राजस्थान के लोक नृत्य - Rajasthan Ke Lok Nartay

जब व्यक्ति प्रसन्न व प्रफुल्लित होता है तो स्वतः ही उसके पैर थिरकने लगते हैं।
यह भाव-भंगिमाएँ ही 'नृत्य' कहलाती हैं।
लोक नृत्य उमंग में भरकर प्रायः सामूहिक रूप से किए जाते हैं। 
इनमें न तो मुद्राएँ निर्धारित होती है और न ही अंगों का निश्चित परिचालन होता है।
इस प्रकार के नृत्यों को 'देशी नृत्य' या 'लोक नृत्य' कहा जाता है।
राजस्थान के लोक नृत्यों में लय, ताल, गीत, सुर आदि का सुंदर एवं संतुलित सामंजस्य देखने को मिलता हैं। 
लोक नृत्य राजस्थान के जनजीवन की संजीवनी बूटियाँ हैं । 
इसी बूंटी की चूटी लेकर राजस्थान के जनजीवन ने भूखा और नंगा रहते हुए भी मस्ती में जीना सीखा है।
यदि नृत्य को निश्चित नियमों व व्याकरण के माध्यम से किया जाए तो यह 'शास्त्रीय नृत्य' कहलाता है।राजस्थान की शास्त्रीय नृत्य . कला का नाम 'कत्थक शैली' है। 
पूरे भारत में कत्थक शैली का उद्गम राजस्थान से ही हुआ है।
राजस्थान में विभिन्न-विभिन्न प्रकार के नृत्य विभिन्न अवसरों पर किये जाते हैं।

 Rajasthan Ke Lok Nartay
 Rajasthan Ke Lok Nartay

     राज्य के लोक नृत्यों को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
1. क्षेत्रीय लोक नृत्य 
2. व्यावसायिक लोक नृत्य 
3. जातीय लोक नृत्य 
4. सामाजिक या धार्मिक लोक नृत्य

क्षेत्रीय लोक नृत्य 

राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे लोक नृत्य विकसित हुए जो उस क्षेत्र की पहचान बन गए ऐसे नृत्य को हम क्षेत्रीय लोक नृत्य कहते हैं । 
क्षेत्रीय लोक नृत्यों में कुछ मुख्य लोक नृत्य इस प्रकार हैं।

गैर नृत्य

गोल घेरे में इस नृत्य की संरचना होने के कारण यह 'घेर नृत्य' कहलाता था जिसे कालांतर में 'गैर नृत्य' कहा जाने लगा। 
यह नृत्य होली के दूसरे दिन से शुरू होता है तथा पन्द्रह दिन तक मेवाड़ और बाड़मेर में इस नृत्य की धूम मची रहती है। 
इस नृत्य में ढोल, माँदल तथा थाली वाद्य यंत्र प्रयोग में लिए जाते हैं। 
इसके नर्तकों को 'गेरिये' कहा जाता है।
गैर नृत्य में 'गींदड नत्य' की भाँति मेवाड़ और बाड़मेर क्षेत्र में पुरुष लकड़ी की छड़ियाँ (खाँडा) लेकर गोल घेरे में नृत्य करते हैं। 
मेवाड़ व बाड़मेर गैर नृत्य की मूल रचना का एक ही प्रकार है, 
किंतु नृत्य की लय, चाल और मंडल एवं नृतकों की पोशाकों में अंतर -  
मेवाड़ में गैर नृत्य करने वाले सफ़ेद अंगरखी, सफ़ेद धोती व लाल पगड़ी पहनते हैं।
बाड़मेर में सफ़ेद ओंगी/लंबा फ्रॉक, कमर में चमड़े का पट्टा व तलवार रखते हैं। 
गैर के प्रत्युत्तर में गाए जाने वाले शृंगार एवं भक्ति रस के गीत 'फाग' कहलाते हैं। 
भीलवाड़ा जिले का 'घूमर गैर नृत्य प्रसिद्ध है जिसे 1970 ई. में निहाल अजमेरा ने शुरू किया।
नाथद्वारा (राजसमंद) में शीतला सप्तमी (चैत्र कृष्ण सप्तमी) से एक माह तक गैर नृत्य का आयोजन होता है।

शेखावाटी का गींदड़ नृत्य

शेखावाटी क्षेत्र (रामगढ़, सीकर, सुजानगढ़, लक्ष्मणगढ़, चुरू आदि) में गीदड़ नृत्य का प्रारंभ नगाड़ची के मंडप के बीच में प्रार्थना करने के बाद गाँव के गुवाड़ (चौक) में होली के त्यौहार पर प्रहलाद की स्थापना (डाँडा रोपना) के बाद हो जाता हैं।
ताल, सुर और नृत्य इन तीनों का अनुपम योग गीदड़ नृत्य में देखने को मिलता है। 
यह विशुद्ध पुरुषों (केवल पुरुष महिलाएँ नहीं) का नृत्य है। 
कुछ व्यक्ति महिलाओं की पोशाक धारण करके उसमें भाग लेते हैं, जिन्हें गणगौर कहा जाता है।
गीदड़ नृत्य में नतर्क कई प्रकार के रूप बनाते हैं, जैसे साधु, डाकी-डाकन, दुल्हा-दुल्हन, पादरी, शिकारी, सरदार, सेठ-सेठानी, जोकर, पठान, बाजीगर, पराक्रमी योद्धा, राम, काली, शिव-पार्वती, कृष्ण आदि है। 
गींदड नृत्य एक प्रकार का स्वांग नृत्य है। 
गीदड नृत्य के समय गाये जाने वाले गीत के बोल इस प्रकार हैं -

"गींदड़ खेलण म्हैं जास्यां 
खाड़ खिचाले गीदड़ मांड पर रही नौबत खेलण म्हैं जास्यां
बाँध के सूमल पगड़ी केसरिया बंडी पर गींदड़....... "

शेखावाटी का जिंदाद नृत्य

यह नृत्य शेखावाटी क्षेत्र में स्त्री-पुरुषों द्वारा किया जाता है। 
इस नृत्य में मुख्य वाद्य यंत्र ढोलकी होता है।

शेखावाटी का लहूर नृत्य

लहूर शब्द को राजस्थानी भाषा में 'मीठी खुजली' कहा जाता है।
यह नृत्य शेखावाटी में झंझनूं के आसपास प्रचलित है। 
इस नृत्य में मूल कथानक नहीं होता है। 
इसमें एक अभिनेता और एक अभिनेत्री होती है जो अभिनय नृत्य करते हैं। 

शेखावाटी का चंग नृत्य

चंग नत्य भी शेखावाटी में होली के दिनों में पुरुषों द्वारा किया जाता है । 
इस नृत्य में प्रत्येक पुरुष के पास चंग होता है और वह स्वयं चंग बजाते हुए वृत्ताकार नृत्य करते हुए धमाल तथा होली के गीत की पंक्ति गाते हैं। 
गीत की पंक्ति गाने के बाद फिर वृत्ताकार होकर चंग नृत्य करते हैं जिसमें पुरुषों का अंग संचालन देखने योग्य होता है।
चंग नृत्य के समय गाये जाने वाले गीत के बोल इस प्रकार हैं-

"काहे से रची है जुलमी काहे से,
सुहागण मेहंदी काहे से रची,
कठे बुहादयूं तेरो झीरो रे कजवो,
कठे बुहादयूं बूटो रचैणी को..."

शेखावाटी का ढप नृत्य

ढप नृत्य बसंत पंचमी के अवसर पर ढप व मंजीरे बजाते हुए शेखावाटी क्षेत्र में किया जाता है।

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चूरू का कबूतरी नृत्य

कबूतरी नृत्य चूरू क्षेत्र का नृत्य है जो पेशेवर महिलाओं द्वारा किया जाता है।

जालौर क्षेत्र का ढोल नृत्य

ढोल नृत्य जालौर का प्रसिद्ध नृत्य है। 
यह केवल पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। 
इसमें एक साथ चार या पाँच ढोल बजाए जाते हैं। 
इस नृत्य में कलाकारों के समुह का मुखिया 'थांकना' कहलाता है। 
थांकना का शाब्दिक अर्थ नृतकों में जोश भरना होता है।
शैली में ढोल बजाता है। 
उसके साथ 4-5 अन्य ढोल बजाने वाले भी संगत करते हैं। 
थांकना खत्म होते ही समूह के अन्य नर्तक कोई मुँह में तलवार लेकर कोई हाथों में डंडे लेकर, कोई रूमाल लटकाकर नृत्य करते हैं। 
यह नृत्य सरगड़ा व ढोली जाति के पुरुषों द्वारा सांचलिया संप्रदाय के लोगों के विवाह उत्सव पर किया जाता है।

जालौर क्षेत्र का लुंबर नृत्य

यह जालौर जिले का महिला प्रधान नृत्य है। 
महिलाएँ यह नृत्य होली के अवसर पर गोला बनाकर करती हैं। 
इस नृत्य में महिलाएँ पाँवों की प्रत्येक गति के साथ 'ताली' बजाती हैं।

मेवाड़ क्षेत्र का रण नृत्य

रण नृत्य मेवाड़ क्षेत्र का पुरुष प्रधान नृत्य है । 
इसे सरगड़े जाति के पुरुष करते हैं। 
इस नृत्य में दो व्यक्ति नंगी तलवारों से युद्धात्मक प्रदर्शन करते हैं। 
नृत्यकार ढोलक के साथ अंग-भंग, तोड़-मरोड़ के प्रदर्शन करते हैं। 
इन्हीं मुद्राओं के साथ रूमाल या सिक्कों को धरती से उठाया जाता है जो इस नृत्य का करतब पक्ष होता है। 

मेवाड़ का हरणों नृत्य

यह नृत्य मेवाड़ क्षेत्र में दीपावली के अवसर पर बालकों द्वारा किया जाता है। 
इस नृत्य को 'लोवड़ी' भी कहा जाता है। 

भरतपुर का बम व बम रसिया नृत्य

बम रसिया नृत्य अलवर और भरतपुर क्षेत्र का नृत्य है। 
भरतपुर में भी बम नृत्य डींग तहसील का प्रसिद्ध है।
प्रश्न-पत्र के विकल्पों में अलवर व भरतपुर दोनों अलग-अलग आए तो भरतपुर विकल्प सही रहेगा।
इस नृत्य में एक बड़े नगाड़े का प्रयोग किया जाता है, जिसे 'बम' कहते हैं । 
इसे दो आदमी डंडों की सहायता से बजाते हैं। 
केवल पुरुषों द्वारा नगाड़ों की ताल पर तीन वर्गों में विभक्त होकर नर्तक रंग-बिरंगे फूंदो तथा पंखों से बंधी लकड़ी को हाथों में लिये उसे हवा में उछालते हुए नाचते हैं। 
वाद्य यंत्रों में नगाड़े के अलावा थाली, चिमटा, ढोलक, मंजीरा और खड़ताल आदि का प्रयोग भी किया जाता है।
इस नृत्य में बम वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है।  
इसी कारण इस नृत्य को बम नृत्य तथा बम नृत्य के साथ स्त्रियाँ रसिया गीत गाती हैं।  

भरतपुर का हुरंगा नृत्य

यह नृत्य भरतपुर जिले के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाने वाला एक स्वांग नृत्य नाटक है। 
इसमें पुरुष व महिलाएँ बम ढोल की ताल पर सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं। 
यह नृत्य होली के बाद चैत्र कृष्णा पंचमी से अष्टमी तक किया जाता है।

भरतपुर का चरकुला नृत्य

यह नृत्य भरतपुर जिले व उसके आसपास के बज क्षेत्र में किया जाता है।
ध्यातव्य रहे-चरकुला नृत्य का मूलत: उद्गम उत्तर प्रदेश से हुआ है। 
प्रारंभ में यह नृत्य कृष्ण की राधा की स्मृति में बैलगाड़ी के पहिए पर 108 दीपक जलाकर किया जाता था।
यह एक महिला प्रधान नृत्य है। 
नृत्य में महिलाएँ सिर पर बर्तन रख एवं उस पर दीपक जलाकर नृत्य करती है।

कतरियासर (बीकानेर) का अग्नि नृत्य

राजस्थान के लोक नृत्यों की श्रृंखला में आग के धधगते अंगारों पर किया जाने वाला ‘अग्नि नृत्य' का उद्गम बीकानेर जिले के कतरियासर' गाँव से हुआ। 
अग्नि नृत्य का प्रदर्शन करने वाले नर्तक “जसनाथी संप्रदाय' के मतानुयायी जाट, सिद्ध कबीले के लोग होते हैं, जो बीकानेर के कतरियासर, मामलू, डिकमदेसर आदि गाँवों में रहते हैं। 
अंगारों का ढेर 'धूणा' कहलाता है, तो नृतक 'नाचणियाँ' कहलाते हैं।
'धूणा' (अंगारों का ढेर) के चारों ओर पानी छिड़क दिया जाता है। 
तीन सबद जसनाथी के गीत हेतु गाये जाते हैं तथा चौथा सबद 'नाचणियों' के लिए होता है, इसके बाद अग्नि नृत्य की शुरुआत होती है । 
सब लोग तेज गति से 'धूणा' की परिक्रमा कर गुरु को नमस्कार करते हैं। 
इस नृत्य में केवल पुरुष ही भाग लेते हैं।
यह नृत्य चैत्र एवं फाल्गुन मास में किया जाता है। 
बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने इस नृत्य को संरक्षण प्रदान किया। 
अंगारों से न जलना ही इस नृत्य की अनुपम विशेषता है।

ब्यावर ( अजमेर ) का मयूर/भैरव नृत्य

मयूर/भैरव नृत्य ब्यावर में बादशाह के मेले के दौरान बीरबल का पात्र निभाने वाला व्यक्ति बादशाह की सवारी के
आगे करता हुआ चलता है।
इस नृत्य के पीछे जनश्रुति है, कि बादशाह की सवारी निकलने से पूर्व ब्यावर के व्यास परिवार का व्यक्ति जो बीरबल (बाना) का रूप धारण करेगा वह भैरव मंदिर में जाकर भैरव की उपासना में नृत्य करता है उसे भैरव नृत्य कहते हैं।
इस नृत्य से प्रसन्न होकर भैरव उसे इतनी शक्ति देता है कि बीरबल बादशाह की सवारी के आगे नृत्य करते हुए दो दिनों तक नहीं थकता है। 
बादशाह की सवारी के आगे बीरबल जो नृत्य करता है, वह मयूर नृत्य कहलाता है। 
बादशाह की सवारी में बादशाह का रूप अकबर के नौ रत्नों में से एक टोडरमल का होता है। 

बाँसवाड़ा का पेजण नृत्य

पेजण नृत्य बागड़ (डूंगरपुरबाँसवाड़ा) क्षेत्र का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो दीपावली के अवसर पर पुरुषों द्वारा नारी का रूप धारण कर किया जाता है।
बाँसवाड़ा का पालीनोच नृत्य-पालीनोच नृत्य बांसवाड़ा जिले में केवल विवाह के अवसर पर किया जाता है।

व्यावसायिक लोक नृत्य

जब व्यक्ति किसी नृत्य का प्रदर्शन कर अपनी जीविका कमाने लगता है तो वह वह व्यावसायिक ( पेशेवर ) तथा उसके द्वारा किया जाने वाले नृत्य व्यवसायिक ( पेशेवर) लोक नृत्य कहलाता है। 
राज्य में तेरहताली, भवाई एवं कच्छी घोड़ी नृत्य व्यावसायिक लोक नृत्यों की श्रेणी में आते हैं।

तेरहताली नृत्य

तेरहताली नृत्य कामड़ जाति की महिलाओं का मुख्य पारंपरिक लोक नृत्य है। 
यह बाबा रामदेव के मेले में सर्वाधिक किया जाता है। 
इस नृत्य का उद्गम पादरला गाँव, बाली तहसील (पाली)से हुआ है। 
राजस्थान का एकमात्र तेरहताली नृत्य ही ऐसा है जो बैठकर किया जाता है। 
इस नृत्य में पुरुष गीत गाते हैं।
स्त्रियाँ तेरह मंजीरे अपने शरीर पर 9 दाएँ पाँव व 2 दोनों हाथों की कुहनियों तथा 1-1 मंजीरा दोनों हाथों में बाँध कर नृत्य करती हैं । 
नृत्य के दौरान स्त्रियाँ हाथ वाले मंजीरों को अन्य मंजीरों से बजाकर नाना प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न करती है। साथ ही विविध प्रकार की भाव-भंगिमाएँ प्रदर्शित करती हैं। 
• अनाज साफ करना। 
• अनाज कूटना। 
• अनाज काटना।
• अनाज पीसना आटा छानना
• गेहूँ के आटे में पानी मिलाना 
• बाजरे का आटा गूंदना
• जमे हुए दूध से घी निकालना
• चरखे पर कातना 
• सूत समेटना
तेरहताली नृत्य में पुरुष मंजीरे, तानपुरे, चौतारा वाद्य यंत्रों के साथ संगत करते हैं ।

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भवाई नृत्य

भवाई नृत्य एवं लोक नाट्य मुख्यत: गुजरात का लोक नाट्य है।
यह राजस्थान राज्य में गुजरात के समीप स्थित मेवाड़ क्षेत्र में किया जाता है।
उदयपुर संभाग में सर्वाधिक प्रचलित भवाई नृत्य पेशेवर (व्यावसायिक) नृत्यों में सर्वाधिक लोकप्रिय है। 
यह अपनी चमत्कारिता (तेज लय में सिर पर सात-आठ मटके रखकर कर नृत्य करना, जमीन पर रखे रूमाल को मुँह से उठाना, गिलासों पर नाचना, थाली के किनारों पर नृत्य करना, काँच के टूकड़ों पर नाचना) के लिए अधिक प्रसिद्ध है।
भवाई नृत्य एक नाटक के रूप में किया जाता है।  
भवाई लोक नाट्य एक व्यावसायिक लोक नाट्य है जिसमें पात्र रंगमंच पर आकर अपना परिचय नहीं देते।
भवाई नृत्य मूलत: मटका नृत्य था, किंतु भवाई जाति के व्यक्तियों द्वारा किया जाने के कारण इसका नाम भवाई नृत्य पड़ा। इस भवाई नत्य के प्रवर्तक केकड़ी (अजमेर) के नागोजी/बाघोजी जाट को माना जाता है तो इस नृत्य को विशिष्ट ख्याती भारतीय लोक कला मंडल (उदयपुर) के संस्थापक देवीलाल सांभर ने दयाराम भील के माध्यम से दिलाई।


कच्छी घोड़ी नृत्य

कच्छी घोड़ी नृत्य शेखावाटी क्षेत्र का प्रसिद्ध व्यावसायिक लोक नृत्य है। 
यह जो सरगड़े, कुंहार, ढोली तथा भांभी, विशेषत: बावरी नामक व्यावसायिक जातियों द्वारा विवाह में किया जाता है। 
यह पुरुष प्रधान एवं वीर नृत्य है जो पैटर्न बनाने की कला बनाने के लिए प्रसिद्ध है। 
इस नृत्य के उद्भव के संबंध में लोक प्रसिद्ध कथा है, कि एक बार कुछ पठान घोड़े लेकर चलते-चलते मराठों के एक गाँव में रुके रात में मराठे उनके घोड़े चुराकर ले गए। 
अपने घोड़ों को वापस पाने के लिए उन्होंने मराठों से युद्ध किया और उन्हें हराकर अपने घोड़े वापस ले गए।
इसलिए यह नृत्य मध्यकालीन युद्ध का माहौल बनाता है और नर्तक वीरता के हाव-भाव प्रदर्शित करता है। 
इस नृत्य में ढोलक, झांझ, डेरू एवं बांकिया नामक लोक वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है। 
कच्छी घोड़ी का शाब्दिक अर्थ 'काठ/लकड़ी की घोड़ी' होता है अर्थात् इस नृत्य में नर्तक बांस की बनी घोड़ियाँ अपने कमर से बाँधकर दूल्हे-सा वेश बनाकर व हाथ में तलवार लेकर घोड़ी नचाते हुए नकली लड़ाई लड़ते हैं। 

जातीय लोक नृत्य 

वे लोक नृत्य जो किसी विशेष जाति समूह के व्यक्ति करते हैं वो जातीय लोक नृत्य कहलाते हैं। जैसे -

भील जाति के लोक नृत्य

युद्ध नृत्य

युद्ध नृत्य के माध्यम से भील अपनी युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। 
इस नृत्य के दौरान दो दल एकदूसरे पर तीर, तलवारों, भालों एवं लाठियों से हमला करते हैं। 
इस दौरान वे ऊँची हुंकारे भरते हैं तथा ऊँची आवाज में 'फाइरे-फाइरे' रणघोष कहकर मांदल बजाते हैं। 
यह नृत्य बेहद भयानक होता है। 
इस नृत्य में बहुत से नर्तक घायल भी हो जाते हैं इसी कारण राज्य सरकार ने इस नृत्य पर प्रतिबंध लगा रखा है।

शिकार नृत्य

शिकार नृत्य के माध्यम से भील शिकार की कला को प्रस्तुत करते हैं। 
इसमें एक नर्तक तीर-कमान लेकर भागता है व दूसरा एक ही स्थान पर खड़ा होकर ढोल की ताल के साथ शिकारी के क्रियाकलापों को प्रदर्शित करता है। 
अन्य नर्तक लाल-पीले वस्त्र ओढ़कर (शिकार) पशु का अभिनय करते हैं और तीर चलते ही आहत पशु की भाँति आवाजें निकालते हैं। 
इस नृत्य में ढोल की आवाज बड़ी भयानक होती है। 
शिकार नृत्य में नृतक अपने धनुर्विद्या के कौशल का प्रदर्शन करता है। 

नेजा नृत्य

नेजा नृत्य भील जाति की स्त्री व पुरुषों द्वारा किया जाने वाला युगल नृत्य है जो एक दर्शनीय खेल नृत्य है।
इस नृत्य के दौरान होली के तीन दिन बाद मैदान में डंडा गाड़ (खंभा रोप) दिया जाता है तथा डंडे के ऊपरी सिरे पर एक नारियल बाँध दिया जाता है। 
पुरुष खंभे पर चढ़कर नारियल लेने का प्रयास करते हैं और स्त्रियाँ छड़ियाँ और कोड़ा (बैंतों) से पुरुषों को मार कर रोकने का प्रयास करती हैं। 
इस नृत्य के अवसर पर ढोल पर पगल्या लेना नामक धाप दी जाती है।

गौरी नृत्य

गौरी नृत्य उदयपुर के आस-पास के भीलों द्वारा किया जाता है। 
इस नृत्य से कई कथाएँ जुड़ी हुई है। 
यह नृत्य नाटक के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है। 
यह भाद्रपद पूर्णिमा के एक दिन पहले किया जाता है। 
इस नृत्य नाटक में माता पार्वती के पीहर गमन आदि की घटनाएँ जुड़ी हुई है। 

घूमरा/झूमर नृत्य 

घूमरा नृत्य गुजरात के 'गरबा नृत्य' से काफी मिलता-जुलता है।  
इसे राजस्थान के बाँसवाड़ा जिले की कुशलगढ़, घाटोल व आनंदपुरी, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, उदयपुर व कोटड़ा क्षेत्र की भील जाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है।
इस नृत्य में भील महिलाएँ अर्द्धवृत्ताकार घेरा बनाकर घूम-घूम कर नृत्य करती है इसी कारण इस नृत्य का नाम घूमरा नृत्य पड़ा। 
घूमरा नृत्य करते समय महिलाएँ दो दल बनाती हैं जिनमें से एक दल गाता है तथा दूसरा दल उसकी पुनरावृत्ति करके हाथ में कपड़ा लेकर नाचता है।

गवरी/राई नृत्य

गवरी एक प्रकार की नृत्य नाटिका है। 
इसे भील जनजाति द्वारा भाद्रपद (राखी/श्रावण पूर्णिमा के बाद) में शुरू करके 40 दिन बाद आश्विन शुक्ल की  नवमी तक इसे समाप्त किया जाता है। 
राजस्थान राज्य की सबसे प्राचीन लोक नाटक कला गवरी राई नृत्य है इसी कारण इसे 'लोक नाट्यों का मेरूनाट्य' भी कहते हैं।
गवरी लोक नाट्य पूरे भारत में एकमात्र ऐसा लोकनाट्य है जो दिन में प्रदर्शित होता है। 
गवरी नृत्य भीलों का धार्मिक नृत्य है इसी कारण गवरी नाट्य कला सांस्कृतिक, परंपरागत व अभिनय तीनों में समृद्ध कला है जो भीलों के जन्म-मरण और पुनर्जन्म आस्था का प्रतीक है।
इस नृत्य का मुख्य पात्र भगवान शिव को माना जाता है तथा शिव की पत्नी गौरी (पार्वती) के नाम के कारण ही इस नृत्य नाटक का नाम 'गवरी नृत्य' पड़ा।
पार्वती को ही इस नृत्य नाटक में राई नाम से पुकारा जाता है इसी कारण इस नृत्य को राई नृत्य भी कहा जाता है।
शिव का रूप धारण करने वाले नर्तक को 'पुरिया' कहा जाता है, तो अन्य पात्र 'खेल्ये' कहलाते हैं।

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लाठी नृत्य

लाठी नृत्य भीलों का पुरुष प्रधान नृत्य है। 
इस नृत्य में भील पुरुष हाथों में लाठी लेकर विभिन्न प्रकार की कलाओं को प्रदर्शित करते हुए नृत्य करते हैं।
द्विचक्री नृत्य द्विचक्री नृत्य पुरुष व महिलाओं द्वारा दो चक्र बनाकर किया जात है इसी कारण इसे 'द्विचक्री नृत्य' कहते हैं। 
बाहरी चक्र में पुरुष दाहिनी ओर अंदर के चक्र में महिलाएँ दाएँ से बाएँ ओर नृत्य करत हुई चलती हैं। 
यह नृत्य भील जनजातियों में विवाह के अवसर प किया जाता है।
   

सुकर का मुखौटा नृत्य

भील जनजाति द्वारा किया जाने वाला 'सुकर का मुखौटा नृत्य' नृत्य में तीर धनुष से लैस एक शिकारी नृत्य स्थल पर आता है और वह शिकारी वहाँ पर बैठे सूकर मुखौटा धारी आदिवासी युवक को मार गिराने का अभिनय करता है। 
अपनी जान बचाने के लिए सूकर इधरउधर भागते हैं।
यह एक नृत्य नाटक है जो सिर्फ राजस्थान में किया जाता है और वर्तमान में यह लोक नृत्य गुम होने की कगार
पर है।

रमणी नृत्य

भील जनजाति में 'रमणी नृत्य' विवाह मंडप के सामने विवाह के अवसर पर किया जाता है। 
इस नृत्य में स्त्रियाँ एक पंक्ति में खड़ी होकर गीत गाते हुए पाँवों को आगे-पीछे बढ़ाती हैं तथा पुरुष साफे की चटकीले पट (पट्टी) से सजाकर बांसुरी एवं मांदल वाद्य यंत्रों का वादन करते हैं। 

हाथीमना नृत्य

भीलों द्वारा विवाह के अवसर पर किया जाने वाला नृत्य हाथीमना है। 
इस नृत्य में भील हाथों में तलवार लेकर गोल घेरे में बैठकर नृत्य करते हैं। | 
यह बैठकर किया जाने वाला नृत्य है ।

बेरीहाल नृत्य

उदयपुर के खैरवाड़ा के पास भाण्दा गाँव में रंग पंचमी को विशाल आदिवासी मेले का मुख्य आकर्षण बेरीहाल नृत्य है। बेरीहाल एक ढोल है जिसे मध्य में रखकर उसके चारों ओर नृत्य किया जाता है।

गरासिया जनजाति के नृत्य 

वालर नृत्य

वालर नृत्य सिरोही क्षेत्र के गरासिया जनजाति का प्रसिद्ध नृत्य है जिसे गरासियों के घूमर' के नाम से भी जाना जाता है। 
यह एक धीमी गति का नृत्य है, जिसमें स्त्री व पुरुष दो अर्द्धवृत्तों की संरचना में खड़े होते हैं। 
बाहरी अर्द्धवृत्त में पुरुष तथा अंदर वाले अर्द्धवृत्त में स्त्रियाँ रहती है। 
नृत्य प्रारंभ करने के लिए एक पुरुष छाता या तलवार लेकर उनके बीच में प्रवेश करता है। 
इस नृत्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अंग संचालन तथा ताल के साथ तारतम्य बनाना होता है। 
यह नृत्य विवाह के अलावा होली व गणगौर पर भी किया जाता है।


माँदल नृत्य

माँदल नृत्य गरासिया महिलाओं के द्वारा किया जाता है जिस पर गुजराती गरबे का प्रभाव दिखाई देता है। 
इस नृत्य में महिलाएँ वृत्ताकार घूमती हुईं माँदल वाद्य यंत्र का प्रयोग करती हैं।  
अत: यह माँदल नृत्य के नाम से जाना जाता है।

कूद नृत्य

गरासिया स्त्रियों व पुरुषों द्वारा सम्मिलित रूप से बिना वाद्य यंत्र के पंक्तिबद्ध होकर किया जाने वाला नृत्य है। 
यह नृत्य मस्ती भरा, उछल कूद करते हुए किया जाता है, इसीलिए इस नृत्य का नाम कूद नृत्य पड़ा।
लय व ताल के लिए ये तालियों का इस्तेमाल करते हैं।

जवारा नृत्य

यह नृत्य होली दहन के पूर्व उसके चारों और घेरा बनाकर ढोल के गहरे घोष के साथ गरासिया स्त्री-पुरुषों (युगल जोड़ी) द्वारा किया जाने वाला समूहिक जवारा नृत्य जिसमें स्त्रियाँ हाथ में ज्वारों की बालियाँ लिए नृत्य करती है।

सहरिया जाति के नृत्य

शिकारी नृत्य

शिकारी नृत्य सहरिया जनजाति का पुरुष प्रधान नृत्य है, जो बाँरा जिले की किशनगंज तथा शाहबाद तहसील में मुख्य रूप से प्रचलित है।
इस नृत्य में पुरुष शिकार करने का नाटक करते हैं तथा शिकार हो जाने पर शिकार के चारों ओर नृत्य करते हैं। 
अत: यह नृत्य नाटिका है।

इंद्रपरी नृत्य

इंद्रपरी नृत्य सहरिया जनजाति का नृत्य है जिसमें रागिनी गीत गाया जाता है। 
इस नृत्य का आयोजन विवाह के अवसर पर किया जाता है।

बिछवा नृत्य

बिछवा नृत्य सहरिया जनजाति की केवल स्त्रियों का नृत्य है, जो महिलाओं द्वारा समूह में किया जाता है।

झेला नृत्य

झेला नृत्य शाहबाद (बाराँ) की सहरिया जनजाति के स्त्री व पुरुषों (युगल जोड़ी) द्वारा सम्मिलित रूप से खेतों पर फसल की पकाई के समय किया जाता है।

सांग नृत्य

सहरिया जनजाति का सांग नृत्य एक युगल नृत्य है जिसमें स्त्रीपुरुष दोनों सम्मिलित रूप से नृत्य करते हैं।

कथौड़ी जनजाति के नृत्य 

मावलिया नृत्य

मावलिया नृत्य प्रतिवर्ष नवरात्रि में नौ दिनों तक देवी-देवताओं के गीत गाते हुए पुरुषों द्वारा गोल-गोल घूमते हुए समूह में किया जाता है।
इस नृत्य के ढोलकी व बांसुरी प्रमुख वाद्य यंत्र है। 

होली नृत्य

यह नृत्य होली पर महिलाओं द्वारा समूह बनाकर एक-दूसरे के हाथ पकड़कर गीत गाते हुए गोले में किया जाने वाला नृत्य है। 
इसमें महिलाएँ नृत्य के दौरान एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर पिरामिड़ भी बनाती है।

मेव जाति के नृत्य 

रणबाजा नृत्य

रणबाजा नृत्य मेवात (अलवर) क्षेत्र की मेव जाति में प्रचलित एक विशेष प्रकार का युगल नृत्य है, जिसमें स्त्री व पुरुष दोनों सम्मिलित रूप से नृत्य करते हैं।

रतबई नृत्य

रतबई नृत्य अलवर क्षेत्र की मेव महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नत्य है। 
जिसमें महिलाएँ कभी पंक्तिबद्ध होकर व कभी गोल घूमकर सिर पर इंडोणी व सिरकी (खारी) रखकर हाथों में पहनी हुई हरी चूड़ियों को खनखनाती हुईं नृत्य करती हैं व पुरुष अलगोजा व दमामी (टामक) वाद्य यंत्र बजाते हैं।

कंजर जाति के नृत्य 

कंजर जाति की उत्पत्ति राजपूत और लूहारिन की संतान के रूप में माना जाता है। 

चकरी नृत्य

चकरी नृत्य हाडौती अंचल की कंजर जाति का प्रसिद्ध लोक नृत्य है। 
इसमें विवाहित औरतें भाग न लेकर केवल कंजर जाति की अविवाहित लड़कियाँ ही भाग लेती हैं। 
चकरी नृत्य की नृत्यांगनाएँ अस्सी कळी (कपड़े के एक लंबवत टुकड़े को कळी कहते हैं जो ऊपर की ओर छोटा तथा नीचे बढ़ते हुए चौड़ा होता जाता है।  
ऐसे कई टुकड़ों को जोड़कर लहँगा और घाघरा बनाया जाता है
इस नृत्य में कंजर बालाएँ गीत गाते हुए तेज रफ्तार से चक्राकार घूमती हैं, इसी कारण इस नृत्य का नाम चकरी नृत्य पड़ा।

फूंदी नृत्य

यह नृत्य हाडौती प्रदेश में 'कजली तीज' त्योहार के अवसर पर कंजर व बेड़िया जाति की केवल महिलाओं के द्वारा किया जाता है। 
यह चकरी नृत्य से मिलता-जुलता नृत्य है। 
शांति, फुलवा आदि इस नृत्य की प्रमुख नृत्यांगनाएँ है।

धाकड़ नृत्य

कंजर जाति का यह नृत्य झालापाव व बीरा के मध्य हुये युद्ध में झालापाव की विजय की खुशी में किया जाता है। 
हथियार लेकर किये जाने वाले शौर्य से परिपूर्ण इस नृत्य में युद्ध की समस्त कलाएँ प्रदर्शित की जाती हैं।

Rajasthan Ke Lok Nartay PDF

Name of The Book : *Rajasthan Ke Lok Nartay PDF in Hindi*
Document Format: PDF
Total Pages: 10 
PDF Quality: Normal
PDF Size: 1 MB
Book Credit: Harsh Singh
Price : Free


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