Bharat Ke Durg Or Kile In Hindi

भारत के दुर्ग व किले - Bharat Ke Durg Or Kile PDF

Bharat Ke Durg Or Kile
Bharat Ke Durg Or Kile

तुगलकाबाद का किला

गयासुद्दीन तुगलक ने किलेबंदी वाले तुगलकाबाद नगर का निर्माण करवाया था। 
यह दिल्ली का तीसरा नगर था। 
प्रकृति की गोद में निर्जन पहाड़ियों पर खड़ी भूरे अनगढ़ पत्थरों की टूटी दीवारों वाले तुगलकाबाद को वास्तुशिल्प की दृष्टि से एक दुर्ग के रूप में स्थापित किया गया था। 
यह किला दो भागों में विभाजित है - 
दक्षिणी दीवारों के साथसाथ नगर दुर्ग और महल इसका एक भाग है और इसके उत्तर में बसा नगर दूसरा भाग है।
यह 6 कि.मी. की किलेबन्दी एक अनियमित आयत है। 
दक्षिण में, तुगलकाबाद के मुख्य प्रवेश द्वार के पार गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा है। 
इसका अग्रभाग लाल बलुआ पत्थरों से बना है जिसे संगमरमर द्वारा उभारा गया है। 
यह ऊँची दीवारों से घिरा है जो एक अनियमित पंचभुज बनाती हैं। 
तीन ओर इसके चापाकार दरवाजों के भीतरी भाग में 'भालाकार हाशिये' होने और इसकी रंग योजना के बावजूद भी इसमें खिलजी काल की वास्तुकला की कुछ विशेषताएं देखने को मिलती हैं।
नगर दुर्ग अभी भी अखंड खडा है और महल की दीवारों की पहचान अभी भी की जा सकती है।

गांदीकोटा का किला

गांदीकोटा एक छोटा गाँव है जो पेन्नार नदी के किनारे बसा हुआ है। 
यह गाँव भारत के आंध्रप्रदेश राज्य में, कडप्पा जिले में स्थित है। 
यह छोटा-सा गांव गांदीकोटा के किले के लिए प्रसिद्ध है। 
इस किले का निर्माण कापा राजा ने 1123 ए.डी. में करवाया था, जो पश्चिमी चालुक्य राजा अहावामल्ला सोमेश्वर -1 के अधीन कार्य करता था।
इस छोटे से गाँव ने काकतिया, विजयनगर और कुतुबशाही अवधि के दौरान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
इस किले को पेम्मासानी थिम्मा नायडू द्वारा और भी मजबूत बनवाया गया। 
यह किला लगभग 300 वर्षों तक पेम्मासानी नायकों के नियंत्रण में रहा। 
किले का नाम एक घाटी के नाम के कारण पड़ा जिसे तेलगू में गांदी कहा जाता है। 
यह ईरामाला पहाड़ियों की श्रृखंला के बीच गठित है तथा इसके नीचे पेन्नार नदी बहती है। 
इस किले में एक मस्जिद, एक बड़ा अन्न भंडार एवं मंदिर हैं। 
जामिया मस्जिद में दो आसन्न मीनारें हैं। 
गुबंददार छत के साथ अन्न भंडार अब यात्री बंगले के रूप में हैं किले के अंदर दो मंदिर है जो भगवान माधव और रघनाथ को समर्पित हैं।

झाँसी का किला

झाँसी का किला उत्तर प्रदेश राज्य के झाँसी शहर में स्थित है। 
इसका निर्माण ओरछा के राजा बीर सिंह देऊ ने 1613 में करवाया था। 
यह किला बलवन्तनगर कस्बे में ‘बांगड़ा' नामक चट्टानी पहाड़ी पर स्थित है। 
बलवन्तनगर को ही वर्तमान में झाँसी के नाम से जाना जाता है। 
लखनऊ से 292 किमी तथा दिल्ली से लगभग 415 कि.मी. की दूरी पर स्थित झाँसी, बुन्देलखंड के लिये प्रवेश द्वार है। 
यह शहर रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के कारण अधिक लोकप्रिय है। 
रानी लक्ष्मीबाई एक वीरांगना थीं जिन्होंने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ बहुत बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी।
रानी लक्ष्मीबाई को 'झांसी की रानी' के नाम से जाना जाता है। 
वह पूर्व स्वतन्त्र भारत की महान राष्ट्रवादी नायिका थीं। 
अंग्रेजों द्वारा झाँसी के किले पर अधिकार करने के प्रयासों के विरोध में रानी ने वीरतापूर्वक उनका सामना किया तथा अपने बेटे को अपने वस्त्रों से कस कर बाँध कर, दोनों हाथों से तलवार का उपयोग कर और घोड़े की लगाम को मुँह में थाम कर उन्होंने अंग्रेजों की सेना से युद्ध किया। 
चट्टानी पहाड़ी पर खड़े हुए किले को देखकर यह पता चलता है कि किस तरह उत्तर भारत की किला निर्माण की शैली दक्षिण भारत की शैली से भिन्न थी। 
किले में प्रवेश के 10 द्वार हैं।
इनमें से कुछ खंडेराव द्वार, दतिया दरवाजा, उन्नाव द्वार, झरना दरवाजा, लक्ष्मी दरवाजा, सागर दरवाजा, ओरछा द्वार, सेन्यर द्वार तथा चंद दरवाजा है।
किले के उल्लेखनीय स्थानों में से शिव मंदिर तथा गणेश मंदिर हैं जो प्रवेश द्वार पर स्थित हैं। 
इसके अतिरिक्त
'कड़क बिजली तोप' है जो 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ प्रयोग की गई थी।

कित्तूर का किला

कित्तूर कर्नाटक के बेलगाम जिले में स्थित प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक जगह है। 
यह छोटा-सा शहर कित्तूर चेन्नम्मा फोर्ट के लिए जाना जाता है। 
यह किला कर्नाटक की प्रसिद्ध एवं महान रानी चेन्नम्मा के नेतृत्व में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की गवाही के रूप में खड़ा है जो अंग्रेजों के आबंटित हस्तक्षेप और कर संग्रह के खिलाफ लड़ी थीं। 
आज यह किला एक महान रानी की बहादुरी एवं महिलाओं के गौरव के प्रतीक के रूप में खड़ा है। 
वर्तमान में कितूर नथपंथी मठ स्थल के साथ खंडहरों में निहित है। 
मारुत, चालुक्य और क्षेत्रों आदि बसवान्ता कलमेश्वरा स्मारक को पुनःनिर्मित किया जा रहा है। 
यहाँ एक पुरातात्विक संग्रहालय भी है जो राज्य के पुरातत्त्व और संग्रहालय विभाग द्वारा प्रबंधित एवं संचालित किया जाता है। 
कितूर एक पुरातात्विक स्थल के रूप में महत्वपूर्ण हैं।

रणथम्भोर का किला

रणथम्भोर दुर्ग दिल्ली-मुम्बई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेलवे स्टेशन से 13 कि.मी. दूर रन और थंभ नाम की पहाड़ियों के बीच समुद्रतल से 481 मीटर ऊँचाई पर तथा 12 कि.मी. की परिधि में बना है। 
किले के तीनों ओर पहाड़ों में कुदरती खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है। 
यह उत्तरी भारत के सबसे मजबूत किलों में से एक था। 
किले के अन्दर कई सारी इमारतें थीं जिनमें से केवल कुछ ही युद्ध और समय के प्रकोपों से बच पाई हैं। 
शेष बचे खंडहरों में, दो मंडप, बादल महल और हमीर अदालत तथा शाही महल के कुछ हिस्से हैं जो पुरानी भव्यता का विचार प्रदान करते हैं। 
किले के अन्दर गणेश जी का एक पुराना मंदिर भी है जो तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। 
यह किला 944 ई. में बनाया गया। 
सोलहवीं शताब्दी में यह ऐतिहासिक इमारत मुगलों के अधिकार में आ गई। 
17वीं शताब्दी में मुगलों ने यह किला जयपुर के राजा को उपहार में दे दिया। 
पृथ्वीराज चौहान के पौत्र गोविन्दा ने दिल्ली के सुलतान की जागीरदारी के रूप में रणथम्भोर में खुद को स्थापित किया। 
दिल्ली और रणथम्भोर के संबंधों में बदलाव तब आया जब इल्तुतमिश ने छल से रणथम्भोर के शासक वीरनारायन की हत्या कर दी और रणथम्भोर पर कब्जा कर लिया।
परन्तु वीरनारायन के चाचा ने मालवा भागकर, रणथम्भोर की सीमा से सटे एक छोटे राज्य की स्थापना की। 
अंततः उन्होंने रणथम्भोर पर हमला करके विजय प्राप्त की।

गोलकोण्डा

गोलकोण्डा हैदराबाद शहर के पश्चिम में लगभग 11 कि.मी. दूरी पर स्थित एक प्रसिद्ध किला है।  
इसे हैदराबाद पर्यटन का प्रमुख आकर्षण माना जाता है। 
यह किला मूलतः वारंगल के काकतीय राजवंश दवारा बनवाया गया था। 
1363 ई. में यह किला बहमनी राजाओं के हाथों में चला गया और 1518 ई. में उनके पतन के बाद यह कुतुब शाही राजाओं (1518-1687ई.) की राजधानी बन गया। 
कुतुब शाही राजाओं ने किले को बढ़ाया और विशाल दुर्ग दीवारों के साथ इसे और मजबूत बनवाया। 
इसके बाद 1687 ई. में मुगल बादशाह औरंगजेब ने, कुतुबशाही वंश के अंतिम शासक अबुल हसन तानाशाह से छीनकर किला अपने कब्जे में कर लिया और आसफ जाह को डेक्कन प्रांत के सूबेदार के रूप में नियुक्त किया।
1713 ई. में आसफ जाह ने निज़ाम-उल-मुल्क के रूप में स्वतंत्रता की घोषणा की और 1948 ई. तक हैदराबाद में शासन किया। 
गोलकंडा या गोलकोण्डा का किला डेक्कन पठार का सबसे प्रसिद्ध और बड़ा किला है। 
यह किला 400 फीट ऊँची पहाड़ी पर बनाया गया था। 
इस किले की एक विशेषता यह है कि इसके प्रवेश द्वार पर खड़े होकर यदि ताली बजाई जाए, तो उसकी आवाज को किले के सबसे ऊपरी भाग में यानि 61 मीटर की ऊँचाई पर भी सुना जा सकता है।
गोलकोण्डा की एक और उल्लेखनीय विशेषता यहाँ कि जल आपूर्ति प्रणाली है। 
किले की महत्वपूरण संरचनाओं में नगीना बाग, गार्ड लाईन, तीन मंजिला शस्त्रागार इमारत, दरबार हॉल, तारामती मस्जिद आदि शामिल हैं। 

सिद्धावत्तम का किला

सिद्धावत्तम का किला आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में स्थित है। 
यह 1303ई. में बनवाया गया। 
यह किला पेन्नार नदी के तट पर लगभग 30 एकड़ के क्षेत्र में फैला हआ है। 
किले के शीर्ष की सजावट गजलक्ष्मी की नक्काशियों से की गई है। 
इसके अतिरिक्त 17 वर्गाकार गढ़ जो कभी इस क्षेत्र की रक्षा के लिए उपयोग किए जाते थे, अभी भी किले में दिखाई देते हैं। 
इस किले में एक सहायक मार्ग है, जो मुख्य द्वार के बंद होने के बाद भी आंगतुकों को किले में जाने देता है। 
यह दक्षिण काशी के प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है। 
किले के अंदर स्वामी मंदिर, सिद्धेश्वर मंदिर, दुर्गा मंदिर तथा बाला ब्रहमा मंदिर हैं। 
इस किले का अधिक विकास, राजा कृष्णदेवराय के दामाद वर्धाराजू के शासनकाल में हुआ। 
मटली राजुलु के शासनकाल में यह किला सिर्फ मिट्टी का किला था। 
उसके बाद में यह वर्धा राजू के अधीन आ गया। 
इसके पहले यह उदयगिरी साम्राज्य का हिस्सा था। 
मट्टी अनन्त राजू ने इसे चट्टानी किले के रूप में पुनर्निर्मित किया। 
बाद में औरंगजेब के कमान्डर मीर जुमला ने इस पर कब्जा कर लिया। 1
714 ई. में कडप्पा के शासक अब्दुल नबी खान ने इस पर विजय प्राप्त की।
यह क्षेत्र कुछ समय के लिए मयाना शासकों द्वारा भी शासित किया गया। 
अंतत: 1799 ई. में सिद्धावतम ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में चला गया।

बिदर का किला

बिदर का किला, कर्नाटक राज्य के बिदर जिले के 'बगीचों के शहर' बेंगलोर में स्थित है। 
यह 15वीं सदी का किला है। 
बिदर का किला तत्कालीन कर्नाटक शासकों के सुंदरतम कृतियों में से है। 
कर्नाटक के बिदर का भव्य किला लाल पत्थरों से बना है। 
बिदर के किले के अन्दर स्थित रंगीन महल अपनी सौंदर्य शैली और अनुपम नक्काशियों के लिए प्रसिद्ध है। 
इसका उपयोग पूजा स्थल के रूप में भी होता था। 
यह महल किले के मुख्य आकर्षणों में से एक है और आकर्षक लकड़ी के साजो-सामान की प्रचुरता के लिए प्रसिद्ध है। 
इस किले में सात द्वार हैं। 
मुख्य द्वार फारसी वास्तु शैली को प्रदर्शित करता है। 
गुम्बद दरवाजा फारसी शैली में निर्मित है जो मेहराब की आकृति प्रदर्शित करता है। 
बिदर के किले का शेर दरवाजा, जो कि द्वितीय प्रवेश द्वार है, दो चीतों की छवि को प्रदर्शित करता है जो इसके मुखाकृति पर नक्काशी के द्वारा बनाया गया है। 
अन्य द्वारों में से दक्षिण में फतह द्वार (अष्टभुजीय मीनार और पुल), पूर्व में
टालघाट द्वार, दिल्ली द्वार तथा मडु द्वार है प्रवेश द्वार के मुख्य गढ० को मुंड बुर्ज के नाम से जाना जाता है जहाँ पर बन्दूकें स्थित हैं।

असीरगढ़ का किला

असीरगढ़ का किला मध्यप्रदेश राज्य में, बुरहानपुर शहर के 20 किमी उत्तर में स्थित है। 
इतिहास में इस किले को अभेद्य माना जाता था और इस किले पर विजय का मतलब डेक्कन पर नियंत्रण होना था। 
इसलिए असीरगढ़ को डेक्कन की कुंजी भी माना जाता था। 
यह किला अहीर राजा असा अहीर द्वारा बनवाया गया था। 
इस किले का असली नाम असा अहीर गढ़ था किंतु इसके नाम को सरल बनाने के लिए मध्य के अक्षरों को हटाकर इसका नाम असीरगढ़ रख दिया गया। 
असीरगढ़ किला पहले फारूकी वंश के शासकों के कब्जे में था और फिर बाद में मुगलों के कब्जे में आया। 
किले के तीन भाग हैं- असीरगढ़, कमरगढ़ एवं मलयगढ़। 
किले के महत्वपूर्ण स्मारकों में जामा मस्जिद और हिंदू मंदिर शामिल है। 
1536 ई. में जब मुगल सम्राट मायू गुजरात को जीतने के बाद बड़ौदाभरुच-सूरत के रास्ते बुरहानपुर पहुंचे, उस समय वहां राजा अली खान का राज्य था। 
राजा अली खान को आदिल शाह के नाम से भी जाना जाता था। 
आदिल खान के ही शासन में बुरहानपुर में बहुत-सी महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण हुआ जैसे जामा मस्जिद, ईदगाह, जैनाबाद मस्जिद और असीरगढ़ किले का ऊपरी भाग। 
हिंदुओं के द्वारा बनवाए गए इस किले पर मुगल, होलकर और अंग्रेजों ने राज्य किया। 
इस किले की वास्तुकला, मुगल स्थापत्य कला इस्लामी, फारसी और भारतीय वास्तुकला का मिश्रण है।
यहाँ कुछ मकबरे और मीनारें हैं जो मध्ययुगीन भारतीय वास्तुकला को दर्शाते हैं। 

चित्तौड़गढ़ का किला

चित्तौड़गढ़ किला राजस्थान में स्थित है। 
चित्तौड़ के अदम्य गौरव का प्रतीक चित्तौड़गढ़ का यह किला 7वीं शताब्दी में मौर्य शासकों द्वारा निर्मित प्रवेश-द्वार के साथ एक विशाल संरचना है। 
यह किला 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर 700 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हआ है। 
यह किला कई राजवंशों के शासन का गवाह रहा है जैसे मौर्य (सातवीं-आठवी ई.), परमार (दसवीं-ग्यारहवी ई.) गहलोत (बारहवी ई.) और सिसोदिया राजवंश। 
यह उत्कृष्ट किला राजपूत संस्कृति और मूल्यों का चित्रण करता है। 
चितौड़गढ़ किले में ऐसे कई स्मारक है जो राजपूत वास्तुकला का उदाहरण है। 
किले में सात द्वार हैं -पडल पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल , जोरला पोल, लक्ष्मण पोल और अंत में राम पोल। 
इस किले के अंदर कई महल हैं जैसे कुंभा महल। 
इस महल का नाम महाराणा कुंभा के नाम पर रखा गया। 
किले के अंदर पद्मिनी महल है जिसे राणा रतन सिंह ने अपनी रानी पद्मिनी के नाम पर रखा था। 
इसके अलावा किले में रतन सिंह महल और फतेह प्रकाश महल भी हैं। 
किले के अंदर कालिका माता मंदिर एवं कंभस्वामी मंदिर भी हैं। 
कालिका माता मंदिर का निर्माण आठवीं सदी में राजा मनभंगा ने करवाया था। 
कंभस्वामी मंदिर का निर्माण भी आठवीं सदी में हुआ था। 
किले के अंदर दो शानदार स्तंभ हैं- कीर्तिस्तंभ और जैन कीर्ति स्तंभ कीर्तिस्तंभ को विजयस्तंभ भी कहा जाता है।
इसे महाराणा कुंभा ने 1448 ई. में बनवाया था।  
यह स्तंभ भगवान विष्णु को समर्पित है।
जैन कीर्ति स्तंभ की ऊँचाई 24.50 मीटर है और यह स्तंभ पहले जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है।

बेल्लारी का किला

बेल्लारी किला कर्नाटक राज्य के बेल्लारी जिले में स्थित है। 
यह किला बल्लरी गुड्डा नाम की पहाड़ी पर स्थित है। 
इसका निर्माण दो भागों में हुआ था। 
ऊपरी किला विजयनगर साम्राज्य के सामन्ती, हनुमप्पा नायक द्वारा बनवाया गया लेकिन निचले किले का निर्माण हैदर अली ने 18वीं सदी में करवाया था। 
निचले किले का वास्तुकार एवं बनाने वाला एक फ्रांसीसी इंजीनियर था। 
उसने ऊपरी किले का पुन: निर्माण भी किया था। 
किले में ऐसे कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्मारक हैं जो उसके समृद्ध इतिहास का प्रचार करते हैं। 
कई प्राचीन टैकों के साथ ऊपरी किले में एक गढ़ था जबकि निचले किले में शस्त्रागार था। 
ऐसा कहा जाता है कि जब किला बनने के बाद हैदर अली को यह पता चला कि बनाए गए किले, विपरीत पहाड़ी 'कुंबारा गुड्डा' से कम ऊंचाई पर थे तो वह बेहद नाराज़ हुआ। 
यह युद्ध रणनीति के नजरिये से नुकसानदायक था। 
नतीजन हैदर अली ने फ्रांसीसी इंजीनियर को फाँसी का आदेश दे दिया। 
ऐसा कहा जाता है कि उस इंजीनियर की कब्र पूर्वी गेट पर स्थित है। 
स्थानीय मुसलमानों का मानना है कि संभवतः यह कब्र किसी मुस्लिम संत की है और इसलिए उसे संरक्षित किया गया है।

फतेहपुर सीकरी

विश्वविख्यात बुलंद दरवाजे और शेख सलीम चिश्ती की दरगाह के लिए मशहूर फतेहपुरी सीकरी आगरा शहर से लगभग 37 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। 
कहा जाता है कि यहां आकर सम्राट अकबर ने संत शेख सलीम चिस्ती के सम्मुख, पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी थी। 
शहजादे सलीम (जहांगीर) के जन्म (1569 ई.) के अवसर पर फतेहपुर सीकरी की नींव रखी थी। 
1571 ई. में संत से भेंट के अवसर पर सम्राट ने अपने सामंतों को उनके निजी उपयोग के लिए भवन बनाने का आदेश दिया। 
एक ही वर्ष में फतेहपुर सीकरी का सुंदर आयोजित नगर तैयार हो गया। 
इस दरगाह की दीवारों पर भव्य पच्चीकारी तथा जालियां विशेष रूप से दर्शनीय हैं। 
कई अन्य दर्शनीय स्मारकों में दीवाने खास, बुलंद दरवाजा, नौबत खाना, दीवाने आम, जामा मस्जिद, जोधाबाई महल आदि शामिल हैं। 
विश्व प्रसिद्ध बुलंद दरवाजे का निर्माण, अकबर ने गुजरात विजय के पश्चात् 1575 ई. में करवाया था। 
यह दरवाजा अपने उत्कृष्ट शिल्प एवं ऊंचाई के लिए प्रसिद्ध है। 
दीवाने खास में अकबर अपने प्रमुख सलाहकार और मंत्रियों से परामर्श करता था और दीवाने आम में अकबर आम नागरिकों से मिलता तथा उनकी शिकायतों को सुनता था। 
नौबतखाने में हिंदू तथा मुस्लिम स्थापत्य कला का सुंदर सम्मिश्रण देखा जा सकता है। 
इसके अलावा यहाँ जोधाबाई महल है जिसका निर्माण अकबर ने 1570 से 1574 ई. के बीच अपनी रानी जोधाबाई के लिए करवाया था।

टीपू सुल्तान का किला (पालघाट)

पलक्कड़ जिसे पुराने समय में पालघाट के नाम से जाना जाता था, केरल राज्य में स्थित एक बड़ा शहर है। 
यह अपने पालघाट के किले के लिए प्रसिद्ध है। 
यह किला पलक्कड़ के किले और टीपूके किले के नाम से भी जाना जाता है। 
यह किला 18वीं शताब्दी में मैसूर के सुलतान हैदर अली द्वारा बनवाया गया था। 
आज यह भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के तहत संरक्षित स्मारक है। 
इस किले के अन्दर कई स्मारक है जो सैलानियों को भारी संख्या में आकर्षित करते हैं जैसे किले के अंदर निर्मित भगवान हनुमान का मंदिर। 
पलक्कड़ की उप जेल भी किले के भीतर स्थित है। 
इस किले और पलक्कड़ टाउन हॉल के बीच एक मैदान है जिसे कोटा मैदानक भी कहा जाता है। 
एक समय इस जगह ने हैदर अली के पुत्र टीपू सुल्तान की सेना के हाथी और घोड़ों के लिए अस्तबल का काम किया था। 
पालघाट अथवा पलक्कड़ का यह किला आज भी अपने गौरवपूर्ण इतिहास को दर्शाता है।

गूटी का किला

गूटी करनूल-बंगलौर राजमार्ग पर अनंतपुर शहर से 52 कि.मी. की दूरी पर है। 
यह कस्बा भारत के राज्य आंध्र-प्रदेश में स्थित है। 
पुराने दिनों में गूटी गौतमपुरी के नाम से जाना जाता था। 
गूटी का क्षेत्र पहले सम्राट अशोक के शासन के अधीन था। 
बाद की सदियों में यह कृष्णदेवराय के विजयनगर साम्राज्य के शासन के अधीन रहा था। 
गंडीकोटा के पेम्मासानी नायकों ने विजयनगर राजाओं के रूप में गूटी का नियंत्रण किया। 
बाद में यह मैसूर राज्य के हैदरअली और टीपू सुल्तान के नियंत्रण में आ गया। 
गूटी किला, गूटी के मैदानी इलाकों के ऊपर लगभग 300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। 
यह आंध्र-प्रदेश में सबसे पुराने पहाड़ी किलों में से एक है। 
यह किला विजयनगर साम्राज्य के सम्राटों द्वारा बनवाया गया था। 
मुरारी राव की अगुवाई में मराठों ने इस पर विजय प्राप्त की। 
इसके बाद 1773 ई. में हैदर अली द्वारा इस पर विजय प्राप्त की गई। 
अंतत: 1799 ई. में टीपू सुल्तान की हार के बाद यह अंग्रेजों के हाथों में चला गया। 
यह किला एक खोल के आकार में बनवाया गया है। 
इसमें 15 मुख्य द्वारों के साथ 15 किले हैं। 
यहाँ पर एक छोटा मंडप है जो चूना-पत्थर से बना है, इसे मुरारी राव की गद्दी के नाम से जाना जाता है। 
यह मंडप एक चट्टान के किनारे पर है जहाँ से आस-पास का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है। 
इस किले की अनूठी विशेषता यह है कि इतनी ऊँचाई पर भी जल संसाधन की उपलब्धता है।
इस किले में कई मंदिर हैं जैसे नागेश्वरस्वामी मंदिर, लक्ष्मीनरसिंहस्वामी मंदिर तथा रामास्वामी मंदिर।

भरतपुर का किला

लोहारगढ़ का किला राजस्थान के भरतपुर शहर में स्थित है। 
भरतपुर के जाट शासकों द्वारा इसका निर्माण किया गया था। 
महाराजा सूरजमल ने अपनी शक्ति और धन का प्रयोग अच्छे कार्यों के लिए किया तथा अपने राज्य में अनेक किले तथा महलों का निर्माण करवाया। 
भरतपुर का किला (लोहारगढ़ किला) उनमें से एक है तथा भारत के इतिहास में इससे मजबूत किला और कोई नहीं है। 
इस किले में दो फाटक हैं। 
एक उत्तर में अष्ट धातु द्वार के रूप में जाना जाता है जबकि दक्षिण वाले द्वार को चारभुजा कहा जाता है। 
महाराजा सूरजमल ने भरतपुर शहर, रुस्तम के पुत्र 'खेमकरन सोगरिया' से सन् 1733 में जीता था तथा 1753 में भरतपुर कस्बे को स्थापित किया। 
उन्होंने शहर के चारों ओर मजबूत दीवारों का निर्माण करवाकर शहर की घेराबन्दी करवा दी। 
वह 1753 में भरतपुर में निवास करने लगे। 
सन् 1805 में 'लार्ड लेक' के नेतृत्व में अंग्रेजी सेनाओं के हमले का इस दुर्गम किले ने सामना किया तथा छह सप्ताह की घेराबंदी के बाद भी अंग्रेज इस किले के अन्दर जाने में सफल नहीं हो पाए और उन्हें भरतपुर के शासक से समझौता करना पड़ा। 
किले के महत्वपूर्ण स्मारकों में से किशोरी महल, महल खास और कोठी खास हैं।
मोती महल तथा जवाहर बुर्ज और फतेह बुर्ज जैसे टॉवर मुगलों और अंग्रेजी सेनाओं के ऊपर विजय की स्मृति में लगाये गये। 
गेटवे पर विशाल हाथियों के चित्र हैं।

प्रतापगढ़ का किला

प्रतापगढ़ महाराष्ट्र राज्य के सतारा जिले में, प्रसिद्ध हिल स्टेशन महाबलेश्वर से लगभग 22 किमी की दूरी पर स्थित है। 
इस किले को दो भागों में बाँटा जा सकता है: ऊपरी किला तथा निचला किला। 
ऊपरी किला पहाड़ी के शिखर पर बनाया गया था। 
यह मोटे तौर पर वर्गाकार आकृति का है जो प्रत्येक ओर से लगभग 180 मी. लम्बा है।
इसमें कई स्मारक हैं जिनमें से एक भगवान महादेव का मंदिर भी है। 
यह किले के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। 
निचला किला लगभग 320 मीटर लम्बा और 110 मी. चौड़ा है। 
यह किले के दक्षिणपूर्व में स्थित है और दस से बारह मीटर ऊँची मीनारों तथा बुर्जो द्वारा सुरक्षित है। 
किले के आसपास के क्षेत्रों की निगरानी किले के हर तरफ से आसानी से की जा सकती है। 
किले का दक्षिणी हिस्सा चट्टानी है जबकि पूर्वी हिस्सा अफजल बुर्ज पर खत्म होता है। 
किले की एक खास विशेषता यह है कि इसके सभी पक्षों पर दोहरी दीवार है तथा उनकी ऊँचाई जमीन की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग है।

मडिकेरी का किला

मडिकेरी का किला 17 वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में मुददूराजा द्वारा बनवाया गया था। 
उन्होंने इस किले के अंदर एक महल का भी निर्माण करवाया था। 
अंतत: यह टीपू सुल्तान के द्वारा ग्रेनाइट से बनाया गया तथा उन्होंने इस का नाम “जाफराबाद" रखा। 
1790 में दोवावीरा राजेन्द्र ने इस किले पर नियंत्रण कर लिया। 
लिंगराजेन्द्र वोडयार-द्वितीय ने 1812-1814 ई. में महल का पुननिर्माण करवाया। 

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Book Credit: Harsh Singh
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