Rajsthan Ke Dharam Sampardhay

Rajsthan Ke Dharam Sampardhay


राजस्थान के प्रमुख धर्म संप्रदाय

प्राचीनकाल से ही राजस्थान में अनेक धार्मिक धाराओं का एक समन्वय द्रर्ष्टिगत है। अनेक धर्मों के अनुयायी प्राचीनकाल से ही यहां निवास करते आये हैं। राजस्थान की वीर भूमि में समय-समय पर महान संत पैदा हुए, जो भगवान की प्राप्ति के लिए मार्ग बताते हुए अपना अलग संप्रदाय बनाते हैं। 
राजस्थान के प्रमुख संप्रदाय निम्नलिखित हैं -

1. वल्लभ संप्रदाय -

वल्लभ संप्रदाय की स्थापना "आचार्य वल्लभाचार्य" ने की। इनका जन्म 1478 ई. वैशाख शुक्ल एकादशी को चंपारण (बिहार) में हुआ।  इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट एंव माता का नाम यल्लमगरू था।   

आचार्य वल्लभाचार्य जी का विवाह देवभट्ट की पुत्री महालक्ष्मी से हुआ। इनके गोपीनाथ व विट्ठलनाथ नामक दो पुत्र हुए।
वल्लभाचार्य जी का निधन वि.सं. 1587  ई. को आषाढ़ शुक्ल द्धितीय को कशी में हुआ।
वल्लभाचार्य जी ने 'अणु भाष्य ' नामक ग्रन्थ की रचना की तथा 'शुध्दाद्वैत' नामक नवीन दर्शन का प्रतिपादन कर वल्लभ संप्रदाय की स्थापना की जिसे पुष्टीमार्गीय संप्रदाय भी कहा जाता है। 

वल्लभाचार्य को श्रीनाथ जी (कृष्ण भगवान) की मूर्ति गोवर्धन पर्वत से प्राप्त हुई जिसको लेकर वे वृन्दावन आए और वहां श्रीनाथ जी का मंदिर बनाकर उसमे मूर्ति की प्रतिष्ठा करवाई।  इसी कारण वल्लभ संप्रदाय के उपास्य देव "श्रीनाथ जी" हैं। 

नोट : वल्लभ संप्रदाय में कृष्ण जी के बल स्वरूप की पूजा की जाती है। 

वल्लभ संप्रदाय को लोकप्रिय बनाने का श्रेय आचार्य "वल्लभाचार्य जी"  के द्वितीय पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित "अष्ट छाप कवि मण्डली" को दिया जाता है। 

वल्लभ संप्रदाय का मूल मन्त्र  "श्रीकृष्ण शरणं गम:" है।  

विट्ठलनाथ जी को गुसाईं गोस्वामी की पदवी मिली तब से उनकी संतान गुसाईं कहलाई।

विट्ठलनाथजी के साथ पुत्र हुए जिनके पूजन करने के लिए श्रीनाथ जी को अलग-अलग मूर्तियां बनवा कर अलग-अलग सात जगह मंदिर बनवाए गए जिसे श्रीनाथजी के साथ स्वरूप कहा जाता है यह 7 मंदिर निम्नलिखित है -


  • मथुरेशवर जी का मंदिर:       कोटा
  • विट्ठलनाथ जी का मंदिर:      नाथद्वारा (राजसमंद)
  • द्वारिकाधीश जी का मंदिर:    कांकरोली (राजसमंद)
  • गोकुलनाथ जी का मंदिर:     गोकुल (उत्तर प्रदेश)
  • गोकुलचंद्र जी का मंदिर:      कामवन (भरतपुर)
  • बालकृष्ण जी का मंदिर:       सूरत (गुजरात)
  • मदनमोहन जी का मंदिर:     करौली

मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में जब हिंदू मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए गए तो विट्ठलनाथ जी के वंशज गोस्वामी दामोदर जी व उसके भाई गोविंद जी श्रीनाथ जी की प्रतिमा को लेकर राजस्थान के जोधपुर में चौपासनी नामक स्थान पर ले आए जहां पास में ही "कदम खंडी" नामक स्थान पर 6 मास तक रुके। 

दामोदर जी के चाचा गोपीनाथ जी ने उदयपुर के महाराणा राजसिंह से श्रीनाथजी के विषय में चर्चा की तब राजसिंह ने कहा कि "मैं एक लाख हिंदू वीरों के सिर कटवा कर भी मुसलमानों को श्रीनाथजी की मूर्ति के हाथ नहीं लगाने दूंगा।"

वल्लभ संप्रदाय में मंदिर को हवेली,  दर्शन को झांकी, ईश्वर की कृपया को पुष्टि, इस मंदिर में प्रचलित संगीत को हवेली संगीत, कहा जाता है।

2. गौड़िय संप्रदाय

मध्वाचार्य जी ने पूर्णप्रज्ञ भाष्य की रचना कर द्वैतवाद नामक दर्शन प्रतिपादित किया। उनके शिष्य गौड़ स्वामी ने इस दर्शन या संप्रदाय का सर्वाधिक प्रचार किया इसी कारण यह संप्रदायिक गौड़ीय संप्रदाय कहलाया। इस संप्रदाय को नया रूप देकर जन-जन तक फैलाने का कार्य गौरांग महाप्रभु चैतन्य ने किया इसी कारण गौरांग महाप्रभु चैतन्य को गौड़ीय संप्रदाय के प्रवर्तक माना जाता है। इन के बचपन का नाम गौरांग था। 

गौड़ीय संप्रदाय ने राम एंव विष्णु की जगह कृष्ण को अपना आराध्य देव बनाया। 

गौड़ीय संप्रदाय की शुरुआत बंगाल से हुई तथा यह संप्रदायिक बंगाल से होते हुए वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) से जयपुर (राजस्थान) पहुंचा। 

राजस्थान में गोरिया संप्रदाय की मुख्य पीठ गोविंद देव जी का मंदिर सिटी पैलेस (जयपुर) है। आमेर के महाराजा मानसिंह प्रथम इस संप्रदाय से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) में गोविंद देव जी का मंदिर बनवाया।


गोविंद देव जी

गोविंद देव जी का इतिहास 4900 वर्ष पुराना है। 10 वीं शताब्दी में जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया तब मध्वाचार्य जी ने भगवान कृष्ण के दिव्य स्वरूप को धरती में सुला दिया। 16 वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने अपने दो शिष्यों रूपगोस्वामी एंव सनातन गोस्वामी को उस मूर्ति को खोजने भेजा यहां से रूप गोस्वामी ने कृष्ण भगवान के उस रूप को खोज निकाला। 1590 में मिर्जा राजा जयसिंह ने उस रूप के लिए वृंदावन में लाल पत्थरों का एक सप्तखंडी देवालय बनवाया और अकबर ने गोविंद देव जी की गायों के चारे के लिए 135 बीघा भूमि प्रदान की। 

औरंगजेब ने इस मंदिर की 3 मंजिला इमारत को तुड़वाकर कर चारागाह में दी हुई भूमि का पट्टा निरस्त कर दिया। तब औरंगजेब के डर से गोविंद देव जी की असली मूर्ति को श्री शिवराम गोस्वामी लेकर वैन में छिप गए और यहां से मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र राम सिंह को देख-रेख में कामा (भरतपुर) पहुंचे यहां से राम सिंह मूर्ति को सुरक्षित लेकर महाराजा मानसिंह द्वारा बनाए गए गोविंदपुरा (वर्तमान में कनक, वृंदावन) में लाकर इस मूर्ति को प्रतिष्ठित किया जिसे आज पुराना गोविंद देव जी का मंदिर कहते हैं।

1722 ई. में सवाई जयसिंह ने अपने आराध्य गोविंददेवजी को अपने निवास स्थान सिटी पैलेस (चंद्र महल) के निकट सूर्य महल में लाकर प्रतिस्थापित किया।

नोट: जयपुर के शासक गोविंद देव जी को अपने राज्य का स्वामी जबकि स्वय  को अपना दीवान मानते थे।
कृष्ण के प्रपौत्र  वज्रनाथ ने अपनी माता से सुने स्वरूप के आधार पर कृष्ण जी के तीन विग्रहों का निर्माण किया -

  • गोविंद देव जी             मुख        ( जयपुर)
  • गोपीनाथजी वक्ष        ब्रह्मपुरी   (जयपुर)
  • मदन मोहन जी         चरण         (करौली)

कहा जाता है कि इन तीनों को मिला दिया जाए तो बिल्कुल हुबहू कृष्ण भगवान की शक्ल बन जाती है।


3. निंबार्क संप्रदाय 

वैष्णव संप्रदाय का एक प्रमुख संप्रदाय निंबार्क संप्रदाय की स्थापना "निबंकाचार्य जी" द्वारा की गई। निबंकाचार्य जी का जन्म आंद्र प्रदेश के तेलंग ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके बचपन का नाम भास्कर था। 

निंबार्क संप्रदाय को सनकादि संप्रदाय, हंस संप्रदाय नारद संप्रदाय, मारवाड़ में निमावत साध संप्रदाय के नाम से जाना जाता है।    

निंबार्क संप्रदाय की मुख्य पीठ वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) में है। लेकिन इस संप्रदाय की राज्य पीठ सलेमाबाद (अजमेर) में रूपनगढ़ नदी पर स्थित है जिसकी स्थापना 7वीं सदी में 'परशुराम देवाचार्य ' के द्वारा की गई। राजस्थान में निंबार्क संप्रदाय की अन्य पीठ उदयपुर में स्थित है। 

नोट: निंबार्क  संप्रदाय  में राधा और की युगल रूप की सेवा करते हैं, जिसमे राधा को कृष्ण की पत्नी माना जाता है। 


आचार्य परशुराम 

आचार्य परशुराम 36 वे निबांकाचार्य थे। आचार्य जी का जन्म 16वीं शताब्दी में ठिकरिया गांव (सीकर) में हुआ था। इन्होंने हरीव्यास देवाचार्य से शिक्षा प्राप्त कर मथुरा में नारद टिल्ले पर तप किया। सलेमाबाद (अजमेर) में निंबार्क संप्रदाय की पीठ की स्थापना के साथ एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जहां पर इन्होंने जीवित समाधि ली। सलेमाबाद में आज भी इनकी चरण पादुकाओं की पूजा की जाती है।

जयपुर नरेश जगत सिंह ने सलेमाबाद जाकर आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त किया तत्पश्चात राजकुमार जय सिंह का जन्म हुआ। 19वीं सदी में इस राजवंश ने निंबार्क संप्रदाय को काफी आश्रय प्रदान किया।


4. रामानुज संप्रदाय

रामानुज संप्रदाय के प्रवर्तक शंकराचार्य के अनुयायी रामानुजाचार्य थे। इनका जन्म 1017 ई. तिरुपति नगर (आंध्रप्रदेश) में हुआ। रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर श्रीभाष्य की रचना की एंव भक्ति का एक नवीन दर्शन विशिष्टाद्वैत प्रतिपादित किया।

रामानुज संप्रदाय के उपास्यदेव भगवान राम है। इसी कारण इसे रामावत संप्रदाय कहते हैं। इस संप्रदाय का सर्वाधिक प्रचार रामानुज के शिष्य रामानंद ने किया इसी कारण इसे रामानंदी संप्रदाय भी कहा जाता है। 

यह लोग भक्तिमार्गी होते हैं तथा भविष्य को मोक्ष प्राप्ति का साधन मानते हैं।

उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति का प्रारंभिककरता रामानंद जी भक्ति आंदोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लेकर आए। इनकी मुख्य गद्दी गलता (जयपुर) में स्थित है। इसे विशिष्टाद्वैत संप्रदाय की पीठ होने के कारण उत्तरतोत्रादी गालव ऋषि की तपोस्थली होने के कारण गालव तीर्थ, सर्वाधिक बंदर होने के कारण मंकी वैली कहा जाता है। वह इनकी एक अन्य पीठ रेवासा (सीकर) में स्थित है।

वर्तमान में दोनों गद्दियों के बीच विवाद न्यायालय में विचाराधीन है। सवाई जयसिंह ने रामानंदी संप्रदाय को अधिक प्रोत्साहन दिया। सवाई जयसिंह ने रामानंदी संप्रदाय पर श्री कृष्ण मत कला निधि से रामरासा ग्रंथ लिखवाया।


रामानंद संप्रदाय की प्रमुख पीठ

गलताजी - इस पीठ के संस्थापक स्वामी कृष्ण दास पयहारी थे। पयहारी जी ने आमेर शासक पृथ्वीराज के गुरु कापालिक संप्रदाय के योगी चतुरनाथ को शास्त्रार्थ में पराजित किया तथा गलता में रामानंदी संप्रदाय की सर्वप्रमुख पीठ स्थापित की।

रामानुज संप्रदाय की मुख्य पीठ गलता पीठ की स्थापना कृष्णदास पयहारी ने की किंतु गलता तीर्थ की स्थापना गालव ऋषि ने की।

रेवास - कृष्णदास पयहारी के शिष्य स्वामी अग्रदास जी ने रेवास (सीक)र मेंइस पीठ की स्थापना की। इसमें राम की भक्ति माधुरी भाव (राम व सीता की कृष्ण राधा की तरह) से की जाती है। इस प्रकार अग्रदास जी के मत को रसिक संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है।


4 रामस्नेही संप्रदाय


रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना रामचरण जी ने की। इनका जन्म 1718 ई. में माघ शुक्ल चतुर्दशी सोढा ग्राम ,जयपुर (वर्तमान में मालपुरा टोंक) में एक विजयवर्गीय वैश्य परिवार में हुआ। 
इनके बचपन का नाम रामकिशन था। इनके पिता का नाम बख्तराम, माता का नाम देऊ जी तथा पत्नी का नाम गुलाब कंवर था।

नोट: सोढा ग्राम रामचरण जी का ननिहाल था जहां उनका जन्म हुआ, इनका वास्तविक गांव बनवाडो  था। 

रामचरण जी एक रात घूमते-घूमते मेवाड़ के शाहपुरा पहुंचे वहां दांतड़ा (मेवाड़) में रह रहे स्वामी कृपाराम जी महाराज को अपना गुरु स्वीकार कर उनसे दीक्षा प्राप्त की, जिन्होंने रामकिशन को रामचरण जी नाम प्रदान किया।

इनका देहांत 1798 ई. में शाहपुरा (भीलवाड़ा) में हुआ जहां होली के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण एकदम से चैत्र कृष्ण पंचमी तक फूलडोल का मेला लगता है। इनके कुल 12 प्रधान शिष्य थे। इनके द्वारा रचित ब्रजभाषा में गीतों का संग्रह आनाभाई वेणी या अर्णभवानी कहलातें है। 

रामस्नेही संप्रदाय में राम की भक्ति रामधुन  के माध्यम से करते हैं इसीलिए इस संप्रदाय के प्रार्थना स्थल को रामद्वारा कहा जाता है, जहां गुरु का चित्र सामने रखा जाता है क्योंकि संप्रदाय में गुरु के महत्व पर सर्वाधिक बल दिया जाता है।

विक्रम संवत 1817 ई. में रामचरण जी ने रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना की। इस संप्रदाय की मूल गद्दी शाहपुरा (भीलवाड़ा) में स्थित है। शाहपुरा के नरेश रणसिंह ने इनके रहने के लिए छतरी का निर्माण करवाया था तथा उसी स्थान पर वर्तमान में मठ स्थापित किया गया है।

रामस्नेही संप्रदाय के अनुयायी गुलाबी रंग की धोती पहनते हैं तथा दाढ़ी, मूछ व सिर पर बाल नहीं रखते। वह मूर्ति पूजा नहीं करते तथा उनके लिए शाकाहारी होना आवश्यक है।


रामस्नेही संप्रदाय की अन्य प्रमुख पीठ

रेन शाखा (दरिया पंथ) - रामस्नेही संप्रदाय की रेन शाखा की मुख्य पीठ रेन (मेड़ता, नागौर) के संस्थापक संत दरियाव जी थे। दरियाव जी का जन्म जैतारण (पाली) में विक्रम संवत 1758 को जन्माष्टमी के दिन मानजी  धुनिया  (पिता) एंव माता के गिगण के घर हुआ।  यहां प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा को मेला लगता है। 

दरियाव जी ने राम मे "रा" को राम का व "म" को मुहमद का प्रतीक मानते हुए हिंदू मुस्लिम सद्भाव की भावना को प्रोत्साहित किया।

सिंहंथल शाखा (बीकानेर) - रामस्नेही संप्रदाय की सिंहंथल शाखा की मुख्य पीठ सिंहंथल (बीकानेर) के संस्थापक संत हरिराम दास जी थे। हरिराम दास जी का जन्म सिंहंथल में भागचंद जोशी (पिता) एवं रामी  (माता) के घर हुआ।

संत हरिराम दास जी गृहस्ती थे। इनकी पत्नी का नाम चंपा और पुत्र का नाम बिहारी दास था। संत हरिराम दास जी ने संत श्री जयमल दास जी रामस्नेही से पंथ की दीक्षा ली। संत हरिरामदास जी की प्रमुख कृति "निसानी"  है।

खेड़ापा शाखा - रामस्नेही संप्रदाय की खेड़ापा शाखा की मुख्य पीठ खेड़ापा (जोधपुर) के संस्थापक संत रामदास जी थे। राम दास जी का जन्म विक्रमपुर (जोधपुर) में मेघवाल जाति के श्री शार्दुल (पिता) एवं माता श्रीमती आणमी के घर हुआ। रामस्नेही संप्रदाय की सिंहथल पीठ के संस्थापक संत हरिराम दास जी से राम दास जी ने शिक्षा ग्रहण की।

झेलम दास जी रामस्नेही संप्रदाय के प्रसिद्ध संत श्री माधव दास जी दीवान के शिष्य थे। इन्होंने हरिराम दास जी को दीक्षा दी। इसी कारण जेलम दास जी को सिंहथल और खेड़ापा शाखा के आदी आचार्य कहा जाता है।


5. जसनाथी संप्रदाय

जसनाथी संप्रदाय की स्थापना संत जांभोजी ने की। संत जांभोजी का जन्म 1451 ई. (विक्रम संवत 1508) पीपासर (नागौर) में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) के दिन पंवार वंशीय राजपूत परिवार में हुआ। इनकी माता का नाम हनसा देवी तथा पिता का नाम लोहट था।

जंभोजी बाल्यावस्था से ही मननशील थे। कम बोलने के कारण इन्हें गहरा गूंगा तथा प्रकृति प्रेमी होने के कारण  विश्व पर्यावरण आंदोलन का प्रथम प्रणेतापर्यावरण वैज्ञानिक, जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को होने के कारण कृष्ण का अवतार तथा विश्नोई संप्रदाय में विष्णु का अवतार मानते हैं।

इनके गुरु का नाम गोरखनाथ था।  जांभोजी ने विष्णु की निर्गुण निरंकार ब्राह्मण की उपासना पर बल दिया। 

जांभोजी ने 1485 ईस्वी में समराथल (बीकानेर) में कार्तिक कृष्ण अष्टमी को ऊंचे टीले "धोक धोरे" पर बैठकर विश्नोई संप्रदाय की स्थापना की। विश्नोई संप्रदाय में 29 प्रकार की शिक्षाएं होती हैं। इन नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति बिश्नोई (20+9)  कहलाता है। जांभोजी ने अपने समस्त उपदेश मरू भाषा में दिए और इनके प्रमुख ग्रंथ जंभ सागर, जंभ संहिता, बिश्नोई धर्म प्रकाश एवं 120 शब्दवाणीया प्रसिद्ध है।

"हृदय से विष्णु का नाम जपो और हाथ से कार्य करो" यह  जांभोजी का मूल मंत्र है।


जांभोजी के प्रमुख धार्मिक स्थल

पीपासर - जांभोजी का जन्म पीपासर (नागौर) में हुआ जहां उनके  प्राचीन घर की जगह मंदिर बना दिया गया है जिसमें उनके खड़ाऊ रखे गए हैं।

मुक्तिधाम - जांभोजी ने 1516  ई. में मुकाम (नोखा, बीकानेर) में समाधि ली जहां प्रतिवर्ष फाल्गुन व आश्विन महा की अमावस्या को मेला लगता है।

रामड़ावास - पीपाड़ (जोधपुर) के निकट रामड़ावास व लोहावट में इन्होंने उपदेश दिए।

जांभा - जोधपुर जिले की फलोदी तहसील के जांभा गांव में जंभेश्वर जी के कहने पर जैसलमेर के राजा जयसिंह ने तालाब बनवाया था जो बिश्नोई समाज के लिए पुष्कर के समान पावन तीर्थ है। यहां प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या तथा भाद्रपद पूर्णिमा को मेला लगता है।

रोटू - नागौर जिले के रोटू गांव में इस संप्रदाय का धार्मिक स्थल है। 

जांगलू - बीकानेर की नोखा तहसील में जांगलू गांव में प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या व भाद्रपद अमावस्या को मेला लगता है।

लोदीपुर - मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में जांभोजी भ्रमण पर आए थे।

कथा जैसलमेर की की रचना संत कवि विल्हो जी ने की। 
इसमें उनके समकालीन 6 राजा जो इनकी शरण में आए दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी, नागौर का नवा महमूद खान नागोरी, मेड़ता का राव जैतसी, जोधपुर के राठौड़ सातल देव और मेवाड़ का महाराणा सांगा।

जसनाथ जी  

जसनाथ जी का जन्म 1482 ईस्वी (विक्रम संवत 1540)  देव उठनी ग्यारस को कतरियासर (बीकानेर) के एक जाट परिवार में हुआ। 

जन मान्यता के अनुसार कतरियासर गांव के जागीरदार हमीद जाट को एक राज स्वपन में दिखाई दिया कि उत्तर दिशा में स्थित तालाब के किनारे एक बालक बैठा है प्रात: तालाब के तट पर सचमुच एक सुंदर बालक को देखकर निसंतान हमीरजी अत्यंत प्रसन्न हुए उसे घर लाकर अपनी पत्नी रूपादे को सौंप दिया। यही बालक संत जसनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इनका लालन-पालन हमीर जाट व रूपादे के द्वारा किया गया। इनकी शिक्षा 1551 में आश्विन शुक्ल सप्तमी को गौ रक्षक पीठ के गोरख आश्रम से हुई। गोरखनाथ जी के अंत में दीक्षित होने के उपरांत आजीवन ब्रह्मचारी रहते हुए गोरखा मालिया नामक स्थान पर 12 वर्ष तक तपस्या की।

संत जसनाथ जी ने 1504 ई. में जसनाथी संप्रदाय की स्थापना की जसनाथी संप्रदाय में 36 प्रकार की शिक्षाएं अपनाते हुए निरंकार ब्राह्मण शिव का स्मरण किया जाता है। जसनाथ जी के प्रिय भक्त गले में काली ऊन का धागा पहनते हैं तथा संत भगवा वस्त्र धारण करते हैं। जसनाथ जी के प्रमुख ग्रंथ शिंभूधड़ा व कोठा  है। जसनाथ जी ने 1506 ई. में कतरियासर (बीकानेर) में आश्विन शुक्ल सप्तमी को जीवित समाधि ली।

जसनाथ जी के चमत्कारों से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने जसनाथ जी को कतरियासर (बीकानेर) में 500 बीघा जमीन भेंट की।

जसनाथी संप्रदाय के अनुयाई जो इस संसार से विरक्त हो जाते हैं उन्हें परमहंस कहा जाता है।

जसनाथ जी के चमत्कारों के संबंध में प्रचलित कथा है कि जब जसनाथ जी 1 वर्ष के थे तब उनकी माता इन्हें जलती हुई अँगीठी से बांधकर बाहर चली गई थी। वापस आने पर माता ने देखा कि बालक जसनाथ जी अंगीठी मैं बैठा हुआ जलते हुए अंगारों को अपने सिर पर डाल रहा है इस पर माता जोर-जोर से रोने लगी तब बालक जसनाथ अचानक अंगीठी से निकलकर मां की गोदी में आकर बैठ गया इस पर मैं आश्चर्यचकित रह गई इसी कारण जसनाथी संप्रदाय में धधकते हुए अंगारों पर अग्नि नृत्य किया जाता है यह राजस्थान का एकमात्र धार्मिक लोक नृत्य है।

लालदास जी 

लालदास जी मत्स्य क्षेत्र के मध्य काल के प्रमुख समाज सुधारक लोक संत लालदास जी का जन्म 1540 ई. सावन कृष्ण पंचमी को धोलीधुव गांव (अलवर) में दलित जाति के मेव लकड़हारे के घर हुआ था। 

इनके पिता का नाम चांदमल तथा माता का नाम समदा था।

लालदास जी अपने गुरु तिजारा के मुस्लिम संत गदन चिश्ती से आशीर्वाद लेकर इन्होंने लालदास जी संप्रदाय की स्थापना की तथा इस संप्रदाय में निर्गुण भक्ति का प्रचार प्रारंभ किया। लाल दास जी की चेतावनीयां  उनका प्रमुख काव्य ग्रंथ है।

1648 में लाल दास जी का नगला (भरतपुर) में देहांत हो गया परंतु उनकी समाधि शेरपुर (अलवर) में स्थित है। 

लालदास जी संप्रदाय के प्रमुख पूजा स्थल शेरपुर (रामगढ़, अलवर) में है। वर्तमान में यह धार्मिक स्थल देवस्थान विभाग की देखरेख में है। प्रतिवर्ष आश्विन एकादशी तथा माघ पूर्णिमा के दिन यहां मेला लगता है।

लालदास जी संप्रदाय में हिंदू मुस्लिम एकता, भेदभाव की समाप्ति तथा सामाजिक सुरक्षा पर अत्यधिक बल दिया गया।

शाहजहां का पुत्र दाराशिकोह संत लालदास जी से मिलने आया था उसने संत जी से पूछा कि दिल्ली का अगला बादशाह कौन होगा? इस पर लाल दास जी ने कहा कि दिल्ली के तख्त पर तो वही बैठेगा जो अपने भाइयों की हत्या करेगा। आगे चलकर यह भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई। औरंगजेब ने अपने भाइयों दाराशिकोह, शुजा व मुराद का वध करके दिल्ली के तख्त पर कब्जा किया।

इस पंथ के लोग मेव जाति की कन्या से विवाह करते हैं। इस संप्रदाय में दीक्षा लेने वाला व्यक्ति निरंकारी होना चाहिए उसमें धन से मुंह नहीं होना चाहिए। इसलिए इस संप्रदाय के अधिकांश अनुयायी  अपनी संपत्ति भी दान कर देते हैं।


संत पीपाजी

संत पीपाजी का जन्म 1425 ई. में चैत्र पूर्णिमा के दिन गागरोन दुर्ग (झालावाड़) के राजा खिमजी चौहान वंश के पिता कड़वा राम सीता माता लक्ष्मी मति के यहां हुआ। इनके बचपन का नाम प्रताप सिंह था।

प्रताप सिंह बनारस जाकर रामानंदी कै शिष्य बने।


पीपा जी ने ईश्वर भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग मांगते हुए वैष्णव धर्म का प्रचार किया इसी कारण वह राजस्थान में भक्ति आंदोलन के प्रथम संतकहलाते हैं। 

संत पीपा जी की 20 रानियां थी जिसमें से सबसे छोटी रानी सीता की प्रेरणा व कुलदेवी की कृपया से अपना राजकाज भतीजे को सौंपकर बनारस पहुंचकर गुरु रामानंद जी से शिक्षा प्राप्त कर विरक्त जीवन व्यतीत किया पीपा जी को श्री हरि का साक्षात दर्शन द्वारिकाधीश मंदिर में हुआ।

इसी विरक्त जीवन में घूमते हुए वह कुछ समय के लिए समदड़ी बाड़मेर में रुके और वहां लोगों की सेवा करते हुए अपने जीवन यापन के लिए सिलाई का काम किया इसी कारण इन्हें दर्जी समुदाय के लोग अपना आराध्य देव मानते हैं।

पीपा जी की चमत्कारी घटनाओं में तेली जाति के एक व्यक्ति को मार कर पुन जीवित करना और खूंखार जानवर शेर को भी पालतू बना लेना आदि शामिल है।

संत पीपा जी का मंदिर समदड़ी बाड़मेर में है जहां पीपा पंथी दर्जी समुदाय का पति वर्ष चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को विशाल मेला आयोजित किया जाता है।

पीपा जी ने अपना अंतिम समय टोंक जिले के टोडा ग्राम में स्थित एक गुफा में भजन करते हुए व्यतीत किया जहां चैत्र कृष्ण नवमी को इनका देहांत हुआ वह गुफा आज संत पीपा जी की गुफा के नाम से जानी जाती है।
यह गुफा टोंक जिले की टोडारायसिंह तहसील के टोडा ग्राम में स्थित है।

संत पीपा जी की छतरी कालीसिंध नदी के किनारे गागरोन दुर्ग में स्थित है जहां उनके चरण चिह्न की पूजा की जाती है।


संत मावजी


संत मावजी का जन्म डूंगरपुर जिले के आसपुर तहसील के सबला ग्राम में वि. सं. 1771 में माघ शुक्ला पंचमी को हुआ इनका जन्म बालम ऋषि पिता तथा केशरबाई माता के घर हुआ।

आप गाय चराते थे और समय कृष्ण का रूप धारण करके नाचते गाते बंसी बजाते और सिर पर मुकुट भी बांध लेते थे।

वि.सं. 1784 माघ एकादशी गुरुवार के दिन गणेश्वर धाम में शिव मंदिर में साधना करने गए और वहां 5 वर्ष तक रासलीला भजन रचना एवं योग साधना करते रहे और अंत में उसी में विलीन हो गए।

संत माव जी को कृष्ण के निष्कलंकी अवतार के रूप में पूजा जाता है इसी कारण इनके द्वारा चलाए गए पंत को निष्कलंक संप्रदाय के नाम से जाना जाता है इस संप्रदाय की मुख्य पीठ साबला डूंगरपुर में स्थित है संत माव जी की वाणी जिसमें संगीत है उसे चोपड़ा कहते हैं।

संत मावजी की पुत्रवधू जनक कुमारी ने मामा जी के विचारों को मूर्त रूप देने हेतु 18 सो 82 ईस्वी गणेश्वर धाम पर सर्वधर्म समन्वय वादी एक मंदिर बनवाया, इस मंदिर की यह विशेषता है कि प्रवेश द्वार जैन मंदिर जैसा गुमटी बोध मंदिर देसी मिनारा मस्जिद जैसी कथाकार गिरनार जैसा है और मंदिर के गर्भ गृह में मूर्ति विष्णु भगवान की है निष्कलंक संप्रदाय का मेला सोम माही जाखम नदियों के संगम पर स्थित गणेश्वर धाम मैं माघ शुक्ल पूर्णिमा को लगता है यह मेला आदिवासियों का कुंभ कहलाता है।



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