वायुमण्डल की परतें - Vayumandal Ki Parte in Hindi

इस पोस्ट में हम वायुमण्डल की परतें - Vayumandal Ki Parte को पडेंगे। 
वायुमण्डल की परतें टॉपिक आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे- BankSSCRailwayRRBUPSC आदि में सहायक होगा। 
Vayumandal Ki Parte टॉपिक से हर प्रतियोगी परीक्षा में 1-2 प्रश्न पूछे जाते हैं। इस टॉपिक का step by step वर्णन यहाँ किया गया है। 
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Vayumandal Ki Parte in Hindi
Vayumandal Ki Parte in Hindi

वायुमण्डल की परतें - Layers of Atmosphere in Hindi

वायुमण्डल की ऊपरी परतों के अध्यन को एरोलॉज़ी तथा निचली परत के अध्यन को मेट्रोलॉजी कहते हैं। 
वायुमंडल 10,000 km तक फैला हुआ है। 
वायुमण्डल में मुख्य रूप से नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (20.9%), कार्बनडाईऑक्साड 90.03%), ऑर्गन (0.9%) पाई जाती है।   
वर्तमान समय में वायुमण्डल के विषय में आधुनिकतम जानकारी प्राप्त करने के लिए रेडियोसाण्डे, रविसाण्डे (radiosonde, rawisonde), बैलून, राकेट, राडार, उपग्रह, रेडियोतरंग, विविध प्रकार के सेन्सर आदि का सहारा लिया जाता है। 
इन माध्यमों से प्राप्त जानकारी के आधार पर प्रभावी वायुमण्डल की ऊँचाई का 16 से 29 हजार किलोमीटर तक अध्ययन किया गया है परन्तु सागर तल से 800 किलोमीटर ऊँचाई तक का वायुमण्डल सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। 
गैसों के सान्द्रण, सकल वायुमण्डलीय द्रव्यमान (mass), वायुदाब तथा मौसम की घटनाओं की दृष्टि से वायुमण्डल का लगभग 50 प्रतिशत भाग 5.6 किलोमीटर तथा 97 प्रतिशत भाग 29 किलोमीटर की ऊँचाई तक निहित है । 
पृथ्वी के वायुमण्डल की रचना कई सकेन्द्रीय परतों या मण्डलों (concentric layers or zones) से हई है। 
वायुमण्डल की परतीय संरचना (layered structure) का दो आधारों पर वर्गीकरण किया गया है:-
(1) तापीय विशेषता, तथा (2) रासायनिक विशेषता। 

एस० पेटरसन ने पृथ्वी के चारों ओर व्याप्त वायुमण्डल को पाँच लम्बवत् मण्डलों में विभाजित किया है: 
(1) क्षोभमण्डल / परिवर्तन मण्डल
(2) समतापमण्डल
(3) ओजोन मण्डल
(4) आयन मण्डल तथा 
(5) आयतन मण्डल। 

क्षोभमण्डल

क्षोभमण्डल यह वायुमण्डल की सबसे निचली परत है। 
इसे परिवर्तन मंडल या विक्षोभ मण्डल भी कहते हैं। 
इस मण्डल को परिवर्तन मण्डल इसलिए कहा जाता है कि इसमें ऊँचाई के साथ तापमान, जलवाष्प, एयरोसॉल एवं गैसों के अनुपात में परिवर्तन होता जाता है।i
इस परत को विक्षोभ एवं भंवर (eddies) के प्रभुत्व के कारण संवहनीय परत भी कहा जाता है। 
मौसम एवं जलवायु की दृष्टि से क्षोभमण्डल सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि मौसम सम्बन्धी सभी घटनायें (यथाः वाष्पीकरण, संघनन एवं विभिन्न रूपों में वर्षण-कुहरा, बादल, ओस, पाला, हिम वर्षा, ओलावृष्टि, जलवर्षा, बादलों की गरज, बिजली की चमक, तड़ितझंझा, वायुमण्डलीय तूफान-चक्रवात, हरिकेन, टारनैडो, टाइफून आदि) इसी मण्डल में घटित होती हैं । 

इस मण्डल में वायुमण्डल के समस्त गैसीय द्रव्यमान का 75 प्रतिशत केन्द्रित है। 

इसके अलावा अधिकांश जलवाष्प, एयरोसॉल तथा प्रदूषक (pollutants) भी इसी मण्डल में पाये जाते हैं। 
जीवधारियों की दृष्टि से भी क्षोभमण्डल सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि मानव सहित सभी जीवित जीवों का अस्तित्व क्षोभमण्डल में होने वाली मौसमी घटनाओं के कारण ही सम्भव हो पाया है। 
सामान्यतया क्षोभमण्डल को दो या तीन उपमण्डलों में विभक्त किया जाता है। 
क्षोभमण्डल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें बढ़ती ऊँचाई के साथ में प्रति 1000 मीटर पर 6.5° सें० की दर से तापमान में कमी होती जाती है। 
तापमान की गिरावट की इस दर को तापमान का सामान्य पतन दर (normal lapse rate) कहते हैं । 
क्षोभमण्डल की ऊँचाई में मौसमी परिवर्तन होता रहता है, साथ ही साथ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर क्षोभमण्डल की ऊँचाई घटती जाती है। 
ग्रीष्मकाल में क्षोभमण्डल की ऊँचाई बढ़ जाती है जबकि शीतकाल में घट जाती है। 
भूमध्यरेखा तथा ध्रुवों पर क्षोभमण्डल की औसत ऊँचाई क्रमश: 16 किलोमीटर एवं 6 किलोमीटर है। 
क्षोभमण्डल की ऊपरी सीमा को ट्रोपोपाज कहते हैं जिसको नेपियर शॉ ने सबसे पहले यह नाम दिया। 
वास्तव में ट्रोपोपाज रैखिक न होकर मण्डलीय (zonal) होता है। 
इसकी औसत मोटाई 1.5 किलोमीटर है। 

ट्रोपोपाज की कतिपय विशिष्ट विशेषताएँ: 

(1) ऊँचाई के साथ तापमान की गिरावट इस सीमा पर आने पर समाप्त हो जाती है अत: यह शीत बिन्दु (cold point) को दर्शाता है, 
(2) ट्रोपोपाज पर विक्षोभ मिश्रण (turbulent mixing) समाप्त हो जाता है तथा 
(3) यह अधिकांश वायुमण्डलीय जलवाष्प के सान्द्रण (concentration) की ऊपरी सीमा निर्धारित करता है। 

ट्रोपोपाज की ऊँचाई में भी स्थानिक (भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊँचाई कम होती जाती है) तथा कालिक (ग्रीष्मकाल में ऊँचाई अधिक हो जाती है परन्तु शीतकाल में घट जाती है) परिवर्तन होता है।
ट्रोपोपाज की भूमध्य रेखा एवं ध्रुवों पर ऊँचाई क्रमशः 17 किमी० एवं 9 से 10 किमी० होती है। 
इसकी ऊँचाई में मौसमी परिवर्तन भी होता है। 
भूमध्य रेखा पर इसकी जनवरी एवं जुलाई में ऊँचाई 17 किमी० रहती है तथा तापमान -70° से होता है। 
ट्रोपोपाज की 45° उ० अक्षांश पर ऊँचाई जुलाई में 15 किमी० (तापमान-60° सें०) तथा जनवरी में 12.5 किमी० (तापमान - 58° सें०) रहती है। 

ध्रुवों पर ऊँचाई जुलाई में 10 किमी० (तापमान -45° सें०) तथा जनवरी में 9 किमी० (तापमान - 58° सें०) होती है।

भूमध्य रेखा पर ट्रोपोपाज पर तापमान न्यूनतम (-70° सें०) है (अधिक ऊँचाई के कारण) परन्तु ध्रुवों पर अपेक्षाकृत अधिक है। 
चूँकि ऊँचाई के साथ प्रति 1000 मीटर पर 6.5° सें० तापमान कम होता जाता है अत: यह स्वाभाविक है कि भूमध्य रेखा के ऊपर ट्रोपोपाज की 17 किमी० की ऊँचाई पर तापमान ध्रुवों के ऊपर ट्रोपोपाज पर तापमान की अपेक्षा अधिक कम हो। 
वास्तव में ट्रोपोस्फीयर का शाब्दिक अर्थ होता है 'मिश्रण का मण्डल या प्रदेश' (zone or region of mixing) जबकि ट्रोपोपाज का अर्थ होता है 'जहाँ मिश्रण रुक जाता है' (where mixing stops)  
भूमध्य रेखा के ऊपर टोपोपाज पर वायुदाब 100 मिलीबार तथा ध्रुवों के ऊपर इस सीमा पर 250 मिलीबार होता है । 
ज्ञातव्य है कि जेटस्ट्रीम तथा उष्ण कटिबन्धी चक्रवातों के क्षेत्र में ट्रोपोपाज की क्रमबद्धता (continuity) भंग हो जाती है। 

समतापमण्डल (Stratosphere)

टोपोपाज के ऊपर वाली परत को समतापमण्डल कहा जाता है । 
इस मण्डल की खोज तथा अध्ययन सर्वप्रथम टीजरेन्स डी बोर्ट द्वारा 1902 में किया गया। 
इस मण्डल की ऊँचाई, मोटाई एवं तापीय दशा के विषय में परस्पर विरोधी मत हैं। 
प्रारम्भ में इस मण्डल को समतापी माना गया था अर्थात् इस पूरे मण्डल में तापमान न तो ऊँचाई के साथ बढ़ता है और न ही घटता है, वरन समान रहता है। 
परन्तु इस विचारधारा का अब खण्डन कर दिया गया है। 
कुछ विद्वानों ने समताप मण्डल की मध्य अक्षांशों के ऊपर ऊँचाई 25-30 किमी० बतायी है, जबकि दूसरा वर्ग इसे 80 किमी० बताता है । 
औसत रूप में समताप मण्डल की ऊँचाई 50 किमी० मानी गयी है। 
इस मण्डल में तापमान में परिवर्तन होता है या नहीं होता है पर भी मतान्तर है। 
कुछ विद्वानों का मानना है कि स्ट्रैटोस्फीयर समतापी है अर्थात् ऊँचाई के साथ तापमान में किसी भी तरह (वृद्धि या ह्रास) का परिवर्तन नहीं होता है जबकि कुछ विद्वानों का मानना है कि ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि होती है तथा यह 50 किमी० की ऊँचाई, जो इस मण्डल की ऊपरी सीमा है, पर तापमान 0°C (32°F) हो जाता है। 

समतापमण्डल की ऊपरी सीमा को स्ट्रैटोपाज कहते हैं। 

तापमान में वृद्धि इस मण्डल में मौजूद ओजोन गैस द्वारा सौर्यिक पराबैंगनी विकिरण तरंगों के अवशोषण एवं कम घनत्व वाली विरल हवा के कारण होती है। 
स्थिर दशा, शुष्क पवन, मन्द पवन संचार, बादलों का प्रायः अभाव, ओजोन के सान्द्रण आदि के कारण इस मण्डल में मौसम की घटनायें कम ही घटित होती हैं। 
कभी-कभी निचले समतापमण्डल में सिरस बादल, जिन्हें 'मदर ऑफ पर्ल क्लाउड' या 'नैक्रियस क्लाउड' कहते हैं दिखाई पड़ जाते हैं। 
निचला समतापमण्डल जीवमण्डलीय पारिस्थितिक तंत्र के जीवों के लिए अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसी में जीवन रक्षक ओजोन गैस (O) का 15-35 किमी० के मध्य सर्वाधिक सान्द्रण होता है। 
ओजोन का सर्वाधिक सान्द्रण 22 किमी० की ऊँचाई पर होता है, यद्यपि ओजोन की स्थिति का 80 किमी० की ऊँचाई तक पता लगाया गया है।

अत्यधिक ओजोन वाली निचली परत को ओजोनमण्डल कहते हैं 

यह 15 से 35 किमी० तक विस्तृत है, यद्यपि ओजोन मण्डल की ऊपरी सीमा 55 किमी० निश्चित की गयी है। 
ओजोन का अर्थ, उसके निर्माण एवं विनाश की प्रक्रियाओं का उल्लेख पहले किया जा चुका है। 
हाल के शोधों से पता चला है कि ओजोन परत का क्षरण हो रहा है तथा आर्कटिक क्षेत्रों एवं अण्टार्कटिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक के भाग के ऊपर ओजोन छिद्र (ozone hole) का निर्माण हो गया है। 

"  यद्यपि 2004-05 में इसमें काफी कमी हुई है, ओजोन के सान्द्रण में वृद्धि हुई है तथा ओजोन छिद्र का भराव हुआ है। परन्तु आर्कटिक क्षेत्र के ऊपर नवम्बर, 2004 से 31 मार्च, 2005 तक ओजोन परत में 60 प्रतिशत से अधिक क्षरण हुआ)।   "

मध्यमण्डल (Mesosphere)

मध्य मण्डल का विस्तार सागर तल से 50 से 80 किलोमीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है। 
इस मण्डल में ऊँचाई के साथ तापमान में पुनः गिरावट होने लगती है। 
स्ट्रैटोपाज पर तापमान की वृद्धि समाप्त हो जाती है। इसके ऊपर तापमान घटने लगता है। 
मध्य मण्डल की ऊपरी सीमा अर्थात् 80 किलोमीटर की ऊँचाई पर तापमान-80° सें० हो जाता है तथा यह -100° से -133° सें० तक हो सकता है। 
मध्य मण्डल की इस ऊपरी सीमा को मेसोपाज (mesopause) कहते हैं । 
इस सीमा के ऊपर जाने पर तापमान बढ़ने लगता है। 
वास्तव में 80 किमी० की ऊँचाई के बाद मेसोपाज तापीय प्रतिलोमन (inversion of temperature) को इंगित करता है क्योंकि इसके नीचे कम तापमान रहता है परन्तु इसके ऊपर अधिक तापमान रहता है। 
इस मण्डल में नाक्टीलुसेण्ट बादलों का ध्रुवों के ऊपर गर्मियों में दर्शन होता है। 
इन बादलों का निर्माण उल्का धूल (meteoric dusts) एवं संवहनीय प्रक्रिया द्वारा ऊपर लायी गयी आर्द्रता के सहयोग से संघनन (condensation) होने से होता है। 
इस परत में वायुदाब बहुत कम होता है जो 50 किलोमीटर की ऊँचाई अर्थात् स्ट्रेटोपाज पर 1.0 मिलीबार तथा मेसोपाज (अर्थात् 90-100 किमी०) पर 0.01 मिलीबार होता है।

तापमण्डल (Thermosphere) 

मध्यमण्डल (mesosphere) से ऊपर स्थित वायुमण्डल के भाग को तापमण्डल कहते हैं जिसमें बढ़ती ऊँचाई के साथ तापमान तीव्र गति से बढ़ता है परन्तु अत्यन्त कम वायुमण्डलीय घनत्व के कारण वायुदाब न्यूनतम होता है। 
यह अनुमान किया गया है कि तापमण्डल की ऊपरी सीमा, जो अब तक निश्चित नहीं की जा सकी है, पर तापमान 1700° सें० रहता है। 
ज्ञातव्य है कि इस उच्च तापमान का साधारण थर्मामीटर से मापन (measurement) नहीं किया जा सकता क्योंकि यहाँ पर वायुमण्डलीय गैसें अत्यन्त न्यून घनत्व के कारण बहुत अधिक हल्की हो जाती हैं। 
यही कारण है कि यदि यहाँ पर हाथ बाहर फैलाया जाय (यदि यह सम्भव हो सके) तो गर्मी महसूस नहीं होगी। 

विशिष्टताओं में विभिन्नताओं के आधार पर मध्य मण्डल को दो उपमण्डलों में विभाजित किया जाता है:

(1) आयनमण्डल, तथा (2) आयतनमण्डल।

आयन मण्डल (Ionosphere) 

आयन मण्डल का वायुमण्डल में सागर तल से 80 से 640 किमी० के बीच विस्तार पाया जाता है। 
इस मण्डल में ऊंचाई के साथ कई परतों का निर्धारण किया गया है : D, E,F तथा G परतें । 
(i) D परत का विस्तार 80 से 99 किमी० के मध्य है। 
यह परत न्यून आवृत्ति (low frequency) वाली रेडियो तरंगों का परावर्तन करती है। 
यह परत सूर्यास्त के साथ ही लुप्त हो जाती है क्योंकि यह सौर्यिक विकिरण से सम्बन्धित होती है। 
(ii) E परत  मध्यम एवं उच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों को परावर्तित करके पृथ्वी की ओर वापस भेज देती है। 
(iii) छिटपुट / E परत अति उच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों को पृथ्वी की ओर वापस परावर्तित कर देती है। 
(iv) E, परत सामान्यतया 150 किमी० की ऊँचाई पर पायी जाती है। 
इस परत का निर्माण पराबैगनी सौर्यिक फोटान का आक्सीजन अणुओं के साथ अभिक्रिया होने से होता है। 

आयतनमण्डल (exosphere) 

इस मण्डल की महत्वपूर्ण विशेषता इसमें औरोरा आस्ट्रालिस एवं औरोरा बोरियालिस की होने वाली घटनायें हैं। 
अरोरा का शाब्दिक अर्थ होता है 'प्रात:काल' (dawn) जबकि बोरियालिस तथा आस्ट्रालिस का अर्थ क्रमशः 'उत्तरी' एवं 'दक्षिणी' होता है। 
इसी कारण उन्हें 'उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश' (aurora borealis) एवं दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश' (aurora australis) कहा जाता है। 
वास्तव में औरोरा ब्रह्माण्डीय चमकते प्रकाश (cosmic glowing lights) होते हैं जिनका निर्माण चुम्बकीय तूफान के कारण सूर्य की सतह से विसर्जित इलेक्ट्रान तरंग (stream of electrons discharged from the sun's surface) के कारण होता है। 
औरोरा ध्रुवीय आकाश में लटके विचित्र बहुरंगी आतिशबाजी (multicoloured fireworks) की तरह दिखाई पड़ते हैं। 
ये प्रायः आधी रात के समय दृष्टिगत होते हैं। 

महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

वायुदाब को पासकल और मिलीबार में मापा जाता है
1 वायुमंडलीय दाब - 1013.35mb
1 वायु दाब - 1013.25 kg Pascal
1 वायु दाब - 760mm/hg यां 76cm
समान वायुदाब को मिलाने वाली रेखा को समदाब रेखा कहते हैं।
वायुदाब को बैरोमीटर से मापा जाता है
पारे का तेजी से गिरना - आंधी
पारे का अचानक गिरना तथा धीरे-धीरे बढ़ना - वर्षा
पारे का बढ़ते रहना साफ मौसम दिखाता है।

Auroras (ध्रुवीय प्रकाश)

औरोरा का शाब्दिक अर्थ ऊषाकाल (dawn) होता है। 
औरोरा को ध्रुवीय प्रकाश कहते हैं, जो ब्रह्माण्डीय चमकते प्रकाश (cosmicglowing lights) होते हैं जिनका निर्माण चुम्बकीय तूफान के कारण सूर्य की सतह से उत्सर्जित इलेक्ट्रान तरंग के कारण होता है। 
औरोरा ध्रुवीय आकाश में लटके बहुरंगी आतिशबाजी (multicoloured fireworks) की तरह दिखाई पड़ते हैं। 
ये प्राय: आधी रात के समय दृष्टिगत होते हैं। 

ब्वायल्स गैस नियम (Boyle's gas law)

यह नियम वायुदाब,गैसों के आयतन एवं गैसों के घनत्व के बीच सम्बन्धों पर आधारित है। 

चार्ल्स गैस नियम (Charle's gas law)

यह नियम स्थिर गैस आयतन पर तापमान एवं वायुदाब के सम्बन्धों को दर्शाता है। 

शीत बिन्दु (Cold point)  

जिस ऊँचाई पर (ट्रोपोपाज़ पर) ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि रुक जाती है उसे शीत बिन्दु कहते हैं। 

संयुक्त गैस नियम (Combined gas law)

इस नियम के अनुसार दो ज्ञात विचरों (variables) के आधार पर किसी एक अज्ञात विचर का पता लगाया जा
सकता है। 

लुसक गैस नियम (Lussac's gas law)

यह नियम वायुदाब, गैसों के आयतन एवं तापमान के बीच सम्बन्धों को प्रदर्शित करता है। 

नाक्टीलुसेण्ट बादल (Noctiluscent cloud)

मध्यमण्डल (मेसोस्फीयर) में ध्रुवों के ऊपर ग्रीष्मकाल में उल्का धूल एवं संवहनीय प्रक्रिया द्वारा ऊपर लायी गयी आर्द्रता के सहयोग से संघनन (condensation) होने से निर्मित बादलों को नाक्टीलुसेण्ट बादल (निशादीप्त बादल) कहते हैं।

 स्ट्रैटोपाज़ (Stratopause)

समतापमण्डल (स्ट्रैटोस्फीयर) की ऊपरी सीमा (50 किमी०) को स्ट्रैटोपाज़ कहते हैं। 

ट्रोपोपाज़ (Tropopsuse)

क्षोभमण्डल (ट्रोपोस्फीयर) की ऊपरी सीमा (16 -17 किमी०) को ट्रोपोपाज़ कहते हैं।

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