Rigvedic Sabhyata or Sansrati - ऋग्वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति

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ऋग्वैदिक या पूर्ववैदिक काल की सभ्यता एवं संस्कृति की सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने वाला ग्रन्थ ऋग्वेद है।
ऋग्वेद में 10 मण्डल एवं 1028 ऋचाएँ हैं।
ऋग्वेद में अग्नि, इन्द्र, उषा, धीष, पुरुष आदि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्राकृतिक शक्तियों को दैवीय शक्ति मानकर उनकी स्तुति की गई है।

आर्यों का राजनीतिक जीवन

भारत में सप्तसैन्धव प्रदेश में आकर बसने के उपरान्त आयों को दो प्रकार के संघर्षों का सामना करना पड़ा -
1. आर्यों के विभिन्न कबीलों से संघर्ष
2. अनार्यों से युद्ध
यहाँ पर आगमन के समय आर्य निम्नलिखित कबीलों में विभक्त थे -
1. भरत (ब्रह्मावर्त क्षेत्र में)
2. मत्स्य (भरतपुर में)
3. अनुस तथा द्रुह्यु (पंजाब में)
4. तुर्वसु (दक्षिण-पूर्व में)
5. यदु (पश्चिम में)
6. पुरू (सरस्वती नदी के आसपास)

कबीलों में आपसी संघर्ष अधिक भूमि, पशुओं एवं चरागाहों के लिए होता था।
ऋग्वेद में युद्ध के अर्थ में गविष्टि, गोषु, गद्य एवं गम्य शब्दों का प्रयोग हुआ है।
ऋग्वेद में कबीले के अर्थ को प्रकट करने वाला शब्द विश् है, जिसका 170 बार प्रयोग हुआ है।
ऋग्वेद में जन् शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है।
ऋग्वेद में कबीलाई युद्धों में प्रमुख युद्ध 'दशराज्ञ युद्ध' (दस राजाओं के युद्ध) का वर्णन मिलता हैं।
ऋग्वेद में वर्णित तथ्यों के अनुसार दशराज्ञ युद्ध में लगभग तीस राजाओं ने भाग लिया था।
दशराज्ञ युद्ध भरत कवीले के राजा सुदास के नेतृत्व में परुष्णी (रावी) नदी के तट पर लड़ा गया था।
इस युद्ध में सुदास द्वारा अपमानित करने पर विश्वामित्र ने पंचजन-अणु, द्रुघु, यदु, तुवर्स और पुरू के साथ अन्य लोगों को संगठित कर यह युद्ध किया था।
दशराज्ञ युद्ध में सुदास की विजय हुई थी।
ऋग्वैदिककाल में जन से तात्पर्य कबीला था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में सर्वाधिक मिलता है।
ऋग्वेद में अनायों के लिए पणि, दास, दस्यु के नाम का उल्लेख किया गया है।

ऋग्वेद में अनायों की निम्न जातियों का उल्लेख हुआ है-
1. अज
2. यक्ष
3. किकट
4. पिशाच
5. शिश्रु
   'पणि' आर्यों को अपमानित कर उनके पशु/मवेशी चुरा लेते थे, जिसके कारण आर्यों को पणियों से संघर्ष करना पड़ता था।
पणि, दास, दस्युओं को भारत का मूल निवासी ही माना गया है।

आर्यों का राजनीतिक संगठन

आर्यों में रक्त-सम्बन्धों के आधार पर कुटुम्ब, कुल या परिवार संगठित होते थे।
आर्यों में सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई कुटुम्ब होता था।
परिवार, कुल या कुटुम्ब का मुखिया (प्रधान) 'कुलप' या 'कुलपति' कहलाता था।
अनेक परिवारों के संगठन से ग्राम का निर्माण होता था जिसका मुखिया 'ग्रामणी' कहलाता था।
अनेक ग्रामों को मिलाकर एक विश् का निर्माण होता था, जिसका प्रधान 'विश्पति' कहलाता है।
अनेक विशों का समूह जन या कवीला होता था जिसका प्रधान राजा या गोप होता था।
वैदिक काल के उत्तरार्द्ध में जनपद, राज्य, राष्ट्र की अवधारणा स्थापित हुई।
ऋग्वैदिक काल में शासन का प्रमुख राजन (गोप, गोपति, जनराजन, विशपति) होता था।
ऋग्वैदिककाल में शासन का प्रमुख राजन या राजा प्रजा का नेतृत्व करता था, प्रजा की सुरक्षा करता था।
उसके बदले में प्रजा राजा की आज्ञा का पालन करती थी।
ऋग्वैदिक काल में राजा भगवान् या अवतार नहीं होता था।
केवल एक योग्य व्यक्ति माना जाता था।
उसे स्वच्छाचारिता का कोई अधिकार नहीं था।
राजा की शक्तियाँ सभा (उच्च सदन) एवं जनसभा (जिसे समिति कहते थे) लोगों की इच्छा के अनुसार होती थी।
राजन का पद कई स्थिति में वंशानुगत ही होता था।
राजा की प्रशासनिक सहयोगिता के लिए पुरोहित, सेनानी एवं ग्रामणी होते थे।
ऋग्वैदिककालीन राजा की कोई सेना या आमदनी का स्रोत नहीं होता था।
वैदिककाल में अनेक जनतान्त्रिक संस्थाएं कार्यरत् थीं।

तत्कालीन जन्तान्त्रिक संस्थाओं में प्रमुख निम्न थीं-
1. सभा
2. समिति
3. विदय
4. गण
 सभा सम्पूर्ण प्रजा की जनसभा थी।
यह होमरकालीन गुरुजन प्रणाली से मिलती-जुलती थी।
सभा में स्त्रियाँ भी भाग लेती थीं. सभा का प्रमुख कार्य 'न्याय' करना था।
समिति राजा का निर्वाचन करती थी।
धार्मिक एवं सैनिकों से सम्बन्धित मामलों के लिए 'विदथ' होता था।
सभा, समिति, गण एवं विदथ के साथ राजा का स्नेहिल सम्बन्ध होना अत्यावश्यक था।
युद्धकाल में राजा द्वारा गठित सेना का संचालन वर्त्त एवं गण करते थे।
युद्ध में नेतृत्व करने वाला अधिकारी 'ब्रजपति' कहलाता था।
व्रजपति ही 'ग्रामणी' का नेतृत्व भी करता था।
ऋग्वैदिक काल की न्यायिक व्यवस्था अद्वितीय थी, राजा ही न्याय किया करता था।

ऋग्वेदकालीन समाज

ऋग्वेदकालीन समाज 'पितृसत्तात्मक' था।
समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार था।
उसका मुखिया कुलपति होता था।
कुलपति का परिवार पर नियन्त्रण एवं प्रभाव रहता था।
ऋग्वेदकालीन परिवार संयुक्त होते थे।
कई पीढ़ियों तक परिवार के बन्धु-बान्धव साथ रहते थे।
उन्हें 'नप्तृ' कहा जाता था. ऋग्वेद में सौवीर (पुत्र) की कामना का उल्लेख मिलता है।
माता को गृहस्वामिनी माना जाता था एवं उसे पूर्ण अधिकार एवं सम्मान प्राप्त था।
विवाह के लिए स्त्रियों को पिता की अनुमति लेना आवश्यक था।

    वैदिककालीन प्रमुख विदुषी महिलाएं निम्नलिखित हैं-
1. विश्वतारा
2. विश्पला
3. घोषा
   स्त्रियों को सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त नहीं होता था एवं उन्हें पुरुषों के संरक्षण में रहना अत्यावश्यक था।
ऋग्वैदिक संस्कृति में सती प्रथा का प्रचलन नहीं था।
तत्कालीन संस्कृति में 'नियोग' की व्यवस्था प्रचलित थी।
वैदिककालीन समाज में विवाह एकात्मक होते थे।
राजकुमारों के लिए बहुविवाह का भी प्रचलन था।
बाल-विवाह प्रचलित नहीं था। 

ऋग्वैदिक संस्कृति

ऋग्वैदिक संस्कृति में वधू मूल्य एवं दहेज दोनों प्रथाएँ प्रचलित थी।
स्त्रियों/कन्याओं को शिक्षा, कवीलों की सभाओं एवं समितियों तथा राजनीति में भाग लेने का अधिकार था।
आठों प्रकार के विवाहों का प्रचलन था, तथापि स्वयंवर प्रथा अस्तित्व में नहीं थी।

आर्यों का प्रारम्भिक वर्गीकरण वर्ण एवं कर्म के आधार पर निष्पादित हुआ था।
इस काल में प्रमुख तीन वर्ग थे-
1. ब्राह्मण
2. क्षत्रिय
3. वैश्य
वैदिककाल में ब्राह्मण एवं क्षत्रिय को 'राजन्य' कहा जाता था।
सामान्य लोग वैश्य वर्ण के अन्तर्गत आते थे।
अनार्यों को आयों में समाहित कर एक नये वर्ण का उदय हो चुका था जिसे 'शूद्र' कहा जाता था।

    ऋग्वेद के दसवें मण्डल के अनुसार वर्षों की उत्पत्ति निम्न तरीके से हुई थी -
1. ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण की उत्पत्ति
2. ब्रह्मा की वाहु से क्षत्रिय की उत्पत्ति
3. ब्रह्मा की जंघा से वैश्य की उत्पत्ति
4. ब्रह्मा के पैर से शूद्र की उत्पत्ति
   ऋग्वेद में दास एवं दस्युओं के साथ आर्यों के संघर्ष का उल्लेख प्राप्त होता है।
विद्वान इतिहासकारों के अनुसार दास या दस्यु भारत के निवासी थे।
वैदिक काल में धनी वर्ग दास रखते थे।
आर्थिक उत्पादनों में दासों से कोई सम्बन्ध नहीं था।
आर्यों का वर्ण गौर था एवं वैदिककालीन मूलनिवासी काले रंग के थे।

     वैदिककालीन कवीलाई समाज तीन भागों में विभक्त था-
1. योद्धा
2. पुरोहित
3. प्रजा
आर्यों का भोजन अनाज, दूध, फल एवं माँस होता था।
सुरा और सोमरस का प्रयोग भी आर्यों द्वारा किया जाता था।
वैदिककालीन लोग कमर के नीचे वास एवं कमर के ऊपर अधिवास वस्त्रों का प्रयोग स्त्री एवं पुरुष दोनों करते थे।
स्त्रियाँ कंचुकी (नीवी) पहनती थीं।
इस काल में सूती एवं ऊनी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था।
रंगने, कशीदाकारी की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई थी।
बाल संवारने की विभिन्न कलाओं का विकास हो चुका था, आर्य पुरुष स्त्रियाँ नुपुर, हार, कुण्डल आदि आभूषणों का प्रयोग करते थे।
रथ दौड़, नृत्यगान, धूत-क्रीड़ा वैदिककालीन मनोरंजन के साधन थे।
आर्यों के घर लकड़ी, बाँस एवं फूस से बनाये जाते थे।
उन्हें ईंटों का ज्ञान नहीं था. जड़ी-बूटियों, जादू-टोने का प्रयोग बीमारियों से मुक्ति के लिए किया जाता था।
बड़ों का सम्मान, अतिथि सत्कार, दान आदि पर आर्यों का प्रवल विश्वास था।
मृतकों के दाह संस्कार की परम्परा विद्यमान थी।
तत्कालीन विद्यार्थी गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करता था, जहाँ पर ब्राह्मण शिक्षक होता था।

ऋग्वेदकालीन अर्थव्यवस्था

आर्यों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण तत्त्व पशुपालन था. पशुपालन के अतिरिक्त कृषि एवं कुटीर उद्योगों पर भी आर्य केन्द्रित थे।
धनाढ्य व्यक्तियों के पास अनेक पशु होते थे, उन्हें 'गोमत' कहा जाता था।
'गाविप्ती, गवेषणा, गीयत' शब्दों का अर्थ 'गाय की खोज' होता था, जिन्हें आर्य लोग लड़ाई एवं संघर्षों के लिए प्रयोग में लेते थे।
ऋग्वेद में पशु सम्पदा की वृद्धि की कामना कई बार की गई है।
पशुओं की रक्षा करने वाला देवता 'पूषन' होता था।
पशुओं के कारण ही आर्यों में युद्ध भी होता था।
ऋग्वैदिक समाज में गाय प्रमुख पशु होता था, जिसकी चोरी का उल्लेख सर्वाधिक मिलता है।
गाय को 'अधन्या (अछन्या)' (जो मारने के योग्य नहीं हो) माना जाता था।
ऋग्वेद के अनुसार देवताओं की उत्पत्ति 'गाय' से ही हुई थी।
गाय जमीन से अधिक मूल्यवान थी एवं इसका विनिमय भी होता था।
आर्य भेड़, बकरियाँ, कुत्ते एवं घोड़ों का पालन करते थे एवं ऊँट, हाथी, बाघ तथा सिंह से भी परिचित थे. पशुओं एवं चरागाहों की देखभाल वज्रपति करता था. आर्य फसल काटना, बीज बोना, सिंचाई करना. डंठलों से अनाज अलग करना आदि गतिविधियों को जानते थे. जौ (यव) एवं धान (धान्य) प्रमुख रूप से उपजाया जाता था एवं काठ के हल एवं बैलों से आर्य खेती करते थे.

     ऋग्वैदिक समाज में प्रमुख व्यवसायी वर्ग निम्नलिखित थे -
1. बढ़ई-स्थ, गाड़ियाँ एवं मकान बनाते थे।
2. जुलाहा-वस्त्र बुनते थे. स्त्रियाँ सूत कातती थीं।
3. चर्मकार-चमड़े की वस्तुएँ बनाते थे।
4. कर्मकार-अयस् नामक धातु से हथियार एवं उपकरण बनाते थे।
5. हिरण्यकार-सोने के आभूषण बनाते थे।
6. भिषक-व्याधियों की रोकथाम करते थे।

   देवताओं का वैद्य अश्विनी था।
ऋग्वेद में समुद्र शब्द का उल्लेख हुआ है लेकिन विदेशी व्यापार के साक्ष्य नहीं मिलते।
विद्वानों के मतानुसार वैदिककाल में भी नगर प्रणाली विद्यमान थी।
1600-1000 ई.पू. के मध्य की तिथि का एक भग्न एवं दूरी के लिए 'गव्युति' शब्द का प्रयोग हुआ है।
इस काल अवशेष भगवानपुरा (हरियाणा से) प्राप्त हुआ है, जहाँ पर में पत्थर की कुल्हाड़ी का उपयोग होता था। इस आशय का मिट्टी या पक्की ईंटों का तेरह कमरों वाला भवन निकला है उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है।
गायों को दुहने के सन्दर्भ में पुत्री बैलगाड़ी एवं घोड़े व रथ वैदिक समाज के आवागमन का को 'दुहिता' कहा जाता था।
आग को जंगल जलाने के प्रयोग प्रमुख साधन या. समयमाप के लिए वैदिक समाज में गोधूलि में लिया जाता था एवं कृषि भूमि को बदला जाता था।

ऋग्वैदिक धार्मिक मान्यताएँ

ऋग्वेद में 'ऋत' की अवधारणा का प्रस्फुटन हुआ है।
Rigvedic Sabhyata or Sansrati - ऋग्वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति
विद्वानों के मतानुसार ऋत नैतिक एवं आध्यात्मिक व्यवस्था का नियामक या. ऋत पर ही सम्पूर्ण संसार एवं देवताओं को आधारित माना गया था।
वरुण को 'ऋतस्य गोपा' कहा गया है।
ऋत की स्थापना एवं रक्षा पासा खेलने से होती थी।
समय गुजरते वैदिक समाज वर्ण एवं वर्गों में विभाजित हो गया, जिससे स्वार्थपरता के वशीभूत होकर ऋत की अवधारणा एवं वरूण की महत्ता का विनाश लोगों ने कर दिया।
ऋग्वैदिक संस्कृति के आर्य बहुदेववादी एवं प्रकृति की पूजा में विश्वास रखते थे।

    आर्यों के देवताओं की निम्नलिखित श्रेणियाँ थीं-
1. पृथ्वी के प्रतीक देवता-पृथ्वी, सोम, अग्नि, बृहस्पति।
2. अंतरिक्षवासी देवता-इन्द्र, वरुण, मरुत, वायु रुद्र।
3. आकाशीय देवता या स्वर्गस्थ देवता–सूर्य, उषा, सविता, अश्विन्, वरुण, मित्र।

   ऋग्वेदिककालीन देवताओं में सर्वोपरि इन्द्र को माना जाता था, जो प्रकाश, वर्षा, युद्ध का देवता समझा जाता था।
ऋग्वेद में 250 ऋचाएँ इन्द्र की स्तुति के लिए हैं।
न्याय, नैतिकता, शक्ति का देवता वरूण या, जिसका सहयोगी देवता मित्र था।
देवताओं और मानवों के मध्य सम्पर्क साधक अग्नि थी, जिसके द्वारा देवता अपना आहार ग्रहण करते थे।
ऋग्वेद में इसकी स्तुति में 200 ऋचाओं का प्रयोग हुआ है।

    आर्यों के अन्य देवता निम्नलिखित थे-
1. सोम-वनस्पति का देवता
2. सूर्य-प्रकाश का देवता
3. मरुत-तूफान का देवता
4. पूषन-पशुओं का देवता
अदिति एवं उपा-दो देवियों के रूप में मान्य थी।
ऋग्वैदिक समाज में भूत-प्रेत, राक्षस, पिशाच, अप्सरा आदि पर विश्वास था।
टोने-टोटके की प्रथाएँ प्रचलित थीं।

गणचिह्नात्मक आस्थाओं में निम्नलिखित जातियों एवं व्यक्तियों का उल्लेख ऋग्वैदिक समाज में मिलता है-
1. अज
2. शिग्रू
3. काश्यप
4. गौत्तम
5. मत्स्य
आर्यों ने कालान्तर में में इन्द्र-मित्र, वरुण-अग्नि जैसे युगल देवताओं को मानना स्वीकार किया।
आर्य यज्ञाहुति एवं स्तुति के द्वारा शतवर्षीय आयु, पुत्र, धन-धान्य और विजय की कामना करते थे।
देवताओं से मोक्ष नहीं मांगी जाती थी।
यज्ञ दो प्रकार के होते थे
1. व्यक्तिगत यज्ञ
2. सामूहिक यज्ञ
यज्ञों में घी, दूध, धान्य, मांस की आहुति प्रदान की जाती थी।
पुरोहित यज्ञ करते थे, जिन्हें बदले में गाय-सोना, दास-दासी दक्षिणा में प्राप्त होते थे।

     ऋग्वैदिक काल में प्रमुख रूप से निम्न यज्ञों का प्रचलन था -
1. ब्राह्मयज्ञ
2. देवयज्ञ
3. पितृयज्ञ
4. नमित्तिक (नैमित्तिक) यज्ञ
नमित्तिक (नैमित्तिक) यज्ञ निश्चित उद्देश्यों के पूर्ति के लिए होते थे जिनके प्रकार निम्न थे-
1. पुत्र कामेष्टि यज्ञ
2. आयुष्कामेष्टि यज्ञ
3. लोकेष्टि यज्ञ
ऋग्वेद में नरबलि के साक्ष्य के रूप में शुनःशेप का उदाहरण मिलता है, जिसके आधार पर यज्ञों में पशुबलि की धारणा स्पष्ट होती है।
मंदिर एवं मूर्तिपूजा का इस काल में कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होते।
मोक्ष प्राप्ति में आर्यों को विशेष विश्वास नहीं था।
बलि प्रथा के कारण इस काल में गणित का आविर्भाव हुआ।

Rigvedic Sabhyata or Sansrati PDF

Name of The Book : *Rigvedic Sabhyata or Sansrati PDF in Hindi*
Document Format: PDF
Total Pages: 08
PDF Quality: Normal
PDF Size: 1 MB
Book Credit: Harsh Singh
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