Maurya Wansh Ka Itihas With pdf

Maurya Wansh Ka Itihas With pdf

मोर्य वंश का इतिहास - Maurya Wansh Ka Itihas With pdf

मौर्य राजवंश प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली एवं महान राजवंश था।  इसने 137 वर्ष भारत में राज किया। इसकी स्थापना का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मंत्री आचार्य चाणक्य को दिया जाता है, उन्होंने नन्दवंश के सम्राट घनानंद को पराजित किया| यह साम्राज्य पूर्व में मगध राज्य में गंगा नदी के मैदानों से शुरू हुआ। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र (अब का पटना) थी। मौर्य साम्राज्य 52 लाख वर्गकिलोमीटर तक फैला था

चंद्रगुप्त मौर्य 


मोर्य वंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की।
इसका जन्म 345 ईसा पूर्व में हुआ था।
जस्टिन ने चंद्र्रगुप्त मौर्य को सेंड्रोकोट्स कहा है, जिसकी पहचान विलियम जोन्स ने चन्द्रगुप्त मौर्य से की है।
विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त मौर्य के लिए वृषल शब्द का उपयोग किया गया है।
घनानंद को हराने में चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य की मदद की थी, जो बाद में चंद्रगुप्त का प्रधानमंत्री बना।
इसके द्वारा लिखित पुस्तक अर्थशास्त्र है, जिसमें राजनीति से संबंधित उल्लेख किया गया है।
चंद्रगुप्त मग्ध की गद्दी पर 322 ईसा पूर्व में बैठा।
चंद्रगुप्त जैन धर्म का अनुयाई था।
चंद्रगुप्त ने अपना अंतिम समय कर्नाटक मैं बिताया।
चंद्रगुप्त मौर्य ने 305 ईसा पूर्व में सेल्यूकस निकेटर को हराया।
सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नोलिया की शादी चंद्रगुप्त मौर्य के साथ कर दी और युद्ध की संधि शर्तों के अनुसार चार प्रांत काबुल, कंधार हैरात तथा मकरान चंद्रगुप्त को दिए।
चंद्रगुप्त के गुरु भद्रबाहु थे।
भद्रबाहु से ही इसने जैनधर्म की दीक्षा ली।
मेगास्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चंद्रगुप्त के दरबार में रहता था।
मेगस्थनीज ने इंडिका नामक पुस्तक लिखी।
चंद्रगुप्त और सेल्यूकस निकेटर की युद्ध का वर्णन एप्पिआनस ने किया।
प्लूटार्क के अनुसार चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिए।
चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु 298 ईसा पूर्व में श्रवणबेलगोला में हुई।

पाटलिपुत्र के बारे में कुछ तथ्य 


पाटलिपुत्र एक विशाल प्राचीर से घिरा है, जिसमे 570 बुर्ज और 64 द्वार है। 
दो और तीन मंजिलों वाले घर लकड़ी और कच्ची ईंटो से बने हैं। 
राजा का महल भी काठ का बना है , जिसे पथर की नक्काशी से अलंकृत किया गया है। 
यह चरों तरफ से उद्यनो और चिड़ियों के लिए बने बसेरे से घिरा हुआ है। 

बिंदुसार


चंद्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिंदुसार हुआ।
बिंदुसार 298 ईसा पूर्व में मग्ध की राजगद्दी पर बैठा।
अमित्रघात के नाम से बिंदुसार को जाना जाता है। अमित्रघात का अर्थ होता है - शत्रु विनाशक।
बिंदुसार आजीवक संप्रदाय का अनुयाई था।

वायुपुराण में बिंदुसार को भद्रसार कहा गया है।
स्ट्रैबो के अनुसार सीरियन नरेश एण्टियोकस ने बिन्दुसार के दरबार में डाइमस नामक राजदूत भेजा।
इसे ही मेगास्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है।
जैन ग्रंथों में बिंदुसार को सिंहसेन कहा गया है
बिंदुसार के शासनकाल में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है।
इस विद्रोह को दबाने के लिए बिंदुसार ने पहले सुशीम और बाद में अशोक को भेजा।
बौद्ध विद्वान तारा नाथ ने बिंदुसार को 16 राज्यों का विजेता बताया है।

अशोक


अशोक बिंदुसार का उत्तराधिकारी हुआ।
अशोक 269 ईसा पूर्व में मग्ध की राजगद्दी पर बैठा
राजगद्दी पर बैठने से पहले अशोक अवंति का राज्यपाल था।
मास्की तथा गुर्जर अभिलेखों में अशोक का नाम अशोक मिलता है।
पुराणों में अशोक को अशोकवर्धन कहा गया है।
अशोक ने अपने अभिषेक के 8वें वर्ष लगभग 261 ईसा पूर्व में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।
प्लिनी का कथन है की मिस्र का राजा फिलाडेल्फस (टॉलमी 2) ने पाटलिपुत्र में डियानीसियस नाम का एक राजदूत भेजा था।
उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।
अशोक ने आजीवकों को रहने हेतु बराबर की पहाड़ियों में चार गुफाओं का निर्माण करवाया, जिनका नाम कर्ज, चोपार, सुदामा और विश्व झोंपड़ी था।


note: अशोक के पौत्र दशरथ ने आजीवकों को गुफा प्रदान की थी।    
अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था।
अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।
भारत में शिलालेख का प्रचलन अशोक ने किया।
अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक एंव अरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ है।
ग्रीक एव्व अरमाईक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान से, खरोष्टी लिपि का अभिलेख उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान से और शेष भारत से ब्राह्मी लिपि के अभिलेख मिले हैं। 
अशोक के अभिलेखों को तीन भागों शिलालेख, स्तंभलेख तथा गुहालेख में बांटा जाता है।
अशोक के शिलालेख की खोज 1750 में की गई थी इनकी संख्या 14 है।
अशोक के अभिलेख पढ़ने में सबसे पहली सफलता 1837 ईस्वी में जेम्स प्रिसेप को मिली।
table अशोक के स्तंभ लेखों की संख्या 7 हैं जो केवल ब्राह्मी लिपि में लिखी गई है।
यह छः अलग-अलग स्थानों से प्राप्त हुआ है -



पहला शिलालेख 
इसमें पशुबलि की निंदा की गई है। 
दूसरा शिलालेख
इसमें अशोक ने मनुष्य एंव पशु दोनों की चिकित्सा व्यवस्था का उल्लेख किया है। 
तीसरा शिलालेख 
इसमें राजकीय अधिकारीयों को यह आदेश दिया गया है की वे हर पांचवे वर्ष के उपरांत दौरे पर जाएं। इस शिलालेख में कुछ धार्मिक नियमों का भी उल्लेख किया गया है। 
चौथा शिलालेख
इस अभिलेख में भेरीघोष की जगह धम्म घोष की घोषणा की गई है। 
पांचवां शिलालेख
इसमें धर्म महामात्रों की नियुक्ति के विषय में जानकारी मिलती है। 
छठा शिलालेख
इसमें आत्म नियंत्रण की शिक्षा दी गई है। 
सातवां एंव आंठवा शिलालेख
इनमे अशोक की तीर्थ यात्राओं का उल्लेख मिलता है। 
नौवां शिलालेख
इसमें सच्ची भेंट तथा सच्चे शिष्टाचार का उल्लेख मिलता है। 
दसवां शिलालेख
इसमें अशोक ने आदेश दिया है की राजा तथा उच्च अधिकारी हमेशा प्रजा के हित में सोचें। 
ग्यारवां शिलालेख
इसमें धम की व्यवस्था की गई है। 
बाहरवां शिलालेख
इसमें स्त्री महमात्रों की नियुक्ति एंव सभी प्रकार के विचारों के सम्मान की बात कहि गई है। 
तेहरवां शिलालेख
इसमें कलिंग युद्ध का वर्णन एंव अशोक के ह्रदय परिवर्तन की बात कहि गई है। 
चौदवां शिलालेख
अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया है। 

कौशाम्बी अभिलेख को रानी का अभिलेख कहा जाता है।
अशोक का सबसे छोटा स्तंभ लेख रूमीदेई है। इसी में लुम्बिनी में धम्म यात्रा के दौरान अशोक द्वारा भू-राजस्व की हर घटा देने की घोषणा की गई है।
अशोक का सातवां अभिलेख सबसे लंबा है।
प्रथम पृथक शिलालेख में यह घोषणा की है कि सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।
अशोक का शार-ए-कुना (कंधार) अभिलेख ग्रीक एंव ऑर्मेइक भाषाओँ में प्राप्त हुआ है।
सम्राज्य में मुख्यमंत्री एंव पुरोहित की नियुक्ति के पूर्व इनके चरित्र को काफी जांचा परखा जाता था, जिसे उपधा परीक्षण कहा जाता था।



मौर्य प्रांत
राजधानी 
उत्तरापत 
तक्षशिला 
अवन्ति राष्ट्र 
उज्जिनी 
कलिंग 
तोसिल 
दक्षिणापथ 
स्वर्ण गिरि 
प्राशि/पूर्वी प्रांत  
पाटलिपुत्र 

सम्राट की सहायता के लिए एक मंत्री परिषद होती थी जिसमे सदस्य की संख्या 12, 16 यां 20 हुआ करती थी।
अर्थशास्त्र में शीर्षस्त अधिकारी के रूप में तीर्थ का उल्लेख मिलता है, जिसे महामात्र भी कहा जाता था। इनकी संख्या 18 थी।
अर्थशास्त्र में चर जासूस को कहा जाता था।
अशोक के समय में मौर्य साम्राज्य में प्रांतों की संख्या 5 थी प्रांतों को चक्र कहा जाता था।
प्रांतों के प्रशासक कुमार या आर्यपुत्र या राष्ट्रिक कहलाते थे।
प्रांतो का विभाजन विषय में किया गया था जो विषयपति के अग्रिन होते थे।
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी जिसका मुखिया ग्रामीक कहलाता था।



मंत्री 
प्रधानमंत्री 
पुरोहित 
धर्म एंव दान विभाग का प्रधान 
सेनापति 
सैन्य विभाग के प्रधान 
युवराज 
राजपुत्र/राजकुमार 
दौवारिक 
राजकीय द्वार रक्षक 
अंतर्वेदिक 
अंत: पुर का अध्यक्ष
समाहर्ता 
आय का संग्रहकर्ता 
सन्निधाता 
राजकीय कोष का अध्यक्ष
प्रशास्ता 
कारागार का अध्यक्ष
पर्देष्ट्री 
कमिश्नर 
पौर 
नगर का कोतवाल 
व्यवहारिक 
मुख्य न्यायाधीश 
नायक 
नगर का अध्यक्ष
कर्मान्तिक 
उद्योगों एंव कारखानों का अध्यक्ष
मंत्री परिषद 
अध्य्क्ष 
दंडपाल 
सेना का सामान एकत्र करने वाला 
दुर्गपाल 
दुर्ग रक्षक 
अन्तपाल 
सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक 

प्रशासकों में सबसे छोटा गोप था, जो 10 ग्रामों का शासन संभालता था।
मेगस्थनीज के अनुसार नगर का प्रशासन 30 सदस्यों का एक मंडल करता था जो 6 समितियों में विभाजित था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे बिक्री कर के रूप में मूल्य का 10 वां भाग वसूला जाता था, इसे बचाने वालों को मृत्यु दंड दिया जाता था।
मेगास्थनीज के अनुसार एग्रोनोमाइ मार्ग निर्माण अधिकारी था
जस्टिन के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्या की सेना में लगभग 50,000 अश्वारोही सैनिक, 9000 हाथी व 8000 रथ थे।
जस्टिन नामक यूनानी लेखक के अनुसार, चन्द्रगुप्त ने अपनी छः लाख की फ़ौज से सरे भारत को रौंद दिया।
यह बात सही भी हो सकती है और नहीं भी लेकिन लेकिन यह सही है की चन्द्रगुप्त ने पश्चमोत्तर भारत को सलुकस की गुलामी से मुक्त किया।
युद्ध क्षेत्र में सेना का नेतृत्व करने वाला अधिकारी नायक कहलाता था।
सैन्य विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था।
प्लिनी नामक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त की सेना छः लाख पैदल सिपाही, 30,000 घुड़सवार और 9000 हाथी थे।
मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य सेना का रख-रखाव 5 सदस्यीय, 6 समितियां करती थी।
मौर्य प्रशासन में गुप्तचर विभाग महामात्य सर्प नामक अमात्य के अधीन था।
अर्थशास्त्र में गुप्तचर को गूढ़ पुरुष कहा गया है तथा एक ही स्थान पर रहकर कार्य करने वाले गुप्तचर को संस्था कहा जाता था।
एक स्थान से दूसरे स्थान पर भर्मण करके कार्य करने वाले गुप्तचर संचार कहा जाता था।
अशोक के समय जनपदीय न्यायलय के न्यायधीश को राजूक कहा जाता था।
सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था।
बिना वर्षा की अच्छी खेती होने वाली भूमि को आदेवमात्रक कहा जाता था।
मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है -

  1. दार्शनिक 
  2. किसान 
  3. आहिर 
  4. कारीगर 
  5. सैनिक 
  6. निरीक्षक 
  7. सभासद 

स्वतंत्र वेश्यावृति को अपनाने वाली महिला रूपाजीवा कहलाती थी।  
नंद वंश के विनाश करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य ने कश्मीर के राजा प्रवर्तक से सहायता प्राप्त की थी।
मौर्य शासन 137 वर्ष तक रहा। भागवत पुराण के अनुसार मौर्य वंश में 10 राजा हुए जबकि वायुपुराण के अनुसार 9 राजा हुए।
मौर्य वंश का अंतिम शासक ब्रहद्रथ था। इसकी हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ईसा पूर्व में क्र दी और मग्ध पर शुंग वंश की नींव डाली। 
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Author Credits: Harsh Singh


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