऊ) घाट के किनारे 1705 में गुरू गोविंद सिंह ने गुरू ग्रंथ साहिब का पाठ किया है। 
1911 में मैडम मैरी के आगमन पर इस झील के किनारे महिला घाट का निर्माण करवाया। 
महिला घाट को वर्तमान में गांधी घाट के नाम से जाना जाता है। 
महात्मा गांधी की अस्थियाँ इस झील में विसर्जित की गई। 
पुष्कर में सर्वाधिक बार औरंगजेब के द्वारा नुकसान पहुंचाया गया।

पुष्कर झील को गहरा करने के लिए कनाडा के सहयोग से 1997 में पुष्कर समन्वित विकास योजना / पुष्कर गेप परियोजना चलाई गई। 

इस झील के किनारे ब्रह्मा जी व सावित्री माता का मंदिर स्थित है। 
ब्रह्मा जी के मन्दिर का निर्माण गोकुल चंद पारीक के द्वारा करवाया गया। 
इस मंदिर में मूर्ति स्थापना का कार्य शंकराचार्य द्वारा करवाया गया। 
इस झील के किनारे बूढ़ा पुष्कर तथा कनिष्ठ पुष्कर स्थल स्थित है। 
इस झील के किनारे अर्णोराज निर्मित वराह मंदिर द्रविड़ शैली में निर्मित रंग जी का मंदिर/बैकुंठ मंदिर स्थित है। 
पुष्कर झील के किनारे लगभग 400 मंदिर स्थित है। 
इस कारण इसे मंदिरों की नगरी के उपनाम से भी जाना जाता है। 
पुष्कर झील के किनारे भृतहरि की गुफा तथा कण्वमुनि आश्रम स्थित है। 
इस झील के किनारे भगवान श्रीराम चंद्र जी ने अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था। 
इस झील को आर.टी.डी.सी. का संरक्षण प्राप्त है।
1809 में मराठा सरदारों के द्वारा इस झील का पुनरूद्धार करवाया गया। 
राज्य की 8 झीलों- पुष्कर, आनासागर, फतेहसागर, पिछौला, जयसमंद, स्वरूपसागर, नक्की व जैतसागर झील को केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय झील संरक्षण योजना में शामिल किया है।

राजसमंद झील

यह राजस्थान की एकमात्र झील है जिसके ऊपर जिले का नाम रखा गया है। 
इस झील का निर्माण राजसिंह (1662-76) के द्वारा अकाल राहत कार्य के दौरान कांकरोली रेलवे स्टेशन के पास करवाया गया। 
इस झील के उत्तरी भाग को नौ चौकी की पाल के उपनाम से जाना जाता है। 
इस झील के उत्तरी भाग में स्थित किनारे के चारों ओर 9 सीढ़ियां होने के कारण इसे नौ चौकी की पाल के नाम से जाना जाता है। 
नौ चौकी की पाल पर काले संगमरमर के 25 शिलालेख में राजप्रशस्ति लिखी हुई है।
राजप्रशस्ति की रचना रणछोड भट्ट तैलंग के द्वारा सस्कृत भाषा में की गई।
राजप्रशस्ति में मेवाड़ के शासकों का वर्णन 1917 श्लोकों में लिखा हुआ है। 
राजप्रशस्ति विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति मानी जाती है। 
राजसमंद झील में खुदाई का कार्य मालवा की घेवर बाई के द्वारा करवाया गया। 

जयसमंद झील

जयसमंद झील का निर्माण जयसिंह के द्वारा ( 1685-91) गोमती नदी पर बांध बनवाकर करवाया गया।
जयसमंद झील को ढेबर झील के उपनाम से जाना जाता है। 
गोमती नदी के ढेबर दर्रे से निकलने के कारण इस झील को ढेबर झील के नाम से जाना जाता है।
इस झील में जल गिराने वाली नदियां गोमती, झावरी व केलवा है। 
जयसमंद राजस्थान की सबसे बड़ी कृत्रिम तथा सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है। 
इस झील के किनारे कुल 7 टापू बने हुए है। 
सबसे बड़े टापू का नाम बाबा का भागड़ा व छोटे टापूका नाम प्यारी है। 
इन 7 टापूओं पर भील और मीणा जनजाति के लोग निवास करते है। 
इन 7 टापूओं से 1950 में सिंचाई करने हेतु श्यामपुरा व भाटखेड़ा नहरें निकाली गई है।

इस झील के किनार जयासह न नमद्धवश्वर महादव क मादर का निर्माण करवाया। 

इस झील के एक टापू बाबा का मगरा के किनारे आइसलैण्ड रिसोर्ट होटल स्थित है। 
इस झील के जल में कई प्रकार के जलचर पाये जाते है। 
इसलिए इसे जलचरों की बस्ती के उपनाम से भी जाना जाता है। 
जयसमंद झील के पूर्व में लासड़िया का पठार स्थित है। 
इस झील में रियासत काल के हिंसक पशुओं को देखने के लिए बनाये झरोखों को औदिया कहा जाता है। 
  * औदिया का शाब्दिक अर्थ है- अवलोकन स्तम्भ।

पिछोला झील

पिछोला झील उदयपुर में स्थित है। 
इस झील का निर्माण 14वीं शताब्दी ( 1387 ) में राणा लाखा के समय छित्तरमल बनजारे के द्वारा अपने बैल की स्मृति में करवाया गया। 
महाराणा सांगा ने 1525 में इस झील का जीर्णोद्धार करवाया। 
यह झील राजमहल के पीछे बनी हुई है। 
इस कारण इसे पिछौला के नाम से जाना जाता है।
इस झील को स्वरूप सागर झील के नाम से जाना जाता है।
इस झील में जल गिराने वाली नदियां सीसारमा व बुझड़ा है। 
इस झील के किनारे जगमंदिर व जगनिवास होटल स्थित है। 
जगमंदिर का निर्माण करणसिंह ने 1620 में शुरू किया तथा जगतसिंह प्रथम ने 1651 में इसे पूर्ण करवाया।
जगमंदिर में स्थित दिलवाड़ा हवेली में शाहजहां (खुर्रम) ने गुजरात अभियान के समय शरण ली थी। 
जगमंदिर की प्रेरणा से ही शाहजहां ने मुमताज की याद में ताजमहल बनवाया।

फतेहसागर झील

फतेहसागर झील उदयपुर में स्थित है।  
इस झील का निर्माण जयसिंह ( 1688 ) के द्वारा करवाया गया।
इस झील का पुनः निर्माण फतेह सिंह (1888) के द्वारा करवाया गया। 
झीलों को जोड़ने की अवधारणा के जनक फतेहसिंह थे। 
फतेहसागर झील को पहले देवली तालाब के नाम से जाना जाता था। 
इस झील की नींव ड्यूक ऑफ क्नोट (1678) विद्वान के द्वारा रखी गई।
इस झील को क्नोट बांध के नाम से भी जाना जाता है।
फतेहसागर झील के किनारे नेहरू उद्यान स्थित है।
इस झील में भारत की पहली सौर वैद्यशाला 1975 में अहमदाबाद में स्थित संस्थान के द्वारा स्थापित की गई। इस झील के पास मोती मगरी नामक पहाड़ी स्थित है। 
जिस पर महाराणा प्रताप का स्मारक बना हुआ है। 
इस झील पर फतेहसागर बांध स्थित है। 
जिसके नीचे सहेलियों की बाड़ी नामक उद्यान बना हुआ है। 
सूर्य की गतिविधियों का अध्यन करने व मौसम की सटीक जानकारी प्राप्त करने के लिए फतेहसागर झील के किनारे टेलीस्कोप स्थापित किया जायेगा। 
जिसका निर्माण बेल्जियम में करवाया जा रहा है।

नक्की झील

नक्की झील माउण्ड आबू-सिरोही में स्थित हैं। 
माना जाता है कि इस झील का निर्माण देवताओं ने अपने नाखूनों से करवाया था। 
इस झील का निर्माण 14वीं शताब्दी में करवाया गया।
यह झील विवर्तनिकी/क्रेटर झील का उदाहरण है। 
यह राजस्थान की सर्वाधिक ऊंचाई ( 1200 मी.) पर स्थित झील है। 
यह राजस्थान की एकमात्र झील है जिसका जल सर्दियों में जम जाता है।
इस झील के किनारे नन रॉक, टॉड रॉक व नंदी रॉक चट्टानें स्थित है।
टॉड रॉक की आकृति मेंढ़क के समान, नन रॉक की आकृति महिला के धुंघट के समान तथा नंदी रॉक की आकृति बैल/शिव के नांदिया/साण्ड जैसे आकार की बनी हुई है।

कोलायत झील

कोलायत झील बीकानेर के कोलायत में स्थित है। 
कोलायत झील के किनारे कपिल मुनि का आश्रम स्थित है। 
कपिल मुनि को सांख्य दर्शन का प्रणेता माना जाता है। 
पुराणी मान्यता के अनुसार कपिल मुनि ने अपनी माता की मुक्ति के लिए इस स्थान से पाताल गंगा निकाली थी, जो वर्तमान में कपिल सरोवर कहलाता है। 
इस झील के किनारे कार्तिक पूर्णिमा का मेला भरता है। 
कार्तिक पूर्णिमा के दिन किया गया स्नान गंगा स्नान के समान पवित्र माना जाता है।

आनासागर झील

आनासागर झील अजमेर में स्थित है।  
इस झील का निर्माण अर्णोराज/आना जी ने अजमेर में चंद्रा नदी के पानी को रोककर करवाया था।
अर्णोराज ने इस झील का निर्माण तुर्क सेना के नरसंहार से खून से लाल हुई धरती को धोने के लिये करवाया था। जहांगीर ( सलीम ) ने इस झील के किनारे दौलत बाग का निर्माण करवाया था। 
जिसे वर्तमान में सुभाष उद्यान के नाम से जाना जाता है। 
दौलतबाग में जहांगीर ने अंग्रेज राजदूत सर टॉमस रॉ से वार्ता की। 

सिलीसेढ़ झील

सिलीसेढ़ झील अलवर में स्थित है। 
इस झील का निर्माण विनय सिंह के द्वारा करवाया गया। 
इस झील को राजस्थान का नंदन कानन कहा जाता है। 
इस झील के किनारे विनयसिंह ने 1845 में शिकारी लॉज व अपनी महारानी शीला के लिए 6 मंजिला शाही महल का निर्माण करवाया, जो वर्तमान में होटल लेक पैलेस के नाम से जाना जाता है। 
यह झील मत्स्य पालन हेतु प्रसिद्ध है। 
इसमें नौकायन की सुविधा भी उपलब्ध है।

बालसमंद झील

बालसमंद झील जोधपुर में स्थित है। 
इस झील का निर्माण 1159 में बालकराव परिहार के द्वारा मण्डौर नामक स्थान पर करवाया गया। जोधपुर के शासक महाराजा सूरसिंह ने इस झील के मध्य में अष्ट खंभा महल का निर्माण करवाया। इस झील में पानी नहरों के द्वारा गुलाब सागर बांध से आता है। सूरसिंह ने इस झील के ऊपरी किनारे पर एक बाहरदरी का निर्माण करवाया एवं झील के दक्षिण में सूरसिंह ने अपनी रानी के लिए एक महल का निर्माण करवाकर उस महल में एक बाग बनवाया जिसे जनाना बाग के नाम से जाना जाता है।

मोती झील, भरतपुर 

इस झील का निर्माण सूरजमल जाट के द्वारा रूपारेल नदी के जल को रोककर के करवाया गया। 
सूरजमल जाट को जाटों का प्लेटो तथा अफलातून राजा के उपनाम से जाना जाता है। 
मोती झील को भरतपुर की जीवनरेखा के उपनाम से जाना जाता है।
मोती झील में नीलहरित शैवाल पाये जाते है।

गेव सागर झील, डूंगरपुर 

इस झील का निर्माण महारावल गोपीनाथ के द्वारा करवाया गया। 
इस झील को एडवर्ड सागर बांध के उपनाम से भी जाना जाता है। 
इस झील के किनारे काली बाई का स्मारक तथा बादल महल स्थित है।

कायलाना झील, जोधपुर 

तीन ओर से पहाड़ियों से घिरी यह एक प्राकृतिक झील है। 
इस झील का आधुनिकीकरण 1872 में सर प्रतापसिंह ने करवाया। 
इस झील को प्रतापसागर झील के नाम से भी जाना जाता है। 
इस झील के किनारे भारत का प्रथम मरू वानस्पतिक उद्यान माचिया सफारी पार्क स्थित है। 
इस झील में जल की व्यवस्था इंदिरा गांधी नहर की राजीव गांधी लिफ्ट नहर के द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है।
यह जोधपुर जिले की सबसे बड़ी झील है।

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